गीत-ग़ज़ल, दोहा-चौपाई, गूँथ-गूँथ
कर हार सजाया। नवयुग
का व्यामोह छोड़कर , हमने
छन्दों को अपनाया।। कल्पनाओं
में डूबे जब भी, सुख
से नहीं सोए रातों को। कम्प्यूटर
पर अंकित करके, कहा
आपसे सब बातों को। जब
मौसम ने ली अँगड़ाई, हमने
उसका गीत बनाया। नवयुग
का व्यामोह छोड़कर , हमने
छन्दों को अपनाया।। आमों
के बागों में आकर, जब
कोयल ने गान सुनाया। तब
हमने भी कोयलिया के सुर
में अपना शब्द मिलाया। चिड़ियों
के मृदु कोलाहल में अपना
चंचल मन बहलाया। नवयुग
का व्यामोह छोड़कर , हमने
छन्दों को अपनाया।। मन
आनन्दित हो जाता जब, बच्चों
की सुनकर किलकारी। हमने
भी बच्चा बनकर तब, चहका
दी नन्हीं फुलवारी। वासन्ती
उपवन के हर पत्ते-बूटे
को मीत बनाया। नवयुग
का व्यामोह छोड़कर , हमने
छन्दों को अपनाया।। मनीषियों
की सेवा करने का, जब
भी अवसर पा जाते। साथ
हमारे सब घर वाले, मन
में फूले नहीं समाते। अभ्यागत के संग
भोज का हमने भी आनन्द
उठाया। नवयुग
का व्यामोह छोड़कर , हमने
छन्दों को अपनाया।। इसीलिए
तो आज हमारी, खिलती
बगिया है प्रतिपल। देवों
का आशीष हमारे, सुख-वैभव
का है सम्बल। अपनी
कुटिया में हमने भी महलों
जैसा वैभव पाया। नवयुग
का व्यामोह छोड़कर , हमने
छन्दों को अपनाया।। |
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सोमवार, 11 अक्टूबर 2021
गीत "हमने छन्दों को अपनाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 6 नवंबर 2013
"हमने छन्दों को अपनाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गीत-ग़ज़ल, दोहा-चौपाई,
गूँथ-गूँथ कर हार सजाया।
नवयुग का व्यामोह छोड़कर ,
हमने छन्दों को अपनाया।
कल्पनाओं में डूबे जब भी,
सुख से नहीं सोए रातों को।
कम्प्यूटर पर अंकित करके,
साझा किया सभी बातों को।।
जब मौसम ने ली अँगड़ाई,
हमने उसका गीत बनाया।
वासन्ती उपवन के हर
पत्ते-बूटे को मीत बनाया।।
आमों के बागों में आकर,
जब कोयल ने गान सुनाया।
तब हमने भी कोयलिया के
सुर में अपना शब्द मिलाया।।
मन आनन्दित हो जाता जब,
बच्चों की सुनकर किलकारी।
हमने भी बच्चा बनकर तब,
चहका दी नन्हीं फुलवारी।।
मनीषियों की सेवा करने का,
जब भी अवसर पा जाते।
साथ हमारे सब घर वाले,
मन में फूले नहीं समाते।।
इसीलिए तो आज हमारी,
खिलती बगिया है प्रतिपल।
उन सबका आशीष हमारे,
सुख-वैभव का है सम्बल।।
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