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बुधवार, 31 जनवरी 2018

दोहे "बदल गये हैं ढंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मौसम अच्छा हो गया, हुआ शीत का अन्त।
पहन पीत परिधान को, खुश हो रहा बसन्त।।
--
पेड़ों ने पतझाड़ में, दिये पात सब झाड़।
हिम से अब भी हैं ढके, चोटी और पहाड़।।
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नवपल्लव की आस में, पेड़ तक रहे बाट।
भक्त नहाने चल दिये, गंगा जी के घाट।।
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युगलों पर चढ़ने लगा, प्रेमदिवस का रंग।
बदला सा परिवेश है, बदल गये हैं ढंग।।
--
उपवन में गदरा रहे, पौधों के अब अंग।
मधुमक्खी लेकर चली, कुनबा अपने संग।।
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फूली सरसों खेत में, पहन पीत परिधान।
गुनगुन की गुंजार से, भ्रमर गा रहे गान।।
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गेहूँ और मसूर भी, लहर-लहर लहराय।
अपनी खेती देखकर, कृषक रहे मुसकाय।।

सोमवार, 29 जनवरी 2018

दोहे "रचना ऐसा गीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अमल-धवल होता नहीं, सबका चित्त-चरित्र।
जाँच-परख के बाद ही, यहाँ बनाना मित्र।।।

रखना नहीं घनिष्ठता, उन लोगों के संग।
जो अपने बनकर करें, गोपनीयता भंग।।

जिसमें हो सन्देश कुछ, रचना ऐसा गीत।
सात सुरों के मेल से, बनता है संगीत।।

जो समाज को दे दिशा, कहलाता साहित्य।
जीवन दे जो जगत को, वो होता आदित्य।।

महादेव बन जाइए, करके विष का पान।
धरा और आकाश में, देंगे सब सम्मान।।

दोहे "है सूरज भयभीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नहीं हुआ है देश में, अभी शीत का अन्त।
कुहरे से इस साल तो, शीतल हुआ बसन्त।।

कुहरे-सरदी ने किये, कीर्तिमान सब ध्वस्त।
सूरज की गति देखकर, हुए हौसले पस्त।।

नहीं दिखाई दे रहा, वासन्ती संगीत।
कुहरे से इस साल तो, है सूरज भयभीत।।

सरदी हाड़ कँपा रही, बिगड़ गया परिवेश।
उत्तर भारत में अभी, कुहरे का है क्लेश।।

शीतलता की मार को, लोग रहे हैं झेल।
नहीं समझ में आ रहा, मौसम का ये खेल।।
  

रविवार, 28 जनवरी 2018

दोहे "नवपल्लव परिधान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

प्रेम-प्रीत के रंग लेआया है ऋतुराज।
मना रहा है प्रणय दिनहोकर मस्त समाज।।
 
चोंच कपोत लड़ा रहेकरते दिल की बात।
मिलकर यापन कर रहेजन्म-ज़िन्दगी साथ।।
 
शाखाओं पर आ गयेनवपल्लव परिधान।
मौसम है मधुमास कापंछी गाते गान।।
 
फूलों-कलियों पर चढ़ाअब उपवन में रंग।
वासन्ती परिधान केबड़े निराले ढंग।।
 
सेमल पर छाये सुमनवन में खिला पलाश।
सूरज देता ऊर्जानिर्मल है आकाश।।
 
सबके लिए बसन्त का, मौसम है अनुकूल।
फागुन में मन मोहते, ये पलाश के फूल।।
 
अंगारा सेमल हुआ, वन में खिला कपास।
मन के उपवन में उठी, भीनी मन्द-सुवास।।
 
सरसों फूली खेत में, पीताम्बर को धार।
देख अनोखे रूप को, भ्रमर करे गुंजार।।
 
कुदरत ने पहना दिये, नवपल्लव परिधान।
गंगा तट पर हो रहा, शिवजी का गुणगान।।
 

शनिवार, 27 जनवरी 2018

दोहे "देंगे नाम मिटाय" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

देख रहा करतूत को, होकर मूक जहान।
पाल रहा आतंक को, कैसे पाकिस्तान।।
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भारत में पकड़े गये, पाकिस्तानी पूत।
राष्ट्रसंघ को चाहिएँ, कितने और सबूत।।
--
इतने पर भी बोलता, पाक झूठ पर झूठ।
जब बनता माहौल कुछ, तब ही जाता रूठ।।
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नाम भले ही पाक हो, हरकत हैं नापाक।
बन्दर देकर घुड़कियाँ, जमा रहा है धाक।।
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हमने करके युद्ध को, दिखा दिया आवेश।
भारत के कारण बना, अलग बांगलादेश।।
--
भारतमाता हाथ में, रखती है त्रिशूल।
टकराने की कभी भी, मत करना तुम भूल।।
--
युद्ध हुआ यदि पाक से, देंगे नाम मिटाय।
फिर से वन्देमातरम, नक्शे में हो जाय।।

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

ग़ज़ल "नज़ारे बदल गये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सागर बदल गया है, किनारे बदल गये
आजाद हिन्दुस्तान के, नारे बदल गये

सोने की चिड़िया इसलिए, कंगाल हो गयी
कुदरत की सल्तनत के, इशारे बदल गये

दीनोइमान बिक गये राजा-वजीर के
नज़रें बदल गयीं तो, नज़ारे बदल गये

वीरान हो गयी यहाँ, चाणक्य की कुटिया
अपने वतन के, आज इदारे बदल गये

दलदल में फँसी नाव, कैसे पार लगेगी
चन्दा बदल गया है, सितारे बदल गये

अब इन्कलाब की, कोई उम्मीद ना रही
नापाक दिल के अब तो, शरारे बदल गये

बदला हुआ है ढंगअब किरदार का यहाँ
जीवन के सारे "रूप", हमारे बदल गये

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

गीत "हमारा गणतन्त्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अंग्रेजी से ओत-प्रोत,
अपने भारत का तन्त्र,
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।।

आजादी के बाद हमारी,
मौन हो गई भाषा,
देवनागरी के सपनों की,
गौण हो गई परिभाषा,
सब सुप्त हो गये छन्द-शास्त्र,
अभिलुप्त हो गये मन्त्र।
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।।

कहाँ गया गौरव अतीत,
अमृत गागर क्यों गई रीत,
क्यों सूख गई उरबसी प्रीत,
खो गया कहाँ संगीत-गीत,
इस शान्त बाटिका में किसने
बोया ऐसा षडयन्त्र।
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।।

कभी थे जो जग में वाचाल,
हो गये गूँगे माँ के लाल,
विदेशों में जाकर सरदार,
हुए क्यों भाषा से कंगाल,
कर रहे माँ का दूध हराम,
यही है क्या अपना जनतन्त्र।
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।।

बुधवार, 24 जनवरी 2018

गीत "ताल-लय उदास हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सवाल पर सवाल हैं, कुछ नहीं जवाब है।
राख में ढकी हुई, हमारे दिल की आग है।।

गीत भी डरे हुएताल-लय उदास हैं.
पात भी झरे हुए, शेष चन्द श्वास हैं,
दो नयन में पल रहा, नग़मग़ी सा ख्वाब है।
राख में ढकी हुई, हमारे दिल की आग है।।

ज़िन्दगी है इक सफर, पथ नहीं सरल यहाँ,
मंजिलों को खोजता, पथिक यहाँ-कभी वहाँ,
रंग भिन्न-भिन्न हैं, किन्तु नहीं फाग है।
राख में ढकी हुई, हमारे दिल की आग है।।

बाट जोहती रहीं, डोलियाँ सजी हुई,
हाथ की हथेलियों में, मेंहदी रची हुई,
हैं सिंगार साथ में, पर नहीं सुहाग है।
राख में ढकी हुई, हमारे दिल की आग है।।

इस अँधेरी रात में, जुगनुओं की भीड़ है,
अजनबी तलाशता, सिर्फ एक नीड़ है,
रौशनी के वास्ते, जल रहा च़िराग है।
राख में ढकी हुई, हमारे दिल की आग है।।

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

गीत "जीते-जी की माया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चार दिनों का ही मेला है, सारी दुनियादारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।

अमर समझता है अपने को, दुनिया का हर प्राणी,
छल-फरेब के बोल, बोलती रहती सबकी वाणी,
बिना मुहूरत निकल जायेगी इक दिन प्राणसवारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।

ठाठ-बाट और महल-दुमहले, साथ न तेरे जायेंगे,
केवल मरघट तक ही सारे, रस्म निभाने आयेंगे,
जिन्दा लोगों से सब रखते, अपनी नातेदारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।

काम-क्रोध, मद-लोभ सभीकुछ, जीते-जी की माया,
धू-धू करके जल जायेगी, इक दिन तेरी काया,
आने के ही साथ बँधी है, जाने की तैयारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।

याद करे तुझको दुनिया, तू ऐसा पुण्य कमाता जा,
मरने से पहले ऐ प्राणी, सच्चा पथ अपनाता जा,
जीवन का अवसान हो रहा, सिमट रही है पारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।

सोमवार, 22 जनवरी 2018

दोहे "जीवित हुआ बसन्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अच्छे दिन आने लगे, हुआ शीत का अन्त।
धीरे-धीरे चमन में, सजने लगा बसन्त।।

नदियों में बहने लगा, पावन निर्मल नीर।
जल में डुबकी लगाकर, निर्मल करो शरीर।।

जीवन में उल्लास के, बहुत निराले ढ़ंग।
बलखाती आकाश में, उड़ती हुई पतंग।।

सूर्य रश्मियाँ आ गयीं, खिली गुनगुनी धूप।
शस्य-श्यामला धरा का, निखरेगा अब रूप।।

कुहरा सारा छँट गया, चमका भानु-प्रकाश।
भुवन-भास्कर भी नहीं, लेगा अब अवकाश।।

रजनी आलोकित हुई, खिला चाँद रमणीक।
देखो अब आने लगे, युव-युगल नजदीक।।

पतझड़ का मौसम गया, जीवित हुआ बसन्त।
नव पल्लव पाने लगा, बूढ़ा बरगद सन्त।।

रविवार, 21 जनवरी 2018

गीत "बसन्त पञ्चमी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आरती उतार लो,
आ गया बसन्त है!
ज़िन्दग़ी सँवार लो
आ गया बसन्त है!

खेत लहलहा उठे,
खिल उठी वसुन्धरा,
चित्रकार ने नया,
आज रंग है भरा,
पीत वस्त्र धार लो,
आ गया बसन्त है!
ज़िन्दग़ी सँवार लो
आ गया बसन्त है!

शारदे के द्वार से,
ज्ञान का प्रसाद लो,
दूर हों विकार सब,
शब्द का प्रसाद लो,
धूप-दीप साथ ले
आरती उतार लो!
आ गया बसन्त है!
ज़िन्दग़ी सँवार लो
आ गया बसन्त है!

माँ सरस्वती से आज,
बिम्ब नये माँग लो,
वन्दना के साथ में,
भाव नये माँग लो,
मातु से प्रवाह की
अमल-धवल धार लो।
आ गया बसन्त है!
ज़िन्दग़ी सँवार लो
आ गया बसन्त है!

शनिवार, 20 जनवरी 2018

गीत "सूरज शीतलता बरसाता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सहमी कलियाँ आज चमन में।
कैसे फूल खिलें उपवन में?

द्वार कामना से संचित है,
हृदय भावना से वंचित है,
प्यार वासना से रंजित है,
सन्नाटा पसरा गुलशन में।
कैसे फूल खिलें उपवन में?

सूरज शीतलता बरसाता,
चन्दा अगन लगाता जाता,
पागल षटपद शोर मचाता,
धूमिल तारे नीलगगन में।
कैसे फूल खिलें उपवन में?

युग केवल अभिलाषा का है,
बिगड़ गया सुर भाषा का है,
जीवन नाम निराशा का है,
कोयल रोती है कानन में।
कैसे फूल खिलें उपवन में?

अंग और प्रत्यंग वही हैं,
पहले जैसे रंग नहीं हैं,
जीने के वो ढंग नहीं हैं,
काँटे उलझे हैं दामन में।
कैसे फूल खिलें उपवन में?

मौसम भी अनुरूप नहीं है,
चमकदार अब धूप नहीं है,
तेजस्वी अब “रूप” नहीं है,
पात झर गये मस्त पवन में।
कैसे फूल खिलें उपवन में?

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

गीत "साँसों पर विश्वास न करना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

साँसें धोखा दे जाती हैं,
साँसों पर विश्वास न करना।
सपने होते हैं हरजाई,
सपनों से कुछ आस न करना।।

जो कर्कश सुर में चिल्लाते,
उनको काग पुकारा जाता।
जो खग मधुर गान को गाते,
उनका स्वर कलरव कहलाता।
हृदयहीन धनवान व्यक्ति से,
कभी कोई अरदास न करना।
सपने होते हैं हरजाई,
सपनों से कुछ आस न करना।।

पर्वत की छाती से निकले,
कुछ झरने बन जाते गंगा।
पाक-साफ वो ही कहलाते,
जिनका तन-मन होता चंगा।
अपने मन से जोड़-तोड़कर,
शब्दों का विन्यास न करना।
सपने होते हैं हरजाई,
सपनों से कुछ आस न करना।।

पल-पल जिनके बोल बदलते,
वो क्या जाने सुख-दुख सहना।
जो विद्या के बैल बने हैं,
उनको अध्यापक मत कहना।
देख जमाने की हालत को,
मन को कभी उदास न करना।।
सपने होते हैं हरजाई,
सपनों से कुछ आस न करना।।

जब से ज्ञानी मौन हो गये,
अज्ञानी वाचाल हो गये।
धनवानों के बन्दीघर में,
पढ़े-लिखे बदहाल हो गये।
जनसेवक पर दर पर जाकर,
सत्य कभी उद् भाष न करना।
सपने होते हैं हरजाई,
सपनों से कुछ आस न करना।।

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