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रविवार, 31 जनवरी 2021

कविता "अब बसन्त आयेगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खिल जायेंगे नव सुमन
,
उपवन मुस्कायेगा!!
--
कुहासे की चादर,
धरा पर बिछी हुई।
नभ ने ढाँप ली है,
अमल-धवल रुई।।
--
दिवस हैं अभी छोटे,
रोशनी मऩ्द है।
शीत की मार है,
विद्यालय बन्द है।।
--
जल रहे हैं अलाव,
आँगन चौराहों पर।
चहल-पहल कम है,
पगदण्डी-राहों पर।।
--
सूरज अदृश्य है,
पड़ रहा पाला है।।
पर्वत ने ओढ़ लिया,
बर्फ का दुशाला है।।
--
मन में एक आशा है,
अब बसन्त आयेगा!
खिल जायेंगे नव सुमन,
उपवन मुस्कायेगा!!
--

शनिवार, 30 जनवरी 2021

दोहे "राजनीति में हंस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--

सारे कौए हो गये, राजनीति में हंस।
बाहर से गोपाल हैं, भीतर से हैं कंस।।

--

मक्कारों ने हर लिया, जनता का आराम।

बगुलों ने टोपी लगा, जीना किया हराम।।

--

जब से दल-बल में बढ़ी, शैतानों की माँग।
मुर्गे पढ़ें नमाज को, गुर्गे देते बाँग।।
--
खिचड़ी देती है मज़ा, कंकड़ देते कष्ट।
रसना के आनन्द को, कर देते है नष्ट।।
--
नहीं हुआ है देश में, अभी शीत का अन्त।
कुहरे से इस साल तो, शीतल हुआ बसन्त।।
--
बिना भूमिका के कहो, अपने मन की बात।
दोहों में ही निहित है, जीवन की सौगात।।
--
पल-पल में है बदलता, आसमान का रूप।
बादल छँटने पर खिले, वसुन्धरा पर धूप।।

--
दुनिया का तो छोर है, नहीं व्योम का अन्त।
अन्तरिक्ष में घूमता, कालातीत बसन्त।।
--

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

गीत "कुहरा छँटने ही वाला है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
आने वाला है बसन्त
अब प्रणय दिवस में देर नहीं।
कुहरा छँटने ही वाला है
फिर होगा अन्धेर नहीं।।
--
धूप गुनगुनी पाकर
मादक नशा बहुत चढ़ जायेगा,
सूरज यौवन पर आयेगा
तापमान बढ़ जायेगा,
तूफानों में चलते रहते
रुकते कभी दिलेर नहीं।
कुहरा छँटने ही वाला है
फिर होगा अन्धेर नहीं।।
--
धन से सब कुछ मिल जायेगा
लेकिन मिलता प्यार नहीं,
इससे बढ़ कर दुनिया में
होता कोई उपहार नहीं,
नादिरशाही से कोई भी
खिलता पीत कनेर नहीं।
कुहरा छँटने ही वाला है
फिर होगा अन्धेर नहीं।।
--
जो दिल से उपजे वो ही तो
ग़ज़ल कही जाती है,
नेह भरा पानी पी कर
ही तो बहार आती है,
काँटे उगते हैं बबूल में
खट्टे-मीठे बेर नहीं।
कुहरा छँटने ही वाला है
फिर होगा अन्धेर नहीं।।
--
बन्दर को अदरख खाने में
स्वाद नहीं आ पाता है,
किन्तु करेले को मानव
खुश हो करके खा जाता है,
आँखोंवालों के हिस्से में
आती कभी बटेर नहीं।
कुहरा छँटने ही वाला है
फिर होगा अन्धेर नहीं।।
--

बुधवार, 27 जनवरी 2021

गीत "भारत के जननायक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
विपिन चन्द्र पाल बंगाली,
भारत के जननायक थे।
आजादी के परवाने थे,
जन-जन के उन्नायक थे।।
--
चाटुकारिता अँगरेजों की,
उनको नहीं सुहाती थी।
गाँधी जी की नरम नीति तो,
उनको रास न आती थी।
पत्रकारिता में बाबू जी,
क्रान्तिदूत संवाहक थे।
आजादी के परवाने थे,
जन-जन के उन्नायक थे।।
--
शिक्षक, लेखक-पत्रकार थे,
स्वतन्त्रता सेनानी थे।
लाल-बाल और पाल,
हमारे भारत की पेशानी थे।
"वन्देमातरम्" पत्र चलाया,
स्वतन्त्रता के गायक थे।
आजादी के परवाने थे,
जन-जन के उन्नायक थे।।
--
फूलों की जिनको चाह न थी,
था काँटों को स्वीकार किया।
चन्दन से था कुछ मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार किया।।
झुके नहीं थे, रुके नहीं थे,
जन-गण के अधिनायक थे।
आजादी के परवाने थे,
जन-जन के उन्नायक थे।।
--
इस तिकड़ी को शत-शत वन्दन,
नमन हजारों बार करूँ।
चरणों की धूल समझ चन्द्न,
मस्तक पर उनकी क्षार धरूँ।।
वंशी के बदले पाञ्चजन्य ही,
उनके सदा सहायक थे।
आजादी के परवाने थे,
जन-जन के उन्नायक थे।।
--
चरण कमल की चाह न थी,
भाता अंगद का एक पाँव।
खुली हवा में आजादी की,
उन्हें सुहाता नगर-गाँव।
ये नर-नाहर थे बंगाली,
भारत भाग्य विनायक थे।
आजादी के परवाने थे,
भारत के उन्नायक थे।।

दोहे "टिप्पणी और पसन्द" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
मुखपोथी पर हो रही, लाइव की बरसात।
बिना माँग के कर रहे, सब अपना निर्यात।।
--
आड़ा-तिरछा हो भले, शब्दों का आकार।
गढ़ते मन के पात्र को, बनकर सभी कुम्हार।।
--
इस लाइव के फेर में, लिखना-पढ़ना बन्द।
कहाँ-कहाँ पर अब करें, टिप्पणी और पसन्द।।
--
एक-एक घण्टे करें, काव्यपाठ कविराज।
मुखपोथी को चाहिए, करना सही इलाज।।
--
चाहे जो पढ़ते रहो, टोकेगा अब कौन।
वाह-वाह करते सभी, वाणी को कर मौन।।
--
कल तक जो गुमनाम थे, उन्हें गये सब जान।
मुखपोथी ने दे दिया लाइव का वरदान।।
--
कोनोना के काल में, लाइव का उपहार।
वाचन-भाषण में करो, सुनकर स्वयं सुधार।।

--

मंगलवार, 26 जनवरी 2021

गणतन्त्र दिवस "आओ तिरंगा फहरायें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


गणतन्त्रदिवस की शुभवेला में,
आओ तिरंगा फहरायें।
देशभक्ति के गीत प्रेम से,
आओ मिल-जुलकर गायें।।
गांधी बाबा ने सिखलाई,
हमें पहननी खादी है,
बलिदानों के बदले में,
पाई हमने आजादी है,
मोह छोड़कर परदेशों का,
उन्नत अपना देश बनायें।
देशभक्ति के गीत प्रेम से,
आओ मिल-जुलकर गायें।।

नया साल-छब्बीस जनवरी,
खुशियाँ लेकर आता है,
बासन्ती परिधान पहन कर,
टेसू फूल खिलाता है,
सरसों के बिरुए खेतों में,
झूम-झूमकर लहरायें।
देशभक्ति के गीत प्रेम से,
आओ मिल-जुलकर गायें।।

पेड़ों की शाखाएँ सारी,
नयी-नयी कोपल पायेंगी,
अपने आँगन के अम्बुआ की,
डाली-डाली बौरायेंगी,
मुस्कानों से सुमन सलोने,
धरा-गगन को महकायें।
देशभक्ति के गीत प्रेम से,
आओ मिल-जुलकर गायें।।

सोमवार, 25 जनवरी 2021

देशगीत "गणतंत्र महान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--

नया वर्ष स्वागत करता है,
पहन नया परिधान।
सारे जग से न्यारा, 

अपना है गणतंत्र महान॥
--
ज्ञान गंग की बहती धारा,
चन्दा-सूरज से उजियारा।
आन-बान और शान हमारी,
संविधान हम सबको प्यारा।
प्रजातंत्र पर भारत वाले,
करते हैं अभिमान।
सारे जग से न्यारा, 
अपना है गणतंत्र महान॥
--
शीश मुकुट हिमवान अचल है,
सुंदर -सुंदर ताजमहल है।
गंगा - यमुना और सरयू का,
पग पखारता पावन जल है।
प्राणों से भी मूल्यवान है,
हमको हिन्दुस्तान। 
सारे जग से न्यारा, 
अपना है गणतंत्र महान॥
--
स्वर भर कर इतिहास सुनाता,
महापुरुषों से इसका नाता।
गौतम-गांधीदयानंद की,
प्यारी धरती भारतमाता।
यहाँ हुए हैं पैदा नानक,
रामकृष्ण-भगवान।
सारे जग से न्यारा, 
अपना है गणतंत्र महान॥
--

रविवार, 24 जनवरी 2021

गीत "घर भर का अभिमान बेटियाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
कुल का हैं सम्मान बेटियाँ।
आन-बान और शान बेटियाँ।।
 --
किलकारी की गूँज सुनाती,
परिवारों को यही बसाती,
दोनों कुल का मान बेटियाँ।
आन-बान और शान बेटियाँ।।
--
लता-बेल सी बढ़ती जातीं,
सबके दुख-सुख पढ़ती जातीं,
मात पिता की जान बेटियाँ।
आन-बान और शान बेटियाँ।।
--
बेटी से रौशन है दुनिया।
ममता का आँगन है मुनिया।।
बेटों की हैं खान बेटियाँ।
आन-बान और शान बेटियाँ।।
--
बिटिया की महिमा अनन्त है।
बिटिया से घर में बसन्त है।।
घर भर का अभिमान बेटियाँ।
आन-बान और शान बेटियाँ।।

--

दोहे "खरपतवार अनन्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
होगा कुहरे का नहीं, जब तक नभ से अन्त।
तब तक आयेगा नहीं, खिलता हुआ बसन्त।।
--
निर्धन दुख को झेलते, सुख से हैं सामन्त।
कूड़ा-करकट बीनते, श्याम सलोने कन्त।।
--
रुकता थकता है नहीं, चलता चक्र अनन्त।
जग में आवागमन का, होता कभी न अन्त।।
--
खूब कमाई कर रहे, बाबा और महन्त।
थोड़े से ही हैं बचे, अब दुनिया में सन्त।।
--
जन्मजात होते नहीं, सन्त और बलवन्त।
गुरु की हो जिस पर कृपा, वो बनता गुणवन्त।।
--
दल के दल-दल में उगी, खरपतवार अनन्त।
गली-हाट में बिक रहे, राजनीति के सन्त।।
--
गये नहीं जो बाग में, देखे नहीं बसन्त।
आज किसानों के वही, बन बैठे हैं सन्त।।

--

शनिवार, 23 जनवरी 2021

दोहे "अब भी वीर सुभाष के, गूँज रहे सन्देश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
दुनिया के इतिहास में, दिवस आज का खास।
अपने भारत देश में, जन्मा वीर सुभास।।
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जीवित मृत घोषित किया, सबको हुआ मलाल।
सत्ता पाने के लिए, चली गयी थी चाल।।
--
क्यों इतने भयभीत हैं, शासन में अधिराज।
नहीं उजागर हो सका, नेता जी का राज।।
--
इस साजिश पर हो रहा, सबको पश्चाताप।
नेता जी को दे दिये, जीते जी सन्ताप।।
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सच्चाई से आज भी, क्यों इतना परहेज।
अब तो जग जाहिर करो, सारे दस्तावेज।।
--
जिसके कारण है हुआ, यह उपवन आजाद।
उस नेता की आ रही, अब जन-गण को याद।।
--
अर्पित श्रद्धा के सुमन, तुमको करता देश।
अब भी वीर सुभाष के, गूँज रहे सन्देश।।
--

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

गीत ''मकर का सूरज'' (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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कुहासे का आवरण
, आकाश पर चढ़ने लगा।।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।।
--
हाथ ठिठुरे-पाँव ठिठुरे, काँपता आँगन-सदन,
कोट,चस्टर और कम्बल से ढके सबके बदन,
आग का गोला शरद में पस्त सा  पड़ने लगा।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।।
--
सर्द मौसम को समेटे, जागता परिवेश है,
श्वेत चादर को लपेटे, झाँकता रजनीश है,
गगन के नयनों से शीतल अश्रुजल झड़ने लगा।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।।
--
आगमन ऋतुराज का लगता बहुत ही दूर है,
अभी तो हेमन्त यौवन से बहुत भरपूर है,
मकर का सूरज नये सन्देश को गढ़ने लगा।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।।

गुरुवार, 21 जनवरी 2021

गीतिका "रिवाज़-रीत बन गये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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फूल हो गये ज़ुदाशूल मीत बन गये
भाव हो गये ख़ुदा, बोल गीत बन गये
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काफ़िला बना नहीं, पथ कभी मिला नहीं
वर्तमान थे कभी, अब अतीत बन गये
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देह थी नवल-नवल, पंक में खिला कमल
तोतली ज़ुबान की, बातचीत बन गये
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सभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में
मज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये
--
आइना कमाल है, 'रूप' इन्द्रज़ाल है
धूप और छाँव में, रिवाज़-रीत बन गये

--

बुधवार, 20 जनवरी 2021

नवगीत "पर्वत बन कर डटे रहेंगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

--

अडिग रहे हैं, अडिग रहेंगे
सदा बढ़े हैं, सदा बढ़ेंगे!
हम तो दरिया का पानी है
रुककर हम तो नहीं सड़ेंगे!!
--
कितनों ने सन्देशे भेजे
कितनों से भिजवाये गये
कितनों ने आकर धमकाया
कितनों ने जमकर फुसलाया
हम भारत के हैं बाशिन्दे
पर्वत बन कर डटे रहेंगे!
हम तो दरिया का पानी है
रुककर हम तो नहीं सड़ेंगे!!
--
हममें गहराई सागर की
चाह नही हमको गागर की
काँटों पर हम चलने वाले
हम अपनी धुन के मतवाले
हम जमकर के लोहा लेंगे
दुश्मन से हम नही डरेंगे!
हम तो दरिया का पानी है
रुककर हम तो नहीं सड़ेंगे!!

--

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

गीत "आज हा-हा कार सा है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

--
कल्पनाएँ डर गयी हैं
,
भावनाएँ मर गयीं हैं,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??
 --
पक्षियों का चह-चहाना ,
लग रहा चीत्कार सा है।
षट्पदों का गीत गाना ,
आज हा-हा कार सा है।
गीत उर में रो रहे हैं,
शब्द सारे सो रहे हैं,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??
 --
एकता की गन्ध देता था,
सुमन हर एक प्यारा,
विश्व सारा एक स्वर से,
गीत गाता था हमारा,
कट गये सम्बन्ध प्यारे,
मिट गये अनुबन्ध सारे ,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??
-- 
आज क्यों पागल,
स्वदेशी हो गया है?
रक्त क्यों अपना,
विदेशी हो गया है?
पन्थ है कितना घिनौना,
हो गया इन्सान बौना,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??
 --
आज भी लोगों को,
पावस लग रही है,
चाँदनी फिर क्यों,
अमावस लग रही है?
शस्त्र लेकर सन्त आया,
प्रीत का बस अन्त आया,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??

--

 

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