मित्रों! आज एक अतुकान्त रचना देखिए! सूर, कबीर, तुलसी, के गीत, |
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रविवार, 1 नवंबर 2020
अतुकान्त "अतुकान्त गीत और कुगीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सोमवार, 6 जुलाई 2020
अतुकान्त "जीना पड़ेगा कोरोना के साथ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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हमारे चारों ओर
जाल बुन लिया है
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जाल!
हाँ जी!
जाल तो जाल ही होता है
चाहे वह मकड़ी का जाल हो
या बहेलिए का जाल
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नदी, सरोवर सिन्धु में
चाहे मछलियाँ हों
या
मगरमच्छ हों
कोई नहीं बच सकता
जाल के फन्दे से
किन्तु एक उपाय है
--
आज हमें संगठित होकर नहीं
बल्कि
अलग-अलग रहकर
सावधानियों के साथ
इस जाल को काटना है
--
हवा में
पहले प्रदूषण की
समस्या थी
आज उसके साथ
विषाणु ने भी
डेरा डाल दिया है
--
घर-बाहर
आज कोई सुरक्षित नहीं है
सरदी-गरमी
या बरसात
कोई भी मौसम हो
इस विषाणु को
नहीं मार सका है
--
विडम्बना है ये
प्राणिमात्र के लिए
संकट काल है
जीना मुहाल है
--
विश्व परेशान है
कोरोना का जनक भी
हैरान है
नहीं बनी है
आठ महीने में भी
कोरोना विनाशक
कोई दवाई या
प्रतिरोधक वक्सीन
--
जीना तो पड़ेगा ही
मगर कैसे?
--
मुखपट्टी लगाकर
सामाजिक दूरी बनाकर
स्वच्छता के साथ
और धोना है
हर घण्टे साबुन से हाथ।
अब तो जीना सीखना है हमें
कोरोना के साथ।
--
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बुधवार, 24 अक्टूबर 2012
"!!रावण या रक्तबीज!!" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
विजयादशमी
(दशहरा)
की
हार्दिक शुभकामनाएँ!
!!रावण या रक्तबीज!!
दशहरा है
राक्षसों
के
गगनचुम्बी
पुतले
मैदान
में सजे हैं
रामलीला
मैदान में
मेला लगा
है
लोगों की
भीड़ में
श्री राम
के
जय के
उद्घोष के साथ
पुतलों
का के साथ
युद्ध शुरू
हो चुका था
नवयुग की
यही तो
मर्दानगी है।
--
चार
बालाएँ
गुम हो
गई हैं
बार-बार
एक ही
प्रश्न
मन में
उठ रहा था
"रावण को तो राम ने
रामलीला
में मार दिया है’’
फिर किस
से राक्षस ने
चार
सीताओं का हरण किया।
--
रावण
आमआदमी नहीं
रक्तबीज
है कोई
एक मरता
है
हजार
जन्म ले लेते हैं
उन्हीं
में से
किसी ने
इन चार
सीताओं का
हरण किया
होगा!
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सोमवार, 10 सितंबर 2012
"हमारी नियति" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
वो सबके साथ रहता था हमारी सुनता था अपनी कहता था किन्तु जब से हुआ है मशहूर हो गया है सबसे दूर अब न रहा वो सीधा-सादा बन्दा है क्योंकि वो जनता का नुमाइन्दा है पहले था मानव फिर हुआ अतिमानव किन्तु अब है महामानव तन से देशी मन से सरकारी यही तो है उसकी लाचारी तीन टाँग की कुर्सी चढ़ा देती है अर्श पर लुढ़क जाये तो पटक देती है फर्श पर रूप राजशाही नाम लोकशाही जनता के द्वारा जनता का कानून भ्रष्टाचार लोकतन्त्र का जुनून दुर्गति ही दुर्गति यही तो है हमारी नियति! |
गुरुवार, 19 जुलाई 2012
"समाजवाद का चेहरा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कौन है अंजाना?
समाजवाद का चेहरा है,
जाना-पहचाना?
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डाका, राहजनी, और चोरी,
सुरसा के मुँह के समान-
बढ़ रही है,रिश्वतखोरी।
देख रहे हैं-
गरीब और मजदूर,
होता जा रहा है,
चिकित्सा और न्याय-
उनसे दूर।
--
बढ़ता जा रहा है-
भ्रष्टाचार, व्यभिचार और शोषण,
नेतागण कर रहे हैं-
अपने परिवार का पोषण।
--
क्या समाजवाद-
सबके हित की-आवाज है?
क्या देश में दीन-दुखी,
आम आदमी का राज है?
पछता रहे हैं,
गरीब और कमजोर,
क्यों भेजा था उन्होंने संसद में-
एक निकम्मा-कामचोर?
--
आज केवल-
नेता ही आबाद है,
जनता
आज भी बरबाद है।
क्या यही समाजवाद है?
हाँ यही समाजवाद है।
मंगलवार, 1 मई 2012
"अतुकान्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सभी में निहित है प्रीत।
आज
लिखे जा रहे हैं अगीत,
अतुकान्त
सुगीत, कुगीत
और नवगीत।
जी हाँ!
हम आ गये हैं
नयी सभ्यता में,
जीवन कट रहा है
व्यस्तता में।
सूर, कबीर, तुलसी की
नही थी कोई पूँछ,
मगर
आज अधिकांश ने
लगा ली है
छोटी या बड़ी
पूँछ या मूँछ।
क्योंकि इसी से है
उनकी पूछ
या पहचान,
लेकिन
पुरातन साहित्यकारों को तो
बना दिया था
उनके साहित्य ने ही महान।
परिपूर्ण थी
उनकी लेखनी
मर्यादाओं से,
मगर
आज तो लोगों को
सरोकार है
विविधताओं से।
लो हो गया काम,
पुरानों को नमन
और नयों को प्रणाम!!





