आशा का दीप जलाया क्यों? मेरे वीराने उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों? प्यार-प्यार है पाप नही है, जिसका कोई माप नही है, यह तो है वरदान ईश का, यह कोई अभिशाप नही है, दो नयनों के प्यालों में, सागर सा नीर बहाया क्यों? मेरे वीराने उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों? मुस्काओ स्वर भर कर गाओ, नगमों को और तरानों को, गुंजायमान कर दो फिर से, धरती के मौन ठिकानों को, शीशे जैसे नाजुक दिल मे, ग़म का अम्बार समाया क्यों? मेरे वीराने उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों? नीलगगन के सपनों को, साकार धरातल तो दे दो, पीत पड़े प्यारे पादप को, निर्मल अमृत जल तो दे दो, रस्म-रिवाजों की माया से, यह घर-बार सजाया क्यों? मेरे वीराने उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों? |
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सोमवार, 2 अप्रैल 2012
"आशा का दीप जलाया क्यों?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सोमवार, 9 मई 2011
"लेन-देन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मित्रों! आज अपनी बहुत पुरानी रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ! मुझे तो पसन्द नहीं है! आपको भी पसन्द नहीं आयेगी! क्योंकि इसमें सिर्फ तुकबन्दी ही है! |
मुझे हँसना नही आया। उन्हें रोना नही आया।। मिलन के गीत मन ही मन, हमेशा गुन-गुनाता था। हृदय का शब्द होठों पर, कभी बिल्कुल न लाता था। मुझे कहना नही आया। उन्हें सुनना नही आया।। कभी जो भूलना चाहा, जुबां पर उनकी ही रट थी। अन्धेरी राह में उनकी, चहल-कदमी की आहट थी। मुझे सपना नही आया। उन्हें अपना नही भाया।। बहुत से पत्र लाया था, मगर मजमून कोरे थे। शमा के भाग्य में आये, फकत झोंकें-झकोरे थे। मुझे लिखना नही आया। उन्हें पढ़ना नही आया।। बने हैं प्रीत के क्रेता, जमाने भर के सौदागर। मुहब्बत है नही सौदा, सितम कैसे करूँ उन पर। मुझे लेना नही आया। उन्हें देना नही आया।। |
रविवार, 1 मार्च 2009
अब प्यार करने के दिन आ गये हैं। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
चिड़ियों के स्वर में चहक ही चहक है,
महकने-चहकने के दिन आ गये हैं।
