आशा पर ही प्यार टिका है।। आशाएँ अंकुर उपजातीं, आशाएँ विश्वास जगातीं, आशा पर परिवार टिका है। आशा पर ही प्यार टिका है।। आशाएँ श्रमदान कराती, पत्थर को भगवान बनाती, आशा पर उपहार टिका है। आशा पर ही प्यार टिका है।। आशा यमुना, आशा गंगा, आशाओं से चोला चंगा, आशा पर उद्धार टिका है। आशा पर ही प्यार टिका है।। आशाओं में बल ही बल है, इनसे जीवन में हलचल है. खान-पान आहार टिका है। आशा पर ही प्यार टिका है।। आशाएँ हैं, तो सपने है, सपनों में बसते अपने हैं, आशा पर व्यवहार टिका है। आशा पर ही प्यार टिका है।। आशाओं के रूप बहुत हैं, शीतल छाया धूप बहुत है, प्रीत, रीत, मनुहार टिका है। आशा पर ही प्यार टिका है।। आशाएँ जब उठ जायेंगी, खुशियाँ सारी लुट जायेंगी, उड़नखटोला द्वार टिका है। आशा पर ही प्यार टिका है।। |
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सोमवार, 19 दिसंबर 2011
"आशा पर संसार टिका है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शुक्रवार, 16 सितंबर 2011
‘‘मेरी पसन्द-एक चुनिन्दा रचना’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
♥ मेरी पसन्द ♥ मित्रों! 27 जून, 2009 को रचित अपनी पसन्द की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ! ![]() जलने को परवाना आतुर, आशा के दीप जलाओ तो। कब से बैठा प्यासा चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।। मधुवन में महक समाई है, कलियों में यौवन सा छाया, मस्ती में दीवाना होकर, भँवरा उपवन में मँडराया, मन झूम रहा होकर व्याकुल, तुम पंखुरिया फैलाओ तो। कब से बैठा प्यासा चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।। मधुमक्खी भीने-भीने स्वर में, सुन्दर राग सुनाती है, सुन्दर पंखों वाली तितली भी, आस लगाए आती है, सूरज की किरणें कहती है, कलियों खुलकर मुस्काओ तो। कब से बैठा प्यासा चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।। चाहे मत दो मधु का कणभर, पर आमन्त्रण तो दे दो, पहचानापन विस्मृत करके, इक मौन-निमन्त्रण तो दे दो, काली घनघोर घटाओं में, बिजली बन कर आ जाओ तो। कब से बैठा प्यासा चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।। (चित्र गूगल सर्च से साभार) |
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