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शनिवार, 30 जून 2012

"हमारे घर में रहते हैं, हमें चूना लगाते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जिन्हें पाला था नाज़ों से, वही आँखें दिखाते हैं।
हमारे दिल में घुसकर वो, हमें नश्तर चुभाते हैं।।

जिन्हें अँगुली पकड़ हमने, कभी चलना सिखाया था,
जरा सा ज्ञान क्या सीखा, हमें पढ़ना सिखाते हैं।

भँवर में थे फँसे जब वो, हमीं ने तो निकाला था,
मगर अहसान के बदले, हमें चूना लगाते हैं।

हमें अहसास होता है, बड़ी है मतलबी दुनिया,
गधे को बाप भी अपना, समय पर वो बनाते हैं।

नहीं है रूप से मतलब, नहीं है रंग की चिन्ता,
अगर चांदी के जूते हो, तो सिर पर वो बिठाते हैं।

शुक्रवार, 29 जून 2012

"एक दिन चुनाव प्रचार के नामं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उत्तराखण्ड के मा. मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा जी खटीमा से लगती हुई सितारगंज विधानसभा से विधायक का उपचुनाव लड़ रहे हैं। उनका उपचुनाव आगामी 8 जुलाई को होगा।
इन दिनों विकासनगर (देहरादून) से प्रकाशित होने वाले "हिमालय टाइम्स" समाचारपत्र के प्रधान सम्पादक आदरणीय द्वारिका प्रसाद उनियाल जी ने मुझे सम्पादक मण्डल में शामिल कर लिया गया है और वो मा. मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा का विशेष परिशिष्ट प्रकाशित करने जा रहे हैं। इसलिए मैंने अपना नैतिक दायित्व समझते हुए एक दिन बहुगुणा जी के परिवार के साथ बिताया।
सितारगंज से 10किमी दूर सितारगंज जेलकैम्प की भूमि पर बने औद्योगिक परिसर (सिडकुल) में एस.एन. होटल में इन दिनों मुख्यमन्त्री जी का काफिला अपना डेरा डाले हुए है। इसलिए मैं भी श्रीमती जी को साथ लेकर यहाँ आ धमका।
यहाँ सबसे पहले हमारी मुलाकात कान्ता प्रसाद सागर जी से हुई। ये सन् 2007 में सितार गंज विधानसभा से काँग्रेस के प्रत्याशी थे।
होटल में कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों का हुजूम था
जो चुनावप्रचार में भाग लेने के लिए यहाँ पधारे थे।
उत्तर प्रदेश से भी बहुत से लोग यहाँ आये हुए थे।
इसके बाद हमें मा. बहुगुणा जी के दोनों पुत्र दिखाई पड़े
जो बहुत विनम्रता से लोगों का अभिवादन कर रहे थे।
इनके छोटे पुत्र ने तो बहुत देर तक
मेरे साथ चुनाव के बारे में बातें की।
इसके बाद मा. मुख्यमन्त्री जी की धर्मपत्नी तैयार होकर
कमरे से बाहर निकलीं और लोगों से मिलीं।
उन्हें पास की न्यायपंचायत रघुलिया में
जनसम्पर्क के लिए जाना था
इसलिए वो अपनी कार में बैठकर
वहाँ के लिए प्रस्थान करने लगीं।
अब होटल के कमरे से तैयार होकर बाहर निकलीं
उ.प्र.काँग्रेस की अध्यक्ष
और विजय बहुगुणा की बहिन श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी।
ये हमारी श्रीमती अमर भारती काफी घुलमिल गयीं थी।
ऐसा लगा ही नहीं कि ये पहली बार आपस में मिल रहीं हैं।
इसके बाद मैंने और श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी ने
चुनाव को लेकर काफी देर तक माथापच्ची की
यहाँ पर उत्तराखण्ड के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष
मा.यशपाल आर्य भी ठहरे हुए थे।
अब वे भी तैयार होकर अपने रूम से बाहर आ चुके थे।
मा.यशपाल आर्य का और मेरा लगभग 25 साल पुराना साथ है।
आज भी वे मुझे अपना बड़ा भाई मानते हैं।
संयोग से मेरी कार में एक पुरानी फोटो एलबम पड़ी थी।
जिसमें यशपाल आर्य और उनकी श्रीमती पुष्पा आर्या
और माननीय पं. नारायण दत्त तिवारी जी के फोटो थे।
मा.यशपाल आर्य ने बड़ी उत्सुकता से
अपने 25 साल पुराने फोटो देखे।
उनकी खुशी देखते ही बनती थी।
इस प्रकार हमारा आज का दिन
बहुगुणा जी के परिवार के साथ बीता।

गुरुवार, 28 जून 2012

"अन्तरजाल हुआ है तन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कम्प्यूटर बन गई जिन्दगी, अन्तरजाल हुआ है तन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

जंगल लगता बहुत सुहाना, पर्वत लगते हैं अच्छे,
सीधी-सादी बातें करते, बच्चे लगते हैं अच्छे,
सुन्दर-सुन्दर सुमनों वाला, लगता प्यारा ये उपवन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

सुख की बातें-दुख की बातें, बेबाकी से देते हैं,
भावनाओं के सम्प्रेषण से, अपना मन भर लेते हैं.
आभासी दुनिया में मिलता, हमको सुख और चैन-अमन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

ग़ाफ़िल, रविकर, भ्रमर, यहाँ पर सुरभिसुमन खिलाते हैं,
उल्लू और मयंक निशा में, विचरण करने आते हैं,
पंकहीन से कमल सुशोभित करते, बगिया और चमन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

उड़नतश्तरी दिख जाती है, ताऊ नजर नहीं आता,
अदा-सदा, वन्दना-कनेरी, महकाती जातीं उपवन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

बुधवार, 27 जून 2012

"जकड़ा हुआ है आदमी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


फालतू की ऐँठ में, अकड़ा हुआ है आदमी।
वानरों की कैद में, जकड़ा हुआ है आदमी।।

सभ्यता की आँधियाँ, जाने कहाँ ले जायेंगी,
काम के उद्वेग ने, पकड़ा हुआ है आदमी।

छिप गयी है अब हकीकत, कलयुगी परिवेश में,
रोटियों के देश में, टुकड़ा हुआ है आदमी।

हम चले जब खोजने, उसको गली-मैदान में
ज़िन्दग़ी के खेत में, उजड़ा हुआ है आदमी।

बिक रही है कौड़ियों में, देख लो इंसानियत,
आदमी की पैठ में, बिगड़ा हुआ है आदमी।

रूप तो है इक छलावा, रंग पर मत जाइए,
नगमगी परिवेश में, पिछड़ा हुआ है आदमी।

मंगलवार, 26 जून 2012

"कविवर राकेश "चक्र" के सम्मान में गोष्ठी " (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

साहित्य शारदा मंच, खटीमा के तत्वावधान में लगभग 55 पुस्तकों के रचयिता तथा पं.सुमित्रानन्दन पन्त पुरस्कार से सम्मानित, अभिसूचना अधिकारी के पद पर कार्यरत कविवर राकेश "चक्र" के सम्मान में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया।
गोष्ठी की अध्यक्षता साहित्य शारदा मंच, खटीमा के अध्यक्ष डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने की तथा संचालन पीलीभीत से पधारे कवि देवदत्त "प्रसून" ने किया।
सर्वप्रथम माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण किया गया और डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने माँ की वन्दना प्रस्तुत की।
मेरी गंगा भी तुम, और यमुना भी तुम,
तुम ही मेरे सकल काव्य की धार हो।
जिन्दगी भी हो तुम, बन्दगी भी हो तुम,
गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।
इसके पश्चात रूमानियत के शायर गुरूसहाय भटनागर बदनाम ने अपना काव्यपाठ करते हुए कहा-
तुम क्या गये चमन से, बहारें चलीं गयीं।
हर शाख़-ए-गुल से, गुल की कतारें चलीं गयीं।।
खटीमा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष के
पद पर कार्यरत डॉ.सिद्धेश्वर सिंह ने अपना काव्यपाठ करते हुए कहा-
दो दिन के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली


डर लागे , लागे डर
काँपे जिया थर - थर
झोले में सामान रखा
गिन कर , चुन कर

सहेजे हैं कागज पत्तर
मानो सोने की सिल्ली।
दो दिन के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली ।


कविवर देवदत्त प्रसून ने इस अवसर पर कहा-
यदि तुमको अर्पन हो जाए।
मन मेरा दर्पन हो जाए।।
हास्य व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर गेन्दालाल शर्मा "निर्जन" ने
इस अवसर पर अपने हास्य व्यंग्यों से गोष्ठी में समां बाध दिया।
गोष्टी में मुख्यअतिथि के रूप में पधारे कविवर राकेश "चक्र" ने अपने काव्यपाठ में एक सन्देश देते हुए कहा-
दो ऐसा उपहार कि मैं, हर ओर उजाला कर दूँ।
निर्बल-निर्धन के अधरों पर भी मुस्कानें भर दूँ।।
वाणी मधुर करा दो मेरी, दो हाथों में फूल,
फूलों की खुशबू से जग को खुशबू वाला कर दूँ।।
अन्त में गोष्ठी के आयोजक डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने अपनी निम्न रचना का पाठ किया 

"वर्षा का जल सबको भाया।
पेड़ों ने नवजीवन पाया।।
श्रम करने खेतों में जाएँ।
आओ धान की पौध लगाएँ।।"

और अपना आभार दर्शन प्रदर्शित किया।
इस अवसर पर कविवर राकेश "चक्र" जी का
माल्यार्पण करके कवि "मयंक" द्वारा
अपनी चार पुस्तके भी "चक्र" जी को स्मृतिचिह्न के रूप में भेंट की।
"चक्र" जी ने भी अपनी एक पुस्तक
"एकता के साथ हम" डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" को सादर भेंट की।

"आशा का दीप जलाया क्यों" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मन के सूने से मन्दिर में, आशा का दीप जलाया क्यों?
वीराने जैसे उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों?

प्यार, प्यार है पाप नही है, इसका कोई माप नही है,
यह तो है वरदान ईश का, यह कोई अभिशाप नही है,
दो नयनों के प्यालों में, सागर सा नीर बहाया क्यों?
वीराने जैसे उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों?

मुस्काओ स्वर भर कर गाओ, नगमों को और तरानों को,
गुंजायमान करदो फिर से, इन खाली पड़े ठिकानों को,
शीशे से भी नाजुक दिल मे, ग़म का गुब्बार समाया क्यों?
वीराने जैसे उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों?

स्वप्न सलोने जो छाये हैं, उनको आज धरातल दे दो,
पीत पड़े प्यारे पादप को, गंगा का निर्मल जल दे दो,
रस्म-रिवाजों के कचरे से, यह घर-द्वार सजाया क्यों?
वीराने जैसे उपवन में, सुन्दर सा सुमन खिलाया क्यों?

सोमवार, 25 जून 2012

"तुम भारत के वीर हो-राकेश चक्र"

नौजवान तुम बढ़ो देश के,
इस युग की तस्वीर हो।
कदम से कदम मिलाओ प्यारे,
तुम भारत के वीर हो।
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्!

हुआ सुशोभित प्यारा सारा,
ऊँचा आज हिमालय भाल,
भारत माँ की रक्षा कर लो,
तुम ही हो अनमोल सुलाल।
कार्य करो तुम और भी अच्छे,
फाग खिले और उड़े गुलाल
जग में मान बढ़ाओ प्यारे,
तुम ही तो रणधीर हो।
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्!

मिटे अंधेरा इस भारत का,
तुमको दीप जलाना है।
मन उजियारे सबके होंगे,
गीत प्रीति का गाना है।
भय भागे घर-घर का अब तो,
सुदृढ़ लक्ष्य बनाना है।
सबकी प्यास बुझाओ प्यारे
तुम ही मीठा नीर हो।
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्!

तुम ही हो सुभाष राष्ट्र के,
भगत सरीखे तारे हो।
लाल-बाल और पाल बनो,
शेखर से उजियारे हो।
तुम ही बिस्मिल, तुम ही अब्दुल
तुम ही गाँधी सारे हो।
तुम ही मशाल जलाओ प्यारे
बहती हुई समीर हो।
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्!

तुम ही भ्रष्टाचार मिटाओ,
तुम ही पापाचार को।
सब पंथों का भेद मिटाओ,
और बढ़ाओ प्यार को।
ग्रन्थों का सब ज्ञान पढ़ाकर,
दे दो सारे सार को।
सत् के वृक्ष उगाओ प्यारे,
तुम ही कर्म सुवीर हो।
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्!

माता तुम से मांग रही है,
अब बलिदानी जत्थों को।
तुमको ही रक्षा करना है,
दुश्मन हनें निहत्थों को।
संस्कृति तुम ही बचा सकोगे,
ज्ञान सिखा मनु पुत्रों को।
रक्षा करो आज भाषा की,
ज्ञानवान तदवीर हो।
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्!
राकेश "चक्र"

रविवार, 24 जून 2012

‘‘कैसी रही यह परिभाषा?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

कैसी रही यह परिभाषा?

      आंग्ल-भाषा का पहला शब्द-कोष बनाने वाले डॉ. जॉनसन ने शब्दों को अकारादि क्रम से जोड़ा। लेकिन शब्दों के अर्थ लिखने की बजाय उनकी परिभाषाएँ लिख दीं।
     ऐसा करने की वजह शायद यह रही होगी कि शब्द का अर्थ ठीक से समझ में आ जाये।
उदाहरण के तौर पर-
‘सिगरेट’ का अर्थ उन्होंने लिखा-
‘‘सिगरेट कागज में लिपटा हुआ तम्बाकू है। जिसके एक तरफ धुँआ होता है और दूसरी तरफ एक बेवकूफ।’’

शनिवार, 23 जून 2012

"आओ धान की पौध लगाएँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बादल आये जोर-शोर से।
बारिश बरसी खूब जोर से।।

आँधी आयी, बिजली चमकी।
पहली बारिश है मौसम की।।

भीग गया धरती का आँचल।
झूम रहे खुश होकर जंगल।।

मानसून का मौसम आया।
लू-गर्मी का हुआ सफाया।।

वर्षा का जल सबको भाया।
पेड़ों ने नवजीवन पाया।।

श्रम करने खेतों में जाएँ।
आओ धान की पौध लगाएँ।।

शुक्रवार, 22 जून 2012

"खोलो मन का द्वार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुबह हुई अब तो उठो, खोलो मन का द्वार।
करके पूजा जाप को, लो बुहार घर-बार।१।

सुथरे तन में ही रहे, निर्मल मन का वास।
मोह और छलछद्म भी, नहीं फटकता पास।२।

श्रम से अर्जित आय से, पूरी होती आस।
सागर के जल से कभी, नहीं मिटेगी प्यास।३।

चलना ही है ज़िन्दग़ी, रुकना तो हैं मौत।
सूरज जग रौशन करे, टिम-टिम हों खद्योत।४।

गुरुवार, 21 जून 2012

"आज विनीत चाचा का जन्मदिन है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


चाचा जी खा लेओ मिठाई,
जन्मदिवस है आज तुम्हारा।
महके-चहके जीवन बगिया,
आलोकित हो जीवन सारा।।

बाबा-दादी, पापा-मम्मी,
सब देंगे उपहार आपको।
लेकिन हम बच्चे मिल करके,
देंगे अपना प्यार आपको।।

बूढ़ीदादी-दादा जी भी,
अपने आशीषों को देंगे।
बदले में अपनें बच्चों की,
मुस्कानों से मन भर लेंगे।।

जायेंगें बाजार आज हम,
गुब्बारे लेकर आयेंगे।
खुशी-खुशी हम पूरे घर को,
चाचा आज सजायेंगे।।

आप काटकर केक सलोना,
हमें खिलाना, खुद भी खाना।
दीर्घ आयु पाओ चाचा जी,
जन्मदिवस हर साल मनाना।।
मैं प्राची और भाई प्राञ्जल,
देते तुमको आज बधाई।
इस पावन अवसर पर,
चाची ने भी खुशियाँ खूब मनाई।।

"अब कुमुद खिलने लगेंगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आज नभ पर बादलों का है ठिकाना।
हो गया अपने यहाँ मौसम सुहाना।।

कल तलक लू चल रही थी,
धूप से भू जल रही थी,
आज हैं रिमझिम फुहारें,
लौट आयी हैं बहारें,
बुन लिया है पंछियों ने आशियाना।
हो गया अपने यहाँ मौसम सुहाना।।

हल किसानों ने उठाया,
खेत में उसको चलाया,
धान की रोपाई होगी,
अन्न की भरपाई होगी,
गा उठेगा देश फिर, सुख का तराना।
हो गया अपने यहाँ मौसम सुहाना।।

ताल के नम हैं किनारे,
मिट गयीं सूखी दरारें,
अब कुमुद खिलने लगेंगे,
भाग्य धरती के जगेंगे,
आ गया है दादुरों को गीत गाना।
हो गया अपने यहाँ मौसम सुहाना।।

बुधवार, 20 जून 2012

"तिवारी नहीं हैं बलात्कारी" (पत्रकार दयानन्द पाण्डेय का एक सरगर्भित आलेख)

तिवारी नहीं हैं बलात्कारी
Posted On June 19, 2012 Tags :

महाभारत की बहुत सारी कथाएं हमारे समाज में आज भी कही सुनी जाती हैं। इस में एक किस्सा बहुत मशहूर है। दुर्योधन और अर्जुन का कृष्ण के पास समर्थन मांगने जाने का। जिस में अर्जुन का पैताने बैठना और दुर्योधन का सिरहाने बैठने और फिर कृष्ण द्वारा अर्जुन को पहले देखे जाने और बतियाने का किस्सा बहुत सुना सुनाया जाता है। पर इस पूरे घटनाक्रम में एक घटना और घटी थी जो ज़्यादा महत्वपूर्ण थी पर बहुत कही सुनी नहीं जाती। लोक मर्यादा कहिए या कुछ और। बहरहाल हुआ यह कि दुर्योधन जाहिर है कि पहले ही से पहुंचे हुए थे। और अर्जुन बाद में आए। कृष्ण जैसा कि कहा जाता है कि सोए हुए थे। तो दुर्योधन ने ही अर्जुन के आने पर अर्जुन को संबोधित करते हुए कहा कि, ‘आइए इंद्र पुत्र ! कहिए कैसे आना हुआ?’ अर्जुन ने अपमानित महसूस तो किया पर मौके की नज़ाकत देख चुप रहे। बात खत्म हो गई। पर सचमुच खत्म कहां हुई थी भला? फिर हुआ यह कि जब कृष्ण ने अर्जुन से बात खत्म की और दुर्योधन की तरफ़ मुखातिब हुए तो उन्हों ने दुर्योधन को संबोधित कर पूछा, ‘अब बताइए व्यास नंदन आप का क्या कहना है?’ कृष्ण ने दुर्योधन को व्यास नंदन कह कर दुर्योधन को उस की ज़मीन बताई और अर्जुन के अपमान का प्रतिकार भी किया। दुर्योधन को यह एहसास भी करवा दिया कि अगर अर्जुन अपने पिता पांडु की संतान नहीं हैं तो श्रीमान दुर्योधन आप भी ऋषि व्यास के ही वंशज हैं, संतान हैं, शांतनु के नहीं। गरज यह कि दोनों ही एक तराजू में हैं। इस लिए इस मसले पर चुप ही रहिए। और दुर्योधन चुप रह गए थे। यह विवाद बहुत लंबा है और टेढा भी। शायद इसी लिए याद कीजिए कि जब बी.आर. चोपडा ने महाभारत बनाई तो उस में इस विवाद पर पानी डालने में राही मासूम रज़ा ने अदभुत चतुराई से काम लिया। उन्हों ने पाडव में किसी भी को वायु पुत्र, इंद्र पुत्र आदि नहीं संबोधित किया। उन्हों ने सब को ही कुंती पुत्र कह कर बडी खूबसूरती से काम चला दिया। और यह कोई अनूठा काम राही मासूम रज़ा ने ही नहीं किया। यह शालीनता हमारी परंपरा में भी रही है। जो शायद अब विस्मृत होने लगी है। अब हम असली मुद्दे पर आते हैं। आज की बात पर आते हैं।

नारायणदत्त तिवारी जैसा सदाशय और विनम्र राजनीतिज्ञ व्यक्ति बडी मुश्किल से मिलता है। कम से कम राजनीतिज्ञ तो हर्गिज़ नहीं। और वह भी वह राजनीतिज्ञ जो सत्ता का स्वाद बार-बार किसिम-किसिम से ले चुका हो। लेकिन वही तिवारी जी आज एक व्यर्थ के विवाद में पड गए हैं तो कोई उन के साथ खड़ा नहीं दीखता। न राजनीति में, न मीडिया में, न समाज में। अभी-अभी, बिलकुल अभी खुशवंत सिंह जैसे उदारमना और खुलेपन के हामीदार लेखक और पत्रकार ने भी अपने कालम में इस घटना को ले कर तिवारी जी पर लगभग तंज किया है। यह देश और समाज का दुर्भाग्य है कुछ और नहीं। राजनीतिज्ञों में सहिष्णुता अब लगभग विलुप्त ही है। लेकिन अटल विहारी वाजपेयी और नारायणदत्त तिवारी जैसे राजनीतिज्ञों में यह सहिष्णुता कूट-कूट कर भरी हुई है। सर्वदा से। कम से कम मेरा अनुभव तो यही है। इसी का लाभ ले कर लोग उन्हें बदनाम करने की हद से भी गुज़ार ही देते हैं। नतीज़ा सामने है। तिवारी जी अब बदनामी से भी आगे आरोपों के भंवर में भी घिर गए हैं। जैसे सारे कानूनी और सामाजिक सवाल और नैतिकता, शुचिता आदि की ज़िम्मेदारी तिवारी जी पर ही डाल दी गई है। इस हद तक कि लोग अब उन का मजाक भी उडाने लग गए हैं। यह बहुत ही चिंताजनक और शर्मनाक बात है। क्या व्यक्तिगत जीवन की बातें इस तरह सडक पर ले आई जानी चाहिए? फिर तो समाज नष्ट हो जाएगा। और जो इसी तरह लोग एक दूसरे पर कीचड़ उछालने लग गए तो समाज और जीवन की तमाम व्यक्तिगत बातें कहां से कहां चली जाएंगी क्या इस बात का अंदाज़ा है किसी को?
सीवन जो उघाड़ने पर जो लोग आमादा हो ही जाएंगे तो हमारे बहुत सारे भगवान भी इन सब चीज़ों से बच नहीं पाएंगे। न ही आज के या बहुत से पुराने राजनीतिज्ञ और अधिकारी आदि भी। सवाल और जवाब इतने और इतने किसिम के हो जाएंगे कि समाज रहने लायक नहीं रह जाएगा। आज भी ऐसी और इस किसिम की बहुत सी बातें परदे में हो कर भी बाहर हैं। चर्चा होती है उन बातों की भी जब-तब लेकिन आफ़ द रिकार्ड। निदा फ़ाज़ली ने लिखा ही है कि बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी। सब का डी.एन.ए. लिया ही जाने लगेगा तो न त्रेता युग के लोग बचेंगे, न द्वापर युग के। और यह तो खैर कलियुग है ही। आंच कौरव-पांडव पर भी आएगी और कि भगवान राम भी नहीं बचेंगे। न कोई गली बचेगी न कोई गांव या कोई नगर या कोई कालोनी, कि जहां ऐसी दास्तानें और तथ्य न मिल जाएं। बरास्ता विश्वामित्र-मेनका ही शकुंतला-दुष्यंत की कहानी हमारे सामने है। और ऐसी न जाने कितनी कहानियां हमारे इतिहास से ले कर वर्तमान तक फैली पड़ी हैं। यह और ऐसी कहानियां छुपती नहीं हैं लेकिन मुकुट की तरह सिर पर सजा कर घूमी भी नहीं जातीं। जैसे कि हमारी उज्जवला शर्मा जी और उन के सुपुत्र सर पर मुकुट सजा कर घूम रहे हैं। उज्जवला जी और उन के सुपुत्र तो अब कुछ बीते दिनों से यह कहानी लिए घूम रहे हैं पर हकीकत यह है कि यह कहानी रोहित शेखर के पैदा होते ही लोगों की जुबान पर आ गई थी। राजनीतिक हलकों से होती हुई यह कहानी प्रशासनिक हलकों और मीडिया में भी आई। पर सिर्फ़ चर्चा के स्तर पर। चुहुल के स्तर पर। ठीक वैसे ही जैसे कि अभी भी एक बहुत बडे अभिनेता का पिता अमरनाथ झा को बताया जाता रहा है, जैसे एक पूर्व प्रधानमंत्री का पिता राजा दिनेश सिंह को बताया जाता रहा है। जैसे जम्मू और कश्मीर के एक पूर्व मुख्यमंत्री का पिता जवाहरलाल नेहरु को बताया जाता रहा है। ग्वालियर में एक बंगाली परिवार के बच्चों को अटल बिहारी वाजपेयी का बताया जाता रहा है। विजया राजे सिंधिया तक का नाम लिया गया। लखनऊ में तो मंत्री रहीं एक मुस्लिम महिला जो अब स्वर्ग सिधार गई हैं अटल जी के लिए अविवाहित ही रह गईं। लोहिया के साथ भी ऐसे बहुतेरे किस्से संबंधों के हैं। नेहरु के किस्से एक नहीं अनेक हैं। लेडी डायना से लगायत तारकेश्वरी सिनहा तक के। महात्मा गांधी की भी एक लंबी सूची है। तमाम विदेशी औरतों से लगायत राजकुमारी अमृता कौर, जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती, सरोजनी नायडू, आभा तक तमाम नाम हैं। इंदिरा गांधी तक के रिश्ते नेहरु के पी.ए. रहे मथाई, धीरेंद्र ब्रह्मचारी, दिनेश सिंह, बेज्ज़नेव, फ़ीदेल कास्त्रो आदि तक से बताए जाते रहे हैं। अमरीका के एक राष्ट्रपति ने तो उन्हें एक बार गोद में उठा ही लिया था। सोनिया गांधी के भी कई रिश्ते खबरों में तैरते रहे हैं। माधव राव सिंधिया से लगायत अरुण सिंह तक कई सारे नाम हैं। राजीव गांधी के भी तमाम औरतों से नाम जुडे हुए हैं। मार्ग्रेट अल्वा, सोनलमान सिंह, शैलजा, अरुण सिंह की पत्नी आदि बहुतेरे नाम हैं। संजय गांधी की सूची तो बहुत ही लंबी है। अंबिका सोनी से लगायत रुखसाना सुल्ताना तक के। प्रियंका गांधी का भी यही हाल है। शाहरुख खान तक से उन का नाम जुडा हुआ है। राहुल गांधी का भी नाम अछूता नहीं है। देशी-विदेशी लडकियों के नाम हैं। मुलायम सिंह यादव के साथ भी यह किस्सा रहा है। अब उन के दूसरे पुत्र प्रतीक यादव को ही लीजिए। साधना गुप्ता जी से से उन का विवाह कब हुआ यह कोई नहीं जानता। पर प्रतीक पैदा कब हुए, यह बात बहुत लोग जानते हैं। और स्पष्ट है कि प्रतीक के पैदा होने के बहुत बाद मुलायम सिंह यादव ने उन को अपने साथ रखा। और वह भी पहली पत्नी के निधन के बाद ही। नहीं एक समय तो यही अखिलेश यादव इस मसले पर मुलायम से बगावत पर आमादा हो गए थे। लेकिन यह सब बातें सड़क पर फिर भी नहीं आईं। और मज़ा यह कि साधना जी ने भी पूरी शालीनता बनाए रखी। साध्वी उमा भारती तक नहीं बचीं। उमा भारती और गोविंदाचार्य का रिश्ता सब को मालूम है। यह दोनों विवाह तक के लिए तैयार थे। पर आर.एस.एस. बीच में आ गया। कई उद्योगपतियों और फ़िल्मी सितारों की बात भी जग जाहिर है। अभी नीरा राडिया और टाटा के प्रेम वार्तालाप का टेप आ ही चुका है। तमाम आई.ए.एस. अफ़सरों और तमाम राजनयिक भी ऐसे किस्सों में शुमार हैं। रोमेश भंडारी का स्त्री प्रेम भी हमेशा सुर्खियों में रहा है। कुछ नामी लेखकों-लेखिकाओं की भी बात सुनने को मिलती ही रहती है। लगभग सभी भाषाओं में। हिंदी में भी। खुशवंत सिंह अब तिवारी जी को ले कर चाहे जो लिखें-पढें पर उन के किस्से भी खूब हैं। कई तो उन्हों ने खुद बयान किए हैं। वैसे भी पत्रकारों में तो ऐसे संबंधों की जैसे बरसात है। बिलकुल फ़िल्मी लोगों वाला हाल है। फ़िल्म वालों की बात इस मामले में वैसे भी बहुत मशहूर है। सैकडों नहीं हज़ारो किस्से हैं। कुछ वैसे ही जैसे इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारो हैं ! वैसे चुंबन के लिए मशहूर एक अभिनेता का पिता महेश भट्ट को बताया जाता रहा है। और तो और महेश भट्ट की यातना देखिए कि वह खुद को भी हरामी कहते हैं। उन के पिता भी मशहूर निर्देशक विजय भट्ट हैं। पर चूंकि महेश भट्ट की मां मुस्लिम थीं सो वह चाह कर भी उन से शादी नहीं कर सके। दंगे-फ़साद की नौबत आ गई थी। अपनी इन सारी स्थितियों को ले कर महेश भट्ट ने एक बहुत खूबसूरत फ़िल्म ही बनाई है जन्म ! जिस के नायक कुमार गौरव हैं। पर महेश भट्ट या उन की मां कभी विजय भट्ट की छिछालेदर करने नहीं गईं। खामोशी से स्थितियों को स्वीकार ही नहीं किया बल्कि प्रेम में जो आदर और गरिमा होती है, उसे अब तक निभा भी रहे हैं। बहुत दूर जाने की ज़रुरत नहीं है। फ़िल्म अभिनेत्री नीना गुप्ता ने विवाह नहीं किया है पर एक बेटी की मां हैं। नीना की इस बेटी के पिता मशहूर क्रिकेटर विवियन रिचर्ड हैं। यह सब लोग जानते हैं। नीना गुप्ता भी इस बात को स्वीकार करती हैं। पर वह कभी अपनी या विवियन रिचर्ड की छीछालेदर करने पर उतारु नहीं हुईं। न ही हको-हुकूक मांगने पर आमादा हुईं। फिर यह और ऐसी कहानियों और संबंधों की फ़ेहरिस्त अनंत है। क्या भूलूं, क्या याद करूं? वाली स्थिति है। वैसे भी अब ज़माना लिव-इन-रिलेशनशिप का आ गया है।
हां, जो आप के साथ कहीं छल-छंद हुआ हो तो बात और है। शोषण हुआ हो, आप के साथ कोई धोखा हुआ हो, झांसा दिया गया हो, आप नाबालिग हों तो भी बात समझ में आती है। पर अगर यह सब आप की अपनी सहमति से हुआ हो तो फिर? आप शादीशुदा भी हैं, बच्चे के पिता का नाम स्कूली प्रमाण-पत्रों में आप बी.पी.शर्मा जो आप के आधिकारिक पति रहे हैं, जिन से भी आप ने प्रेम विवाह ही किया था के बावजूद आप को कुछ लोग भडका देते हैं तो आप को याद आता है कि आप के बेटे का पिता तो फला व्यक्ति है । और यह बेटा आप के गर्भ में तब आया जब आप ने कुछ रातें दिल्ली स्थित उत्तर प्रदेश निवास में उस व्यक्ति के साथ हम-बिस्तर हो कर गुज़ारीं। आप यह बताना भूल जाती हैं कि उस व्यक्ति से आप के पहले ही से रागात्मक संबंध रहे हैं। यही नहीं और भी लोगों से आप के रागात्मक संबंध रहे हैं। आप यह भी नहीं बतातीं कि उस आदमी के आवंटित सरकारी बंगले में आप और आप के पिता रहने के लिए जगह मांगते हैं। और वह आदमी शराफ़त में शरण दे देता है। संबंधों में भी आप ही की पहल होती है। नारायणदत्त तिवारी जैसा व्यक्ति बलात्कार तो कर नहीं सकता। यह तो उन के विरोधी भी मानेंगे। हकीकत यह है कि एक समय राज्य मंत्री रहे शेर सिंह तुगलक लेन के एक बंगले में रहते थे। जब नारायणदत्त तिवारी उद्योग मंत्री बने तो उन्हें शेर सिंह का यही बंगला आवंटित हो गया। शेर सिंह और उज्वला शर्मा ने तिवारी जी से उस मकान में बने रहने की इच्छा जताई। तब उज्वला का अपने पति से विवाद शुरु हो गया था। शेर सिंह ने तिवारी जी से यह भी बताया तो तिवारी जी मान गए। यह उन की सहिष्णुता थी। अब उन की इस कृपा पर आप ने उन से खुद संबंध भी बना लिए और उन की सहृदयता का इतना बेजा लाभ लिया। तब तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा जब तक नरसिंहा राव के हित नारायणदत्त तिवारी से नहीं टकराए। तिवारी जी ने अर्जुन सिंह के साथ मिल कर तिवारी कांग्रेस बना ली। तब। और जब नरसिंहा राव और उन की मंडली ने आप को अपने स्वार्थ में भड़काया तो आप भड़क गईं। स्वार्थ में अंधी हो गईं। तिवारी जी को ब्लैक-मेल करने पर लग गईं।
एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। अब उन का यहां नाम क्या लूं? पर जब रोहित शेखर पैदा नहीं हुए थे उस के पहले ही उन्हों ने किसी तरह आप की तिवारी जी से बात-चीत को टेप कर लिया। कहते हैं कि एक समय उन पत्रकार महोदय ने भी आप के मसले पर तिवारी जी को बहुत तंग किया। ब्लैक-मेल किया। पर तिवारी जी ने किसी तरह उस मसले को संभाला। अपनी और आप की इज़्ज़त सड़क पर नहीं आने दी। लेकिन नरसिंहा राव और उन की मंडली आप पर इतनी हावी हो गई कि तिवारी जी दिल्ली से चले लखनऊ। एयरपोर्ट तक आए। पर आप ने जहाज पर चढ़ने नहीं दिया। पता चला बाई रोड आप उन को ले कर चलीं लखनऊ के लिए। बीच में गजरौला रुक गईं। तिवारी जी खबर बन गए। खबर आई कि राव सरकार ने तिवारी जी को गायब करवा दिया। यह आप की नरसिंहा राव से दुरभि-संधि थी। दूसरे दिन खबर आ गई कि वह आप के साथ गजरौला में थे।
माफ़ कीजिए उज्वला जी, आप किसी से अपने बेटे का पितृत्व भी मांगेंगी और उस की पगडी भी उछालेंगी? यह दोनों काम एक साथ तो हो नहीं सकता। लेकिन जैसे इंतिहा यही भर नहीं थी। तिवारी जी की पत्नी सुशीला जी को भी आप ने बार-बार अपमानित किया। बांझ तक कहने से नहीं चूकीं। आप को पता ही रहा होगा कि सुशीला जी कितनी लोकप्रिय डाक्टर थीं। बतौर गाइनाकालोजिस्ट उन्हों ने कितनी ही माताओं और शिशुओं को जीवन दिया है। यह आप क्या जानें भला? रही बात उन के मातृत्व की तो यह तो प्रकृति की बात है। ठीक वैसे ही जैसे आप को आप के पति बी.पी. शर्मा मां बनने का सुख नहीं दे पाए और आप को मां बनने के लिए तिवारी जी की मदद लेनी पड़ी।
खैर, हद तो तब हो गई कि जब आप एक बार लखनऊ पधारीं। तिवारी जी की पत्नी सुशीला जी का निधन हुआ था। तेरही का कार्यक्रम चल रहा था। आप भरी सभा में हंगामा काटने लगीं। कि पूजा में तिवारी जी के बगल में उन के साथ-साथ आप भी बैठेंगी। बतौर पत्नी। और पूजा करेंगी। अब इस का क्या औचित्य था भला? सिवाय तिवारी जी को बदनाम करने, उन पर लांछन लगाने, उन को अपमानित और प्रताणित करने के अलावा और भी कोई मकसद हो सकता था क्या? क्या तो आप अपना हक चाहती थीं? ऐसे और इस तरह हक मिलता है भला? कि एक आदमी अपनी पत्नी का श्राद्ध करने में लगा हो और आप कहें कि पूजा में बतौर पत्नी हम भी साथ में बैठेंगे !
उज्वला जी, आप से यह पूछते हुए थोड़ी झिझक होती है। फिर भी पूछ रहा हूं कि क्या आप ने नारायणदत्त तिवारी नाम के व्यक्ति से सचमुच कभी प्रेम किया भी था? या सिर्फ़ देह जी थी, स्वार्थ ही जिया था? सच मानिए अगर आप ने एक क्षण भी प्रेम किया होता तिवारी जी से तो तिवारी जी के साथ यह सारी नौटंकी तो हर्गिज़ नहीं करतीं जो आप कर रही हैं। जो लोगों के उकसावे पर आप कर रही हैं। पहले नरसिंहा राव और उन की मंडली की शह थी आप को। अब हरीश रावत और अहमद पटेल जैसे लोगों की शह पर आप तिवारी जी की इज़्ज़त के साथ खेल रही हैं। बताइए कि आप कहती हैं और ताल ठोंक कर कहती हैं कि आप तिवारी जी से प्रेम करती थीं। और जब डाक्टरों की टीम के साथ दल-बल ले कर आप तिवारी जी के घर पहुंचती हैं तो इतना सब हो जाने के बाद भी सदाशयतावश आप और आप के बेटे को भी जलपान के लिए तिवारी जी आग्रह करते हैं। आप मां बेटे जलपान तो नहीं ही लेते, बाहर आ कर मीडिया को बयान देते हैं और पूरी बेशर्मी से देते हैं कि जलपान इस लिए नहीं लिया कि उस में जहर था। बताइए टीम के बाकी लोगों ने भी जलपान किया। उन के जलपान में जहर नहीं था, और आप दोनों के जलपान में जहर था? नहीं करना था जलपान तो नहीं करतीं पर यह बयान भी ज़रुरी था?
क्या इस को ही प्रेम कहते हैं?
लगभग इसी पृष्ठभूमि पर गौरा पंत शिवानी की एक कहानी है करिए छिमा। उस कहानी का नायक श्रीधर भी उत्तराखंड का है। और राजनीतिक है। इस कहानी में पिरभावती की बहन हीरावती का जो चरित्र बुना है शिवानी ने वह अदभुत है। अहर्निष संघर्ष, प्रेम और त्याग की ऐसी दुर्लभ प्रतिमूर्ति हिंदी कहानी में क्या दुनिया की किसी भी कहानी में दुर्लभ है। जाने क्यों आलोचकों ने इस कहानी का ठीक से मूल्यांकन नहीं किया। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की उसने कहा था से कहीं कमतर कहानी नहीं है, यह करिए छिमा। बल्कि उस से आगे की कहानी है। कि कहीं प्रेमी की पहचान न हो जाए इस लिए वह अपने नवजात बेटे की हत्या कर बैठती है। और उस का यह करुण गायन: ‘कइया नी कइया, करिया नी करिया करिए छिमा, छिमा मेरे परभू !’ दिल दहला देता है। वस्तुत: कहानी का नायक कहिए या प्रतिनायक श्रीधर उस का प्रेमी भी नहीं है, बल्कि श्रीधर ने तो उसे चरित्रहीनता का आरोप लगा कर गांव से बाहर करवा देता है, पंचायत के एक फ़ैसले से। पर बाद के दिनों में यही श्रीधर एक दिन जंगल से गुज़र रहा होता है कि ज़ोर की बर्फ़बारी शुरु हो जाती है। विवशता में उसे गांव से बाहर जंगल में एक छोटा सा घर बना कर रह रही हीरावती के घर में शरण लेनी पड्ती है। बर्फ़बारी से सारे रास्ते बंद हैं। यहां तक कि हीरावती के घर का दरवाज़ा भी बर्फ़ से बंद हो जाता है। दोनों अकेले ही घर में होते हैं। और कई दिनों तक। बर्फ़ जब छंटती है तब श्रीधर गांव वापस लौटता है। लेकिन इस बीच वह हीरावती के साथ लगातार हमविस्तर हो चुका होता है। उसे पता नहीं चलता पर हीरावती गर्भवती हो जाती है। श्रीधर गांव से चला जाता है। इधर चरित्रहीनता और गर्भ दोनों का बोझ लिए हीरावती मारी-मारी फिरती रहती है। लगभग विक्षिप्त। लेकिन वह किस का गर्भ ले कर घूम रही है, किसी को नहीं बताती। बाद के दिनों में जब उसे बेटा होता है तो वह उसे पैदा होते ही बर्फ़ की नदी में डुबो कर मार डालती है। इस ज़ुर्म में वह जेल भी जाती है। वर्षों बाद जब जेल की कैद से छूट कर आती है, तब तक श्रीधर बड़ा राजनीतिज्ञ हो कर सत्ता के शीर्ष पर आ चुका होता है। हीरावती उस से मिलने जाती है। बडी मुश्किल से वह उस से मिल पाती है। श्रीधर उस से बड़ी नफ़रत से देखता है। और पूछता है कि, ‘तुम ने अपने ही बेटे की हत्या कर दी?’ तो हीरावती कहती है, ‘तो क्या करती भला? आंख, नाक, शकल सब कुछ तो तेरा ही था। सब जान जाते तब? कि तेरा ही है तब?’ श्रीधर ठगा सा रह जाता है, हीरावती की यह बात सुन कर। लेकिन हीरावती यह कर चल देती है। अपने लिए कुछ मांगती या कहती भी नहीं है।
तो एक वह शिवानी की हीरावती है और अब कभी नरसिंहा राव और अब हरीश रावत, अहमद पटेल आदि द्वारा भड़काई गई उज्वला शर्मा हैं। उज्वला प्यार करना बताती हैं और हीरावती तो खैर कुछ जताना या पाना ही नहीं चाहती। न प्यार न अधिकार।
और यह उज्वला जी?
बताइए कि तिवारी जी अपनी पत्नी के श्राद्ध में हैं और उज्वला जी उन के बगल में बैठ कर बतौर पत्नी सारी पूजा करवाने के हठ में पड़ जाती हैं, हंगामा मचा देती हैं। अब कहा जा सकता है कि कहानी और हकीकत में दूरी होती है। हम भी मानते हैं। पर यह भी जानते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है। और फिर शिवानी की इस कहानी का ज़िक्र यहां इस लिए भी किया कि जब यह कहानी छपी थी तो कहानी के नायक श्रीधर में उत्तराखंड के कुछ राजनीतिज्ञों की छवि इस कहानी के दर्पण में भी देखी गई थी। उस में नारायणदत्त तिवारी का भी एक नाम था।
ब्लड टेस्ट के मार्फ़त डी.एन.ए. रिपोर्ट का नतीज़ा अभी आना बाकी है। जाने क्या रिपोर्ट आएगी। लेकिन जो सामाजिक दर्पण की रिपोर्ट है, उस में तिवारी जी को रोहित शेखर का पिता मान लिया गया है। बहुत पहले से। इस बारे में मुकदमा दायर होने के पहले से। बावजूद इस सब के तिवारी जी की जो फ़ज़ीहत उज्वला शर्मा और उन के बेटे ने की है, और अपनी फ़ज़ीहत की चिंता किए बिना की है, वह एक शकुनि चाल के सिवा कुछ नहीं है। यह एक तरह का लाक्षागृह ही है तिवारी जी के लिए। और मुझे जाने क्यों सब कुछ के बावजूद बार-बार लगता है कि नारायणदत्त तिवारी इस लाक्षागृह से सही सलामत निकल आएंगे। निकल आएंगे ही। इसे आप उन के प्रति मेरा आदर भाव मान लें या कुछ और। यह आप पर मुन:सर है।
इस लिए भी कि तिवारी जी ने जाने-अनजाने असंख्य लोगों का उपकार किया है। मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि मेरा भी कई बार उन्हों ने उपकार किया है। बिना किसी आग्रह या निवेदन के। मुझे याद है कि वर्ष १९९८ में मुलायम सिंह यादव के चुनाव कवरेज में संभल जाते समय एक एक्सीडेंट में मैं गंभीर रुप से घायल हो गया था। हमारे साथी जयप्रकाश शाही इसी दुर्घटना में हम सब से बिछड़ गए थे। तिवारी जी तब नैनीताल से चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव के बाद वह मुझ से मिलने लखनऊ के मेडिकल कालेज में आए थे, जहां मैं इलाज के लिए भर्ती था। वह बड़ी देर तक मेरा हाथ अपने हाथ में लिए बैठे रहे थे। मेरी तकलीफ देख कर वह बीच-बीच में रोते रहे थे। जब वह चले गए तो वहां उपस्थित कुछ लोगों ने तंज़ किया कि वह मेरे लिए नहीं, अपनी हार के लिए रो रहे थे। मुझे चुनाव परिणाम की भी जानकारी नहीं थी। तो भी मैं ने उन लोगों से सिर्फ़ इतना भर कहा कि आप लोग चुप रहिए। आप लोग तिवारी जी को अभी नहीं जानते। बताइए भला कि अमूमन लोग जब चुनाव हार जाते हैं तब कुछ दिनों ही के लिए सही सार्वजनिक जीवन से छुट्टी ले लेते हैं। लेकिन तिवारी जी नैनीताल से चल कर मुझे देखने आए थे। बहुत सारे राजनीतिज्ञ तब मुझे देखने आए थे, अटल विहारी वाजपेयी, कल्याण सिंह से लगायत मुलायम सिंह यादव और जगदंबिका पाल तक अनेक राजनीतिज्ञ, अफ़सर, पत्रकार, मित्र, परिवारीजन आदि। पर तिवारी जी की वह आत्मीयता और भाऊकता मेरी धरोहर है। ऐसी अनेक घटनाएं हैं तिवारी जी को ले कर। फ़रवरी, १९८५ में मैं लखनऊ आया था स्वतंत्र भारत में रिपोर्टर हो कर। दो महीने बाद ही अप्रैल, १९८५ में मुझे पीलिया हो गया। मेरे पास छुट्टियां भी नहीं थीं। एक महीने की छुट्टी लेनी ही थी। ली भी। कहीं गया नहीं। तिवारी जी तब मुख्यमंत्री थे। उन्हें मेरी बीमारी का शायद जयप्रकाश शाही से पता चला। उन्हों ने बिना कुछ कहे-सुने मुझे विवेकाधीन कोष से ढाई हज़ार रुपए का चेक भिजवाया। तब मेरा वेतन ११०० रुपए था। एक महीने लीव विदाऊट पे हो गया था। कहीं से पैसे का कोई जुगाड़ नहीं था। तिवारी जी ने यह दिक्कत बिना कहे समझी। और चेक भिजवा दिया। जब यह चेक ले कर एक प्रशासनिक अधिकारी मुझ से मिले तो मैं ने उन से पूछा कि यह कैसा चेक है? तो उन्हों ने बताया कि माननीय मुख्यमंत्री जी के आदेश पर विवेकाधीन कोष का चेक है आप के इलाज के लिए। तब तक मैं विवेकाधीन कोष के बारे में नहीं जानता था। बाद में तो यह विवेकाधीन कोष बहुत बदनाम हुआ पत्रकारों के बीच। मुलायम राज में लोगों ने दस-दस लाख रुपए फ़र्जी स्कूलों के नाम पर बार-बार लिए। खैर बाद में मिलने पर मैं ने तिवारी जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की तो वह लजा गए। बोले कुछ नहीं। बस मुसकुरा कर रह गए।
ऐसे जैसे कुछ उन्हों ने किया ही न हो। यह उन की सहृदयता थी, सहिष्णुता थी। ऐसे अनेक अवसर, अनेक घटनाएं हैं, जो उन की सदाशयता और सहिष्णुता की कहानी से रंगे पड़े हैं। मेरे ही नहीं अनेक के। बहुतेरे पत्रकार लापरवाही में मकान का किराया नहीं जमा कर पाते तो लंबा बकाया हो जाता या फिर बिजली के बिल का लंबा बकाया हो जाता तो तिवारी जी बडी शालीनता से यह व्यवस्था करवा देते। तब पत्रकारों का वेतन बहुत कम होता था और कि आज के दिनों जैसी दलाली भी अधिकतर पत्रकार नहीं करते थे। उन दिनों वह मुख्यमंत्री थे। सड़क पर कभी-कभार हम या हमारे जैसे लोग पैदल या स्कूटर पर भी दिख जाते तो वह काफिला रोक कर मिलते। और हाल-चाल पूछ कर ही गुज़रते। और ऐसा वह बार-बार करते। बाद के दिनों में जब वह उद्योग मंत्री हुए तो बजाज स्कूटर की तब बुकिंग चलती थी। लखनऊ के जिस भी पत्रकार ने उन को चिट्ठी लिखी उस को स्कूटर का आवंटन पत्र आ गया। कई लोगों ने इस का दुरुपयोग भी किया। बार-बार आवंटन मंगाया और स्कूटर ब्लैक किया। धंधा सा बना लिया। लेकिन तिवारी जी की सदाशयता नहीं चूकी।
एक समय वह प्रतिपक्ष में थे। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री। भाजपा के समर्थन से। आडवाणी जी की रथयात्रा और फिर गिरफ़्तारी के बाद भाजपा ने केंद्र की वी.पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया साथ ही उत्तर प्रदेश में मुलायम सरकार से भी। राजीव गांधी से समर्थन के लिए मुलायम मिले। राजीव ने उन का प्रस्ताव स्वीकार करते हुए उन से कहा कि लखनऊ में वह तिवारी जी से भी औपचारिक रुप से ज़रुर मिल लें। तिवारी जी समर्थन के मूड में नहीं थे, यह बात मुलायम जानते थे। सो वह राजीव से सीधे मिले। लेकिन राजीव के कहने पर मुलायम को लखनऊ में तिवारी जी के घर औपचारिक रुप से जाना पड़ा। लेकिन वह खड़े-खड़े गए और खड़े-खड़े ही लौट आए। घर में बैठे भी नहीं। तिवारी जी बहुत अनुनय-विनय करते रहे। अंतत: तिवारी जी ने मुलायम की पहलवानी छवि के मद्देनज़र कहा दूध तो पी लीजिए। संयोग से उस दिन नागपंचमी भी थी। मुलायम समझ गए तिवारी जी के इस तंज़ को। बोले, ‘अब दूध विधानसभा में ही पिलाना।’ और चले गए।
सचमुच मुलायम को विधानसभा में तब का दूध पिलाना कांग्रेस आज तक भुगत रही है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस तब जो साफ हुई फिर खड़ी हो नहीं पाई। तिवारी जी असल में दूरदर्शी राजनीतिज्ञ हैं। योजनाकार भी विरल हैं। तमाम-तमाम योजनाएं और परियोजनाएं उन्हों ने न सिर्फ़ बनाई हैं, उन्हें साकार भी किया है। मुझे याद है उत्तर प्रदेश में वर्ड बैंक की मदद से रोड कांग्रेस उन्हों ने ही शुरु किया था। नोएडा जैसी तमाम योजनाएं उन्हीं की बनाई योजनाएं है। ऐसी तमाम योजनाओं को उन्हों ने फलीभूत किया है। उत्तर प्रदेश में भी और उत्तराखंड में भी। पर लोग अब उन के इन सारे गुणों को, इन पक्षों को भूल गए हैं। उन की छवि एक औरतबाज़ राजनीतिज्ञ की बना दी गई है। इस से तकलीफ़ होती है। अरे, आप ही लोग बताएं कि ऐसा कौन सा पुरुष है जिसे औरतों से गुरेज हो भला? और ऐसा कौन सा राजनीतिज्ञ है जिस की सूची में दस-पांच औरतों का नाम न जुडा हो? कल्याण सिंह तो कुसुम राय के चक्कर में बरबाद हो गए। तो क्या कल्याण सिंह के पास सिर्फ़ कुसुम राय भर ही हैं या थीं? और कि कुसुम राय के नाम पर कल्याण सिंह और भाजपा दोनों को ही किनारे लगवाने वाले राजनाथ सिंह के नाम के साथ क्या औरतों की सूची नत्थी नहीं है? बात तो बस फिसल गए तो हर गंगे की ही है।
अब बात उठती है नैतिक-अनैतिक की। लोहिया कहते थे कि अगर ज़ोर-ज़बरदस्ती न हो, शोषण न हो, आपसी सहमति हो तो कोई संबंध अनैतिक नहीं होता। और लोहिया सही कहते थे। तिवारी जी ने उज्वला शर्मा के साथ न कोई ज़बरदस्ती की, न शोषण किया। सारी बात आपसी सहमति की थी। उज्वला जी नादान नहीं थीं। गरीब मजलूम नहीं थीं। एक मंत्री की बेटी थीं, विवाहित थीं। उन को कोई हक नहीं कि इस तरह की बात करें। हां जो शेखर के पैदा होते ही जो उन्हों ने यह आवाज़ उठाई होतीं तो उन की बात में दम होता। अच्छा कितने लोग यह बात जानते हैं कि तलाक के बाद अब भी वह अपने पति बी.पी. शर्मा के साथ ही नई दिल्ली की डिफ़ेंस कालोनी में रहती हैं। फ़र्क बस इतना है कि दोनों के फ़्लैट दिखावे के लिए ऊपर-नीचे के हैं। और फिर इस पूरी कवायद में बी.पी. शर्मा का पक्ष नदारद है।
तो क्या उज्वला शर्मा या रोहित शर्मा ने यह सारी जंग नारायणदत्त तिवारी की संपत्ति प्राप्त करने के लिए की है? यह एक अनुत्तरित सवाल है।
इस लिए भी कि नारायणदत्त तिवारी कोई ज़मीदार नहीं रहे हैं। खांटी समाजवादी स्वभाव के हैं और रहे हैं। एक औरतों वाले दाग को छोड दीजिए तो तिवारी जी पर कोई ऐसा-वैसा दाग नहीं है। तब जब कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के वह एक नहीं चार बार मुख्यमंत्री रहे हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे हैं। आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रहे हैं। केंद्र सरकार में उद्योग मंत्री, वित्त मंत्री, वाणिज्य मंत्री आदि कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। नैनीताल की जनता ने १९९१ में जो उन्हें विजयी बनाया होता तो तय मानिए वह देश के प्रधान मंत्री भी हुए ही हुए होते। और शायद देश की दशा और दिशा कुछ और ही होती। खैर अभी तक भूल कर भी उन पर भ्रष्टाचार या कदाचार के आरोप नहीं लगे हैं। न ही सचमुच उन्हों ने दाएं बाएं से पैसा कमाया है। अभी भी वह सरकारी मकान में रहते हैं। जो बतौर पूर्व मुख्य मंत्री उन्हें औपचारिक रुप से मिला हुआ है। उन के छोटे भाई अभी भी लखनऊ में स्कूटर पर चलते दिख जाते हैं। तो तिवारी जी के पास अकूत संपत्ति तो छोड़िए मामूली संपत्ति भी नहीं है। नारायणदत्त तिवारी कोई मुलायम सिंह यादव या मायावती परंपरा के मुख्यमंत्री भी नहीं रहे। न ही ए. राजा आदि की परंपरा के केंद्रीय मंत्री। तो उन के पास पैतृक संपत्ति के सिवाय कोई अतिरिक्त संपत्ति मेरी जानकारी में तो नहीं है। किसी के पास हो इस की जानकारी तो ज़रुर बताए। तिवारी जो तो अब की चुनाव में अपने भतीजे मनीष तिवारी तक को जितवा नहीं पाए। अभी सोचिए कि यही उज्वला शर्मा का पाला अगर प्रमोद महाजन, मुलायम या अमरमणि त्रिपाठी टाइप किसी राजनीतिज्ञ से पडा होता तब परिदृष्य क्या होता भला?
तो तिवारी जी की भलमनसाहत और उन की सहिष्णुता का, उन के सहृदय होने का इतना लाभ तो मत लीजिए उज्वला जी और रोहित शेखर जी। उन के शिष्ट और सभ्य होने का इम्तहान-दर-इम्तहान लेना ठीक नहीं है। कि लोग उन का मजाक उड़ाने लग जाएं। जानिए कि नारायणदत्त तिवारी जैसे राजनीतिज्ञ बड़े सौभाग्य से किसी समाज और देश को मिलते हैं। वह हमारी साझी धरोहर हैं। उन्हें सम्मान और उन की गरिमा देना अब से ही सही सीखिए उज्वला जी और रोहित जी ! यह आप के हित में भी है और समाज के भी हित में। हो सके तो यह मामला मिल बैठ कर सुलटा लीजिए। तिवारी जी की टोपी उछाल कर नहीं। फ़िल्म की ही जो चर्चा एक बार फिर करें तो एक फ़िल्म है ‘एकलव्य’। राजस्थानी पृष्ठभूमि पर आधारित इस फ़िल्म में एक रजवाड़े की कहानी में अमिताभ बच्चन एक राज परिवार में नौकर हैं। पर राजकुमार के पिता भी हो जाते हैं। फ़िल्म की कहानी तमाम उठा-पटक और ह्त्या दर हत्या में घूमती है। पर आखिर में राजकुमार बने सैफ़ अली खान उन्हें पूरे सम्मान से सार्वजनिक रुप से पिता कुबूल करते हैं, आप की तरह अपमान दर अपमान की कई इबारतें लिख कर नहीं। किसी को पिता कुबूल करना ही है तो उसे पिता जैसा सम्मान दे कर कुबूल कीजिए। पर आप लोग तो अपमानित करने पर तुले हैं। खैर।
सोचिए उज्वला जी कि अगर तिवारी जी भी आप की तरह आप की ईटें उखाडने लग जाएंगे तो आप क्या कर लेंगी? अभी तो वह शालीनतावश अपने खून का सैंपल देने से बचते रहे हैं, जो अब दे भी दिया है। लेकिन कहीं वह भी ईंट का जवाब पत्थर से देने पर आ जाते या आ ही जाएं तो आप का क्या होगा? अदालती धूर्तई तो यह कहती है कि तिवारी जी भी सवाल खड़े कर दें कि क्या आप शेर सिंह की बेटी हैं भी कि नहीं? आप के पति बी.पी. शर्मा भी अपने पिता के हैं कि नहीं। आदि-आदि। और जब ईंट खुदने ही लगेगी हर किसी की तो कहीं न कही बहुत नहीं तो कुछ लोग तो ज़रुर ही व्यास नंदन की राह पर आ जाएंगे। फिर क्या होगा इस समाज और इस समाज की शालीनता का? तब तो और जब आप का शोषण न हुआ हो, आप के साथ ज़ोर-ज़बर्दस्ती-बलात्कार न हुआ हो।
मेरा मानना है कि इस पूरे मामले को इस दर्पण में भी देखा जाना चाहिए। एकतरफ़ा तिवारी जी को दोषी बता देना ठीक नहीं है। वह चाहे समाज दोषी ठहराए या कोई अदालत। यह व्यक्तिगत मामला है, इसे व्यक्तिगत ही रहने देना चाहिए। इस लिए भी कि नारायणदत्त तिवारी कोई बलात्कारी नहीं हैं। एक सभ्य और शिष्ट व्यक्ति हैं। उन को उन का सम्मान दिया जाना चाहिए। जिस के कि वह हकदार हैं। ध्यान रखिए कि तिवारी जी हमारी साझी धरोहर हैं। राष्ट्रपति चुनाव के शोर में तिवारी जी का यह पक्ष भी बहुत ज़रुरी है। इस लिए भी कि, ‘पूछा कली से कुछ कुंवारपन की सुनाओ, हज़ार संभली खुशबू बिखर जाती है।’ आमीन !
दयानंद पांडेय

दयानंद पाण्डेय से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है


तिवारी नहीं हैं बलात्कारी

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-अच्छा लगता है -एक गीत" -नाच रहा इंसान -बादल -सन्देश- :(नवीन जोशीःनवीन समाचार से साभार) :ताजमहल का सच :स्वर-अर्चना चावजी का !!रावण या रक्तबीज!! ''धान खेत में लहराते" 'आप' का अन्दाज़ बिल्कुल 'आप' सा 'गबन' और 'गोदान' 'सिफत' के लिए शुभाशीष ‘‘चम्पू छन्द’’ ‘‘बाल-गीत’’ ‘‘वन्दना’’ ‘‘हाइकू’’ ‘कुँवर कान्त’ ‘क्षणिका’ ‘ग़ज़लियात-ए-रूप’ ‘चन्दा और सूरज’ ‘भूख ‘रूप’ का इस्तेमाल मत करना ‘रूप’ की महताब ‘सुख का सूरज’ को पढ़ने का अनुभव " (सौंदर्य) Beauty by John Masefield" अनुवादक - डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' " दुखद समाचार" मेरे पिताश्री श्रद्धेय घासीराम आर्य जी का देहावसान " रावण सारे राम हो गये "1975 में रची गयी मेरी एक पेशकश" "5 मार्च-मेरे पौत्र का जन्मदिवस" "अनोखा संस्मरण" "अपना वतन" "अमर वीरंगना लक्ष्मीबाई का 193वाँ जन्मदिवस" "अमलतास खिलता मुस्काता" "आज से ब्लॉगिंग बन्द" (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक') "आजादी का जश्न" "आजादी की वर्षगाँठ" "ईद मुबारक़" "उल्लू" "कुहरा पसरा है गुलशन में" "क्षणिका" "खटीमा का छोटी लाइन से बड़ी लाइन तक का ऐतिहासिक सफर" "खेतों में शहतूत उगाओ" "गधा हो गया है बे-चारा" "गिलहरी" "गोबर लिपे हुए घर" "चिड़िया रानी" "जग का आचार्य बनाना है" "जय विजय का अप्रैल-2018 का अंक" "जय विजय का नवम्बर-2020 का अंक" "जय विजय का सितम्बर-2019 का अंक" "जय विजय के अगस्त-2016 अंक में प्रकाशित" "जय विजय के दिसम्बर अंक में "जय-विजय "जय-विजय-जुलाईः2016" "जाड़े पर आ गयी जवानी "ज्येठ भ्राता सम मेरे बहनोई मा. रघुनन्दन प्रसाद" "टुकड़ा-Fragment' a poem by Amy Lowell" "टुकड़ा" (Fragment' a poem by Amy Lowell) "ढल गयी है उमर" "ताऊ डॉट इन पर 2009 में मेरा साक्षात्कार" "तेरह सितम्बर-ज्येष्ठ पुत्र का जन्मदिन" "दीपावली" "दो जून की रोटी" "दो फरवरी" छोटेपुत्र की वैवाहिक वर्षगाँठ "दोहा दंगल में मेरे दोहे" "नया-नवेला साल" "नववर्ष" "नूतन भारत के निर्माता पं. नेहरू को नमन" "पर्यावरण-दिवस" "पावन प्यार-दुलार" "पितृ दिवस पर विशेष" "पुस्तक दिवस" "पैंतालिसवीं वैवाहिक वर्षगाँठ" "प्राणों से प्यारा है अपना वतन" "बचपन" "बच्चों का संसार निराला" "बसन्त पञ्चमी" "भइया दूज का तिलक" "भारत को करता हूँ शत्-शत् नमन" "भावावेग-कुन्दन कुमार" "मातृ दिवस" "मित्र अलबेला खत्री की 5वीं पुण्य तिथि पर" "मूरख दिवस" "मेरी पसन्द के पाँच दोहे" "मेरी मुहबोली बहन" "मौसम के अनुकूल बया ने "रूप की अंजुमन" से ग़ज़ल "रेफ लगाने की विधि और उसका उच्चारण" "लगा रहे हैं पहरों को" "विविध दोहावली" "विश्व रंग-मंच दिवस" "विश्व हिन्दीदिवस" "व्योम में घनश्याम क्यों छाया हुआ?" 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"साहित्य सुधा-अक्टूबर (प्रथम) में "सिसक रहे शहनाई में" "सीधा प्राणी गधा कहाता" "सीधी-सच्ची बात" "सुनानी पड़ेगी ग़ज़ल धीरे-धीरे" "हम तुम्हें हाल-ए-दिल सुनाएँगे" "हमारा गणतन्त्र" "हमारे प्रधानमन्त्री मोदी जी का जन्मदिन" "हमीं पर वार करते हैं" “अरी कलम! तू कुछ तो लिख” “एहसास के गुंचे” “ग़ज़लियात-ए-रूप” तथा “स्मृति रपट “गुरुओं से सम्वाद” “नदी सरोवर झील” “प्रकाश स्तम्भ” “बीमार गुलाब:William Blake” “रूप” को मोम के पुतले घड़ी भर में बदलते हैं “रूप” सुखनवर तलाश करता हूँ “लौट चलें अब गाँव” “सकारात्मक अर्थपूर्ण सूक्तियाँ” “सम्वेदना की नम धरा पर” “हरेला” “हिन्दी व्यञ्जनावली-पवर्ग” “DEATH IS A FISHERMAN" BY BENJAMIN FRANKLIN (जय विजय (डॉ. महेन्द्र प्रताप पाण्डेय 'नन्द') (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') ♥ फोटोफीचर ♥ 1111 13 सितम्बर 13 सितम्बर- नितिन तुमको हो मुबारक जन्मदिन 15वीं वर्षगाँठ १‍६००वीं पोस्ट 17-04-2015 (शुक्रवार) को प्रातः 10 बजे से यज्ञ (हवन) तत्पश्चात श्रद्धांंजलि 1800वीं पोस्ट 1901वाँ पुष्प 2000वीं पोस्ट 2016 2017 2017 में मेरा गीत प्रकाशित 2017 में मेरी बालकविता 2019 2019 में मेरी 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बसन्त अतिवृष्टि अतुकान्त अदाओं की अपनी रवायत रही है अद्भुत अपना देश अध्यापक की बात अध्यापक दिवस अनज़ान रास्तों पे निकलना न परिन्दों अनीता सैनी अनुत्तरित प्रश्न अनुबन्धों का प्यार अनुबन्धों की मत बात करो अनुभावों की छिपी धरोहर अनुभावों की धरोहर अनुवाद अनुवादक : डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक” अनोखा संस्मरण (परलोक) अनोखी गन्ध अन्त किया अत्याचारी का अन्तरजाल अन्तरजाल हुआ है तन अन्तरराष्ट्रीय नारि-दिवस पर दो व्यंग्य रचनाएँ अन्तर्जाल अन्तर्राष्टीय मूर्ख दिवस अन्तर्राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मेलन की चित्रावली अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस अन्तस् मैले हैं अन्धविश्वास या इत्तफाक अन्धा कानून अन्न उगाओ अन्नकूट अन्नकूट (गोवर्धनपूजा) अन्नकूट पूजा अन्नकूट पूजा करो अन्नकूट/गोवर्धन पूजा अन्ना अन्ना हजारे अन्ना-रामदेव अन्र्तरजाल अपना गणतन्त्र अपना चौकीदार अपना दामन सिलना होगा अपना देश महान अपना धर्म निभाओगे कब अपना नीड़ बनाया है अपना नैनीताल अपना बना गया कोई अपना भगवा रंग अपना भारत देश अपना भारत देश महान अपना शीश नवाता हूँ अपना हिन्दुस्तान अपना है गणतंत्र महान अपनायेंगे योग अपनावतन अपनी आजादी अपनी भाषा मौन अपनी भाषा हिन्दी अपनी माटी गीत सुनाती अपनी मुरलिया बना तो अपनी मेहनत से मुकद्दर को बनाना चाहिए अपनी रक्षा का बहन अपनी वाणी मधुर बनाओ अपनी हिन्दी अपनीआजादी अपनीबात अपने छोटे से जीवन में अपने ज़माने याद आते हैं अपने पैर पसार चुका है अपने भारत को करता हूँ शत्-शत् नमन अपने मन को बहलाते हैं अपने वीर जवान अपने शब्दों में धार भरो अपने सढ़सठ साल अपने हिन्दुस्तान की अफजलगुरू अब आ जाओ कृष्ण-कन्हैया अब आँगन में वृक्ष अब इस ओमीक्रोन से अब कागा की काँव में अब कैसे सुधरें हाल सुनो अब गर्मी पर चढ़ी जवानी अब जगत के बन्धनों से मुक्त होना चाहता हूँ अब जम्मू-कश्मीर की ध्वस्त करो सरकार अब जूते के सामने अब झूठे सम्मान अब तक का लोखा जोखा अब तो करो प्रहार अब तो जम करके बरसो अब तो दुआ-सलाम अब तो युद्ध जरूरी है अब न कुठाराघात करो अब नीड़ बनाना है अब पढ़ना मजबूरी है अब पैंतालिस वर्ष अब बसन्त आने वाला है अब बसन्त आयेगा अब भी वीर सुभाष के अब मिट गया वजूद अब मेरे सिर पर नहीं अब हिन्दी की धूम अबकी बार दिवाली में अभिनय करते लोग अमन अमन का सन्देश अमन चाँदपुरी अमन हो गया गोल अमर बारती अमर भारती जिन्दाबाद अमर रहे साहित्य अमर रहेगा जगत में अमर वीरंगना लक्ष्मीबाई की 159वीं पुण्यतिथि अमर वीरंगना लक्ष्मीबाई के 185वें जन्मदिवस पर अमर वीरांगना महारानी लक्ष्मी बाई अमर वीरांगना लक्ष्मीबाई और श्रीमती इन्दिरा गांधी का जन्मदिवस अमरउजाला अमरभारती अमरभारती पहेली 100 के परिणाम अमरूद अमरूद गदराने लगे अमल-धवल होता नहीं अमलतास अमलतास का रूप अमलतास के झूमर अमलतास के पीले गजरे अमलतास के पीले झूमर अमलतास के फूल अमलतास खिलता-मुस्काता अमलतास तुम धन्य अमलतास राहत पहुँचाता अमिया अम्बेदकर जी का जन्मदिन अयोध्या पर फैसला अरमानों की डोली अर्चना चावजी अर्चना चावजी और रचनाबजाज अर्चना-रचना अर्चाना चावजी अर्द्धकुम्भ की धूम अलग-अलग हैं राग अलबेला खत्री जी को श्रद्धाजलि अलाव असली 'रूप' दिखाता दर्पण असार-संसार अस्तित्व अस्मत बचाना चाहिए अहंकार की हार अहसास अहोई अष्टमी अहोईअष्टमी आ गई गुलशन में फिर बहार आ गया नव वर्ष फिर से आ गया बसन्त. बसन्तपंचमी आ गयी दीपावली आ गये नेता नंगे आ गये फकीर हैं आ गये बादल आ जाओ अब कृष्ण-कन्हैया आ जाओ गोपाल आ भी आओ चन्द्रमा आ भी आओ चन्द्रमा तारों भरे आकाश में आ भी जाओ! आ हमारे साथ श्रम को ओढ़ ना आँखें आँखें कर देतीं इज़हार आँखें कुदरत का उपहार आँखें नश्वर देह का आँखों का उपहार आँखों का दर्पण आँखों के बिन जग सूना है आँखों में होती है भाषा आँचल में है दूध और आँसू आँसू औ’ मुस्कान आँसू का अस्तित्व आँसू की कथा-व्यथा आँसू यही बताते हैं आइना आई चौदस रूप की आई फिर से लोहिड़ी आई फिर से लोहिड़ी आई फिर से लोहिड़ी लेकर नवल उमंग। आई फिर से लोहिड़ी लेकर नवल उमंग। आई फिर से होली आई बसन्त-बहार आई होली आई होली रे आओ अपना धर्म निभाएँ आओ गौतम बुद्ध आओ तिरंगा फहरायें आओ दीप जलायें हम आओ दूर करें अँधियारा आओ पेड़ लगायें हम आओ प्यार की बातें करें आओ मोहन प्यारे आओ आग के बिन धुँआ नहीं होता आग बरसती धरा पर आगत का स्वागत करने में आगरा आगे बढ़ना आसान नहीं आगे बढ़िए-आगे बढ़िए.... आचमन के बिना आचरण आचरण होता नहीं आचार की बातें करें आचार्य देवेन्द्र देव आज अहोई पर्व आज आदमी बौना है आज और कल का भेद आज करवाचौथ पर मन में हजारों चाह हैं आज का नेता आज कुछ उपहार दूँगा आज के परिवेश में आज खिले कल है मुरझाना आज तो मूर्ख भी दिवस है ना आज दिवस प्रस्ताव आज नदारद प्याज आज नीम की छाँव आज पुरवा-बयार आयी है आज फिर बारिश डराने आ गयी आज बरखा-बहार आयी है आज बहनों की हैं ये ही आराधना आज बहुत है शोक आज मेरे देश को सुभाष चाहिए आज रफायल बन गया आज विश्व हिन्दी दिवस आज शाखाएँ बहकी आज शिक्षक दिवस है आज सुखद संयोग आज सुखद-संयोग आज हम खेलें ऐसी होली आज हमारी खिलती बगिया आज हा-हा कार सा है आज हारी है अमावस आज हुई बरसात आज-कल आजाद भारत आजाद हिन्दुस्तान के नारे बदल गये आजादी आजादी अक्षुण्ण हमारी आजादी करती है आज सवाल आजादी का तन्त्र आजादी का तोहफा आजादी का पर्व आजादी का मन्त्र आजादी की वर्षगाँठ आजादी मुझको खलती है आठ दोहे आठ मार्च-आठ दोहे आड़ू आतंक को पाल रहा नापाक आतंकवाद आतंकी आती इन्दिरा याद आते हैं बदलाव आदत में अब चाय समायी आदत है हैवानों की आदमी का चमत्कार आदमी तो आज फिर से ताज पा गया आदमी से अच्छे जानवर आदमी ही बन गये हैं आदिदेव कर दीजिए बेड़ा भव से पार आधा "र्" का प्रयोग आधी आजादी आन-बान आने वाला है नया साल आने वाला है बसन्त आप सबको मुबारक नया वर्ष हो आपका एहतराम करते हैं आपके बिन मेरी होली सूनी है। आपदा आफत मचाने आ गयी आपस के सम्बन्ध आपस में तकरार आपस में मतभेद आपस में सुर मिलाना आपाधापी आफत की बरसात आफत के परकाले आभार आभारदर्शन आभासी दुनिया आभासी संसार आभासी संसार में आम आम और लीची आम और लीची का उदगम आम के वास्ते अब कहाँ तन्त्र है आम गया है हार आम दिलों में खास आम पिलपिले हो भले आम पेड़ पर लटक रहे हैं आम में ज़ायका नहीं आता आम हो गया खास का आम-नीम बौराये फिर से आमआदमी आमन्त्रण आया नया निखार आया नहीं सुराज आया पास किनारा आया फागुन मास आया बसन्त आया भादौ मास आया मधुमास आया राखी का त्यौहार आया है ऋतुराज आया है त्यौहार ईद का आया है त्यौहार तीज का आया हैं मधुमास आयी रेल आयी सावन तीज आयी है बरसात आयी है शिवरात आयी होली आयी होली-आयी होली आये सन्त कबीर आये हैं शैतान आयेगा इस बार भी नया-नवेला साल आरती आरती उतार लो आरती उतार लो आ गया बसन्त है आराधना आर्य समाज: बाबा नागार्जुन की दृष्टि में आलिंगन उपहार आलिंगन/चुम्बन दिवस आलिंगनदिवस आलू आलूबुखारा आलेख आलोकित परिवेश आल्हा आवश्यक सामान आवश्यक सूचना आवागमन आशा आशा का चमत्कार आशा का दीप जलाया क्यों आशा के दीप जलाओ तो आशा पर उपकार टिका है आशा शैली आशा है आशाएँ मुस्काती हैं आशाएँ विश्वास जगाती आशाओं पर प्यार टिका है आशियाना चाहिए आशीष का आशीष तुम्हें मैं देता आशु-कविता आसमान आसमान का छोर आसमान की झोली से... आसमान के दीप आसमान में आसमान में कुहरा छाया आसमान में छाये बादल आसमान में बादल छाया आस्था-विश्वास आह्वान इंसान बदलते देखे हैं इंसानियत का रूप इंसानी पौध उगाओ इंसानी भगवानों में इक मौन-निमन्त्रण तो दे दो इक शामियाना चाहिए इतनी मत मनमानी कर इतने न तुम ऐंठा करो इनकी किस्मत कौन सँवारे इन्तज़ार इन्दिरा गांधी इन्दिरा! भूलेंगे कैसे तेरो नाम इन्द्र बहादुर सेन इन्द्रधनुष का चौमासे में “रूप” हमें दिखलाते हैं इन्द्रधनुष का रूप हमें दिखलाते हैं इन्द्रधनुष के रंग निराले इन्सानी भगवानों में इबादत इमदाद आयेगी इलज़ाम के पत्थर इल्म रहता पायदानों में इशारे समझना इस जीवन की शाम ढली इस धरा को रौशनी से जगमगायें इस नये साल में ईद ईद और तीज आ गई है हरियाली ईद का चाँद आया है ईद तीज आ गई है हरियाली ईद मनाई जाती है ईद मुबारक़ ईद-दिवाली-होली मिलकर ईमान बदलते देखे हैं ईवीएम में बन्द ईश्वर के आधीन उगता दिल में प्यार उगने लगे बबूल उग्रवाद-आतंक का उच्चारण की सबसे लोकप्रिय प्रविष्टि उच्चारण खामोश उजड़ गया है तम का डेरा उजड़ गया है नीड़ उज्जवल-धवल मयंक उड़ जायें जाने कब तोते उड़ता गर्द-गुबार उड़ता बग़ैर पंख के नादान आज तो उड़ती हुई पतंग उड़तीं हुई पतंग उड़नखटोला द्वार टिका है उड़नखटोला-यान उड़ान उड़ान में प्रकाशित उतना पानी दीजिए जितनी जग को प्यास उतना ही साहस पाया है उत्कर्षों के उच्च शिखर पर चढ़ते जाओ उत्तर अब माकूल उत्तराखण्ड उत्तराखण्ड का पर्व हरेला उत्तराखण्ड का स्थापना दिवस और संक्षिप्त इतिहास उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक धरोहर उत्तराखण्ड के कर्मठ मुख्यमन्त्री उत्तराखण्ड के पर्व हरेला पर विशेष उत्तराखण्ड राज्य स्थापनादिवस उत्तराखण्ड राज्य का स्थापना दिवस उत्तरायणी उत्तरायणी पर्व उत्तरायणी-मकर संक्रान्ति उत्तरायणी-लोहड़ी उत्सव ललित-ललाम उत्सव हैं उल्लास जगाते उद्धव की सरकार उन्मीलन पत्रिका में मेरा एक गीत उन्हें हम प्यार करते हैं उपन्यास सम्राट को उपमा में उपमान उपवन के फूल उपवन मुस्कायेगा उपवन में अब रंग उपवन में हरियाली छाई उपवन” का विमोचन उपसर्ग और प्रत्यय उपहार उपहार में मिले मामा-मामी उपासना में वासना उमड़-घुमड़ कर आये बादल उमड़ा झूठा प्यार उमड़ी पर्वत से जल धारा उम्मीद मत करना उम्र छियासठ साल हो गयी उलझ गया है ताना-बाना उलझ गये हैं तार उलझ रहे हैं तार उलझा है ताना-बाना उलझे हुए सवाल उलझे हुए सवालों में उल्फत के ठिकाने खो गये हैं उल्लास का उत्तरायणी पर्व उल्लू और गदहे उल्लू का आतंक उल्लू की परवाज उल्लू की है जात उल्लू जी का भूत उसका होता राम सा उसूल नापता रहा उसूल बाँटता रहा ऋतुएँ तो हैं आनी जानी ऋतुराज ऋतुराज प्रेम के अंकुर को उपजाता ऋषियों की सन्तान ऋषियों की हम सन्ताने हैं ए.पी.जे.अब्दुल कलाम को श्रद्धाञ्जलि एक अशआर एक कविता और एक संस्मरण एक गीत एक गीत-एक कविता एक दिन तो मचल जायेंगे एक दोहा एक ग़ज़ल. झाड़ू की तगड़ी मार एक दोहा और गीत एक नज़्म एक निवेदन एक पुराना गीत एक बालकविता एक मुक्तक एक मुक्तक पाँच दोहे एक रचना एक रहो और नेक रहो एक समय का कीजिए दिन में अब उपवास एक समान विधान से एक हजार एक-विचार एककविता एकगीत एकगीत एकता की धुन बजायें एकल कवितापाठ एकाकीपन एतबार अपने पे कम हैं एतिहासिक विवरण एप्रिलफूल एमिली डिकिंसन एमीलोवेल एला और लवंग एला व्हीलर विलकॉक्स एसी-कूलर फेल ऐ दुलारे वतन ऐतिहासिकआलेख ऐसा करो उपाय ऐसे घर-आँगन देखे हैं ऐसे पुत्र भगवान किसी को न दें ऐसे होगा देश महान ओ जालिम-गुस्ताख ओ बन्दर मामा ओ मेरे मनमीत ओटन लगे कपास ओम् जय शिक्षा दाता ओले ओलों की बरसात ओसामा और अब कितना चलूँगा...? और न अब हिमपात करो कंकड़ और कबाड़ कंकरीट की ठाँव में कंकरीटों ने मिटा डाला चमन कंचन सा रूप कंजूस मधुमक्खी कंस आज घनश्याम हो गये ककड़ी ककड़ी खाने को करता मन ककड़ी बिकतीं फड़-ठेलों पर ककड़ी मौसम का फल अनुपम ककड़ी लम्बी हरी मुलायम ककड़ी-खीरा खरबूजा है कट्टरपन्थी जिन्न कठमुल्लाओं की कटी कठिन झेलना शीत कठिन बुढ़ापा बीमारी है कठिन बुढ़ापा होता है कठिन हो गया आज गुज़ारा कड़ाके की सरदी में ठिठुरा बदन है कड़ी धूप को सहते हैं कड़ुए दोहे कथा कथानक क़दम क़दम पर घास कदम बड़ायेंगे कदम मिला कर चल रहा जीवनसाथी साथ कदम-कदम पर घास कनकइया की डोर तुम्हारे हाथो में कनिष्ठ पुत्र विनीत का जन्मदिन कनेर मुस्काया है कपड़े का पंडाल कब चमकेंगें नभ में तारे कब तक तुम सन्ताप भरोगे? कब तक मौन रहोगे कब बरसेंगे बादल काले कबूतर का घोंसला कभी आकाश में बादल घने हैं कभी उम्मीद मत करना कभी कुहरा कभी न उल्लू तुम कहलाना कभी न करना भंग कभी न करना माफ कभी न टूटे मित्रता कभी भी लाचार हमको मत समझना कभी सूरज कमल कमल के बिन सरोवर पर कमल पसरे है कमल पसरे हैं कमा रहे हैं माल कम्प्यूटर कम्प्यूटर और इंटरनेट कम्प्यूटर और इण्टरनेट कम्प्यूटर और जालजगत कम्प्यूटर बन गई जिन्दगी कम्बल-लोई और कोट से कर दिया क्या आपने कर दो काम तमाम कर दो दूर गुरूर कर लेना कुछ गौर कर लो सच्चा प्यार करके विष का पान करगिल विजय दिवस करता हूँ मैं ध्यान करते दिल पर वार करते श्रम की बात करना ऐसा प्यार करना पूरी मात करना भूल सुधार करना मत कुहराम करना मत दुष्कर्म करना मत हठयोग करना राह तलाश करना सब मतदान करनी-भरनी. काठी का दर्द करने को कल्याण करने बवाल निकले करने मलाल निकले करवा पूजन की कथा करवाचौछ करवाचौथ करवाचौथ पर करें सितम्बर मास में करो आज शृंगार करो तनिक अभ्यास करो पाक को ढेर करो भोज स्वीकार करो मदद हे नाथ करो मेल की बात करो रक्त का दान करो शहादत याद करो सतत् अभ्यास करो साक्षर देश कर्तव्य और अधिकार कर्म हुए बाधित्य कर्मनाशा कर्मों का ताबीज कल की बातें छोड़ो कल हो जाता आज पुराना कल-कल कल-कल शब्द निनाद कलम मचल जाया करती है क़लम मचल जाया करती है कल़मकार लिए बैठा हूँ कलयुग तुम्हें पुकारता कलयुग में इंसान कलेण्डर ही तो बदला कल्पनाएँ निर्मूल हो गईं कल्पित कविराज कवर्ग कवायद कौन करता है कवि कवि और कविता कवि लिखने से डरता हूँ कविगोष्ठी कविता कविता का आकार कविता का आथार कविता का आधार कविता का संयोग कविता को अब तुम्हीं बाँधना कविता क्या है? कविताओँ का मर्म कविता् कवित्त कविधर्म कवियों के लिए कुछ जानकारियाँ कव्वाली कष्ट उठाना पड़ता है कसाब कसाब को फाँसी कह राम और रहीम कहते लोग रसाल कहनेभर को रह गया अपना देश महान कहलाना प्रणवीर कहा कीजिए कहाँ खो गई मीठी-मीठी इन्सानों की बोली कहाँ गयी केशर क्यारी? कहाँ जायें बताओ पाप धोने के लिए कहाँ रहा जनतन्त्र कहाँ है आचरण कहानी कहीं आकाश में बादल घने हैं कहीं है हरा कहें मुबारक ईद कहें सुखी परिवार कहो मुबारक ईद काँटे और गुलाब काँटे और सुमन काँटे बुहार लेना काँटों ने उलझाया मुझको काँधे पर हल धरे किसान काँप रही है थर-थर काया काँव-काँव कौआ चिल्लाया। काँव-काँवकर चिल्लाया है कौआ काँवड़ का व्यतिरेक काक-चेष्टा को अपनाओ कागज की नाव काग़ज़ की नाव कागज की है नाव काठ की हाँडी चढ़ेगी कब तलक काठी का दर्द काने करते राज काम अपना तमाम करते हैं काम कलम का बोलता काम न करना बन्द काम-आराम कामी आते पास कामी और कुसन्त कामुकता का दौर कायदे से धूप अब खिलने लगी है। कार यात्रा कार हमारी हमको भाती कारवाँ कारा उम्र तमाम कारा में सच्चाई बन्द है कार्टूननिस्ट-मयंक खटीमा कार्तिक पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा-गंगा स्नान काल की रफ्तार को छलता रहा हूँ काला अक्षर भैंस बराबर कालातीत बसन्त काले अक्षर काले बादल काव्य (छन्दों) को जानिए काव्य का मर्म काव्यानुवाद काव्यानुवाद-पिता की आकांक्षाएँ.. काश्..कोई मसीहा आये कितना आज सुकून कितनी अच्छी लगती हैं कितनी मैली हो गयी गंगा जी की धार कितनी सुन्दर मेरी काया कितने बदल गये हैं बन्दे कितने सपने देखे मन में किन्तु शेष आस हैं किया बहुत उपकार किये श्राद्ध निष्पन्न किसको गीत सुनाती हो? किसको लुभायेंगे अब किसलय कहलाते हैं किसान किसान-जवान किसे अच्छी नहीं लगती किसे सुनायें गीत किस्मत में लिक्खे सितम हैं कीटनिकम्मे कीर्तिमान सब ध्वस्त कुंठित हुआ समाज कुगीत कुछ अभिनव उपहार कुछ उड़ी हुई पोस्ट कुछ उद्गार कुछ और ही है पेट में कुछ काँटे-कुछ फूल कुछ क्षणिकाएँ कुछ चित्र ‘‘हाइकू’’ में कुछ तो करो यकीन कुछ तो बात जरूरी होगी कुछ दोहे कुछ भी नहीं असली है कुछ भी नहीं सफेद कुछ मजदूरी होगी कुछ शब्दचित्र कुटिल न चलना चाल कुटिल नहीं होते कभी कुटिल-काँटे लड़ाई ठानते हैं कुटिलकाँटे कुटी बनायी नीम पर कुण्ठा कुण्ठा भरे विचार कुण्ठाओं ने डाला डेरा कुण्डलिया कुण्डलियाँ कुण्डलियाँ-चीयर्स बालाएँ कुदरत का उपहार अधूरा होता है कुदरत का कानून कुदरत का हर काज सुहाना लगता है कुदरत की करतूत कुदरत ने फल उपजाये हैं कुदरत ने सिंगार सजाया कुदरत से खिलवाड़ कुन्दन जैसा रूप कुन्दन सा है रूप कुमाऊं के ब्लॉग कुमुद कुम्भ कुम्भ की महिमा अपरम्पार कुर्ता होली खेलता कुर्बानी कुहका कुहरा कुहरा करता है मनमानी कुहरा चारों ओर कुहरा छँटने ही वाला है कुहरा छाया है कुहरा पसरा आज चमन में कुहरा पसरा है आँगन में कुहरे का है क्लेश कुहरे की फुहार कुहरे की मार कुहरे की सौगात कुहासे का आवरण कुहासे की चादर कु्ण्डलिया कूटनीति की बात कूड़ा-कचरा कूर्मा़ञ्चली कविता कूलर कूलर गर्मी हर लेता है कृपा करो अब मात कृषक कृष्ण सँवारो काज कृष्णचन्द्र अधिराज कृष्णचन्द्र गोपाल के बिना केवल कुनबावाद केवल यहाँ धनार्थ केवल हिन्दू वर्ष क्यों केशव भार्गव "निर्दोष" की 8वीं पुण्यतिथि केशव भार्गव "निर्दोष" की 8वीं पुण्यतिथि के अवसर पर केसर के फूल केसरिया का रंग कैद कैमरे में करो कैसी है ये आवाजाही कैसे अपना भजन करूँ मैं कैसे आज बचाऊँ कैसे आये स्वप्न सलोना? कैसे उतरें पार? कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं कैसे उलझन को सुलझाऊँ कैसे गुमसुम हो जाऊँ मैं कैसे जान बचाऊँ मैं कैसे देश-समाज का होगा बेड़ा पार कैसे नवअंकुर उपजाऊँ? कैसे नियमित यजन करूँ मैं कैसे नूतन सृजन करूँ मैं कैसे नूतन सृजन करूँ मैं? कैसे पायें पार कैसे पौध उगाऊँ मैं कैसे प्यार करेगा? कैसे फूल खिलें उपवन में कैसे बचे यहाँ गौरय्या कैसे मन को सुमन करूँ मैं कैसे मन को सुमन करूँ मैं? कैसे मिलें रसाल कैसे मुलाकात होती कैसे लू से बदन बचाएँ? कैसे शब्द बचेंगे अपने कैसे साथ चलोगे मेरे? कैसे सेवा-भाव भरूँ कैसे होंगे पार कैसै आये बहार भला कॉफी कॉफी की चुस्की कॉफी की चुस्की ले लेना कॉफी की तासीर निराली कोई बात बने कोई भूला हुए मंजर कोई वादा-क़रार मत करना कोई सोपान नहीं कोटि-कोटि वन्दन तुम्हें कोमल बदन छिपाया है कोयल आयी मेरे घर में कोयल आयी है घर में कोयल का सुर कोयल गाये गान कोयल चहकी कोयल रोती है कानन में कोयलिया खामोश हो गई कोरोना कोरोना का दैत्य कोरोना की बाढ़ कोरोना की मार कोरोना के रोग से कोरोना के साथ कोरोना को हराना है कोरोना वायरस कोरोना से डर रहा सारा ही संसार कोरोना से सारे हारे कोशिश कौआ कौआ होता अच्छा मेहतर कौड़ी में नीलाम मुहब्बत कौन सुखी परिवार कौन सुने फरियाद कौन सुनेगा सरगम के सुर क्या है प्यार क्या है प्यार-रॉबर्ट लुई स्टीवेंसन क्या हो गया है क्या होता है प्यार क्यों देश ऐसा क्यों राम और रहमान मरा? क्यों होता है हुस्न छली क्यों? क्रिकेट विश्वकप झलकियाँ क्रिसमस का त्यौहार क्रिसमस का शुभकामनाएँ क्रिसमस की बधाई क्रिसमस-डे क्रिस्टिना रोसेट्टी की कविता क्रोध क्षणभंगुर हैं प्राण क्षणिका क्षणिका को भी जानिए क्षणिका क्या होती है? क्षणिकाएँ खंजर उठा लिया खटमल-मच्छर का भेद खटीमा खटीमा (उत्तराखण्ड) का पावर हाउस बह गया खटीमा का परिचय खटीमा में आयोजितपुस्तक विमोचन के कार्यक्रम की रपट खटीमा में आलइण्डिया मुशायरा एवं कविसम्मेलन सम्पन्न खट्टे-मीठे और रसीले खतरे में आज सारे तटबन्ध हो गये हैं खतरे में तटबन्ध हो गये हैं खद्योत खद्योतों का निर्वाचन खबर छपी अखबारों मे ख़बरों की भरमार खर-पतवार उगी उपवन में खरगोश खरपतवार अनन्त खरबूजा खरबूजा-तरबूज खरबूजे खरबूजे का मौसम आया ख़ाक सड़कों की अभी तो छान लो खाता-बही है खादी खादी-खाकी खादी-खाकी की केंचुलियाँ खान-पान में शुद्धता खान-पान-परिधान विदेशी फिर भी हिन्दी वाले हैं खानदानों में खाने में सबको मिले रोटी-चावल-दाल ख़ार आखिर ख़ार है खार पर निखार है ख़ार से दामन बचाना चाहिए खारा पानी खारा-खारा पानी खारिज तीन तलाक खाली पन्नों को भरता हूँ खाली हुआ खजाना खास को होने लगी चिन्ता खास हो रहे मस्त खिल उठा है इन्हीं से हमारा चमन खिल उठे फिर से बगीचे में सुमन खिल जायेंगे नव सुमन खिल रहे फूल अब विषैले हैं खिलता फागुन आया खिलता सुमन गुलाब खिलता हुआ बसन्त खिलती बगिया है प्रतिपल खिलते हुए कमल पसरे हैं खिलने लगते फूल खिलने लगा सूखा चमन खिला कमल का फूल खिला कमल है आज खिली रूप की धूप खिली सुहानी धूप खिली हुई है डाली-डाली खिले कमल का फूल खिसक रहा आधार खीरा खुद को आभासी दुनिया में झोका खुद को करो पवित्र ख़ुदगर्ज़ी का हुआ ज़माना खुदा की मेहरबानी है खुद्दारों की खुद्दारी खुमानी खुलकर खिला पलाश खुलकर हँसा मयंक खुली आँखों का सपना खुली ढोल की पोल खुली बहस- खुलूस से खुश हो करके लोहड़ी खुश हो रहा बसन्त खुश हो रहे किसान खुशियों का परिवेश खुशियों की डोरी से नभ में अपनी पतंग उड़ाओ खुशियों से महके चौबारा खूब थिरकती है रंगोली खूबसूरत लग रहे नन्हें दिये खेत खेत उगलते गन्ध खेत घटते जा रहे हैं खेती का कानून खेतीहर-मजदूर खेतों ने परिधान बसन्ती पहना है खेतों में झुकी हैं डालियाँ खेतों में शहतूत लगाओ खेतों में सोना बिखरा है खेलते होली मोहनलाल खेलो रंग खो गई इन्सानियत खो गया कहाँ संगीत-गीत खो चुके सब कुछ खोज रहे हैं शीतल छाया खोल दो मन की खिड़की खोलो तो मुख का वातायन ख़्वाब का ये रूप भी नायाब है ख़्वाब में वो सदा याद आते रहे गंगा गंगा का अस्तित्व बचाओ गंगा जी की धार गंगा पुरखों की है थाती गंगा बचाओ गंगा बहुत मनोहर है गंगा मइया गंगा स्नान गंगास्नान गंगास्नान मेला गंजे गगन में छा गये बादल गगन में मेघ हैं छाये गजल गज़ल ग़जल ग़ज़ल ग़जल "शरीफों के घरानों की" ग़ज़ल "ख़ानदानों ने दाँव खेलें हैं" ग़ज़ल "उल्लओं की पंचायतें लगीं थी" ग़ज़ल की परिभाषा ग़ज़ल के उद्गगार ग़ज़ल में फिर से रवानी आ गयी है ग़जल या गीत ग़ज़ल संग्रह ग़ज़ल हो गयी क्या गजल हो गयी पास ग़ज़ल-गुरूसहाय भटनागर बदनाम ग़ज़ल? ग़ज़ल. ईमान आज तो ग़ज़ल. खून पीना जानते हैं ग़ज़ल. जीवन में खुशियाँ लाते हैं ग़ज़ल. दो जून की रोटी ग़ज़ल. पत्थरों को गीत गाना आ गया है ग़ज़लगो स्वयम् को बताने लगे ग़ज़लनुमा कुछ अशआर गज़लिका ग़ज़लिया-ए-रूप से एक नज़्म ग़ज़लियात-ए-रूप ग़ज़लियात-ए-रूप से एक ग़ज़ल ग़ज़लियात-ए-रूप से मेरी एक ग़ज़ल ग़ज़लियात-ए-रूप” की भूमिका गठबन्धन की नाव गढ़ता रोज कुम्हार गणतंत्र महान गणतन्त्र गणतन्त्र दिवस गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएँ गणतन्त्र दिवस पर राग यही दुहराया है गणतन्त्र पर्व पर गणतन्त्र महान गणतन्त्रदिवस गणनायक भगवान गणेश चतुर्थी पर विशेष गणेश वन्दना गणेशवन्दना गणेशोत्सव पर विशेष गणों का छन्दों में प्रयोग गणों की जानकारी गत गदहे गद्दार गद्दारी-मक्कारी गद्दारों को जूता गद्य-गीत गद्य-पद्य गद्यगीत गधा हो गया है बे-चारा गधे इस देश के गधे को बाप भी अपना समय पर वो बताते हैं। गधे बन गये अरबी घोड़े गधे हो गये आज गन्दे हैं हम लोग गमों के बोझ का साया बहुत घनेरा है गया अँधेरा-हुआ सवेरा गया दिवाकर हार गया पुरातन भूल गयी चाँदनी रात गयी बुराई हार? गयी मनुजता हार गये आचरण भूल गरम-गरम ही चाय गरमी का अब मौसम आया गरमी में जीना हुआ मुहाल गरमी में ठण्डक पहुँचाता मौसम नैनीताल का गरमी में तरबूज सुहाना गरिमा जीवन सार गरिमा दीपक पन्त गर्मी गर्मी आई खाओ बेल गर्मी के फल गर्मी को अब दूर भगाओ गर्मी में खीरा वरदान गर्मी में स्वेदकण गर्मी से तन-मन अकुलाता गली-गली में बिकते बेर गले न मिलना ईद गले पड़े हैं लोग गा रही दीपावली गाँधी का निर्वाण गांधी जी कहते हे राम! गाँधी जी का चित्र गांधी जी का जन्म दिवस गांधी हम शरमिन्दा हैं गांधीजयन्ती गाँव याद बहुत आते हैं गाँवों का निश्छल जीवन गाओ फिर से नया तराना गाता है ऋतुराज तराने गाना तो मजबूरी है गान्धी-लालबहुदुर जयन्ती गाय गाय-भैंस को पालना गायब अब हल-बैल गिजाई गिनते नहीं हो खामियाँ अपने कसूर पे गिरवीं बुद्धि-विवेक गिरवीं रखा जमाल गिरी जनक पर गाज गिलहरी गीत गीत "गाओ फिर से नया तराना" गीत और प्रीत का राग है ज़िन्द़गी गीत का व्याकरण गीत की परिभाषा के साथ मेरा एक गीत गीत को भी जानिए गीत गाना जानता है गीत गाने का ज़माना आ गया है गीत ढोंग-आडम्बर गीत न जबरन गाऊँगा गीत बन जाऊँगा गीत मेरा गीत सुनाती माटी गीत सुनाती माटी अपने गीत सुर में गुनगुनाओ तो सही गीत-ग़ज़लों का तराना गीत-छन्द लिखने का फैशन हुआ पुराना गीत? गीत. नाविक फँसा समन्दर में गीत. पुनः हरा नही हो सकता गीत. मतवाला गिरगिट रूप बदलता जाता है गीत. मेरे तीन पुराने गीत गीत. वीरों के बलिदान से गीतकार नीरज तुम्हें गीतिका गीतिका छन्द गीतिका. आजादी की वर्षगाँठ गीदड़ और विडाल गुझिया-बरफी गुनगुनाओ तो सही गुब्बारे गुरु नानक का जन्मदिन गुरु नानक जयन्ती गुरु पूर्णिमा गुरु वन्दना गुरुओं का ज्ञान गुरुओं का दिन गुरुकुल में हम साथ पढ़े गुरुदेव का वन्दन गुरुवर का सम्मान गुरू ज्योति का पुंज गुरू पूर्णिमा गुरू पूर्णिमा-गंगा स्नान गुरू वन्दना गुरू सहाय भटनागर गुरू सहाय भटनागर नहीं रहे गुरू-शिष्य गुरूकुल गुरूदक्षिणा गुरूदेव का ध्यान गुरूद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब गुरूनानक का दरबार गुरूपूर्णिमा गुरूवन्दना गुरूसहाय भटनागर बदनाम गुरूसहाय भटनागार गुर्गे देते बाँग गुलमोहर गुलमोहर का रूप गुलमोहर का रूप सबको भा रहा गुलमोहर खिलने लगा गुलमोहर लुभाता है गुलशन बदल रहा है गुलाब दिवस गुलामी बेहतर थी गुलाल-अबीर गूँगी गुड़िया आज गूँगे और बहरे हैं गूँज रहा उद्घोष गूँज रहे सन्देश गूगल-फेसबुक गेहूँ गेहूँ करते नृत्य गैस सिलेण्डर गैस सिलेण्डर है वरदान गोबर की ही खाद गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे गोमुख से सागर तक जाती गोरा-चिट्टा कितना अच्छा गोरी का शृंगार गोल-गोल है दुनिया सारी गोवर्धन गोवर्धन पूजा गोवर्धन पूजा करो गोवर्धनपूजा और भइयादूज की शुभकामना गोवर्धनपूजा और भइयादूज की शुभकामनाएँ गोविन्दसिंह कुंजवाल गौमाता भूखी मरे गौमाता से प्रीत गौरय्या गौरय्या का गाँव गौरय्या का नीड़ चील-कौओं ने हथियाया है गौरय्या के गाँव में गौरव और गुमान की गौरव का आभास गौरी और गणेश गौरैया का गाँव में पड़ने लगा अकाल गौरैया ने घर बनाया ग्यारह दोहे ग्राम्यजीवन ग्रीष्म ग्वाले हैं भयभीत घटते जंगल-खेत घटते वन-बढ़ता प्रदूषण घनाक्षरी घनाक्षरी गीत घर की रौनक घर भर का अभिमान बेटियाँ घर में कभी न लायें हम घर में पढ़ो नमाज घर में पानी घर में बहुत अभाव घर सब बनाना जानते हैं घातक मलय समीर घास घिर-घिर बादल आये घिर-घिर बादल आये रे घुटता गला सुवास का घूम रहा है चक्र घोंसला हुआ सुनसान आज तो घोटालों पर घोटाले घोड़ों से भी कीमती घोर संक्रमित काल में मुँह पर ढको नकाब चंचल “रूप” सँवारा चंचल चितवन नैन चंचल सुमन चकरपुर चक्र है आवागमन का चक्र है आवागमन का। चढ़ा केजरी रंग चढ़ा हुआ बुखार है चतुर्दशी का पर्व चदरिया अब तो पुरानी हो गयी चना-परमल चन्दा कितना चमक रहा है चन्दा देता है विश्राम चन्दा मामा-सबका मामा चन्दा से मुझको मोह नहीं चन्दा-सूरज चन्द्र मिशन चन्द्रमा सा रूप मेरा चमकती न बिजली न बरसात होती चमकेगा फिर से गगन-भाल चमचों की महिमा चमत्कार चमन का सिंगार करना चाहिए चमन की तलाश में चमन हुआ गुलजार चम्पावत जिले की सुरम्य वादियाँ चम्पू काव्य चरित्र चरित्र पर बाइस दोहे चरैवेति का मन्त्र चरैवेति की सीख चरैवेति-मेरा एक गीत चलके आती नही चलता खूब प्रपञ्च चलता जाता चक्र निरन्तर चलते बने फकीर चलना कछुआ चाल चलना कभी न वक्र चलना सीधी चाल। चलने से कम दूरी होगी चला दिया है तीर चला है दौर ये कैसा चली झूठ की नाव चली बजट की नाव चले आये भँवरे चले थामने लहरों को चलो दीपक जलाएँ हम चलो भीगें फुहारों में चलो होली खेलेंगे चवन्नी चहक रहे घर द्वार चहक रहे हैं उपवन में चहक रहे हैं रंग चहक रहे हैं वन-उपवन में चहकता-महकता चमन चहका है मधुमास चहके गंगा-घाट चहके प्यारी सोन चिरैया चाँद बने बैठे चेले हैं चाँद-तारों की बात करते हैं चाँद-सूरज चाँदनी का हमें “रूप” छलता रहा चाँदनी रात चाँदनी रात बहुत दूर गई चाँदी की संगत चाचा नेहरू को शत्-शत् नमन चाचा नेहरू तुम्हें नमन चाटुकार सरदार हो गये चापलूस बैंगन चाय चाय हमारे मन को भाई चार कुण्डलियाँ चार चरण-दो पंक्तियाँ चार दोहे चार फुटकर छन्द चारों ओर बसन्त हुआ चारों ओर भरा है पानी चालबाजी चाहत कभी न पूरी होगी चिंकू तो है शाकाहारी चिंकू ने आनन्द मनाया चिट्टाकारी दिवस बनाम ब्लॉगिंग-डे चिट्ठी-पत्री का युग बीता चिड़िया चिड़ियारानी चिड़ियों की कारागार में पड़े हुए हैं बाज चित्रकारिता दिवस चित्रग़ज़ल चित्रपट चित्रावली चित्रोक्ति चिन्तन चिन्तन-मन्थन चीत्कार पसरा है सुर में चीनी लड़ियाँ-झालर अपने चुगलखोर चुनना नहीं आता चुनाव चुनाव लड़ना बस की बात नहीं चुनावी कानून में बदलाव की जरूरत चुम्बन का व्यापार चुम्बन दिवस चुम्बन दिवस की शुभकामनाएँ चुम्बनदिवस चुरा रहे जो भाव चूनरी तो तार-तार हो गई चूहों की सरकार में बिल्ले चौकीदार चेतावनी चेहरा चमक उठा चेहल्लुम का जुलूस चैतन्य की हिन्दी की टेक्सटबुक (अंकुर हिन्दी पाठमाला) चॉकलेट देकर नहीं चॉकलेट देकर नहीं उगता दिल में प्यार चॉकलेट-डे चोदहदोहे चोर पुराण चोरों से कैसे करें अपना यहाँ बचाव चोरों से भरपूर है आभासी संसार चौकस चौकीदार चौदह जनवरी-चौदह दोहे चौदह दिन के ही लिए हिन्दी से है प्यार चौदह दोहे चौदह फरवरी चौदह सितम्बर को समर्पित चौदह दोहे चौदह सितम्बर-चौदह दोहे चौपाई चौपाई के बारे में भी जानिए चौपाई लिखना सीखिए चौपाई लिखिए चौमासा बारिश से होता चौमासे का रूप चौमासे ने अलख जगाई छँट गये बादल हुआ निर्मल गगन छंदहीनता छटा अनोखी अपने नैनीताल की छठ का है त्यौहार छठ पूजा छठ माँ का उद्घोष छठ माँ हरो विकार छठपूजा छठपूजा त्यौहार छन्द और मुक्तक छन्द क्या होता है? छन्द हो गये क्ल्ष्टि छन्दशास्त्र छन्दों का विज्ञान छन्दों के विषय में जानकारी छल-छल करती गंगा छल-छल करती धारा छल-फरेब के गीत छल-बल की पतवार छाई हुई उमंग छाई है बसन्त की लाली छाता छाते छाप रहे अखबार छाया का उपहार छाया चारों ओर उजाला छाया देने वाले छाते छाया बहुत अन्धेरा है छाया भारी शोक छाया है उल्लास छाये हुए हैं ख़यालात में छिन जाते हैं ताज छीनी है हिन्दी की बिन्दी छुक-छुक करती आती रेल छुट्टी दे दो अब श्रीमान छुहारे-किशमिश छूट गया है साथ छोटी-छोटी बात पर छोटे पुत्र विनीत का छोटे पुत्र विनीत का जन्मदिन छोटे पुत्र विनीत का जन्मदिवस छोटों को सम्बल दिया लिया बड़ों से ज्ञान छोड़ विदेशी ढंग छोड़ा पूजा-जाप छोड़ा मधुर तराना जंग ज़िन्दगी की जारी है जंगल का कानून जंगल की चूनर धानी है जंगल के शृंगाल सुनो जंगलों के जानवर जंगी यान रफेल जकड़ा हुआ है आदमी जग उसको पहचान न पाता जग का आचार्य बनाना है जग के झंझावातों में जग के नियम-विधान जग को लुभा गये हैं जग में अन्तरजाल जग में ऊँचा नाम जग में केवल योग जग में माँ का नाम जग में सबसे न्यारा मामा जग है एक मुसाफिरखाना जगत है जीवन-मरण का जगदम्बा माँ आपकी जगमग सजी दिवाली जगह-जगह मतदान जड़े न बदलें पेड़ जन-गण का विश्वास जन-गण का सन्देश जन-गण रहे पछाड़ जन-जागरण जन-जीवन बेहाल जन-मानस बदहाल जन.2017 में मेरा गीत जनता का जनतन्त्र जनता का तन्त्र कहाँ है जनता का धीरज डोल रहा जनता जपती मन्त्र जनता है कंगाल जनमानस के अन्तस में आशाएँ मुस्काती हैं जनमानस लाचार जनवरी-2017 जनसेवक खाते हैं काजू जनसेवक लाचार जनहित के कानून को जन्म दिन जन्म दिन मेरी श्रीमती जन्म दिवस जन्मदिन जन्मदिन की दे रहे हैं सब बधायी जन्मदिन पर रूप मुझको भा गया है जन्मदिन फिर आज आया जन्मदिन है आज मेरा जन्मदिवस जन्मदिवस की बेला पर जन्मदिवस चाचा नेहरू का जन्मदिवस चाचा नेहरू का भूल न जाना जन्मदिवस पर विशेष जन्मदिवस विशेष जन्मदिवस विशेष) जन्मदिवस है आज जन्मभूमि में राम जन्माष्टमी जन्मे थे धनवन्तरी जब खारे आँसू आते हैं जब पहुँचे मझधार में टूट गयी पतवार जब मन में हो चाह जब-जब मक्कारी फलती है जमा न ज्यादा दाम करें जमाना बहुत बदल गया जय बोलो नन्दलाल की जय माता की कहने वालो जय विजय जय विजय 2019 में मेरी बालकविता जय विजय अगस्त-2019 जय विजय के फरवरी जय विजय जुलाई-2018 जय विजय जून जय विजय पत्रिका में मेरा गीत जय विजय पत्रिका में मेरी बालकविता जय विजय मई जय विजय मासिक पत्रिका के नवम्बर-2016 अंक में मेरी ग़ज़ल जय विजय में मेरी बाल कविता जय विजय-अप्रैलः2020 जय शिक्षा दाता जय सिंह आशावत जय हिन्दी-जय नागरी जय हो देव महेश जय हो देव सुरेश जय-जय गणपतिदेव जय-जय जगन्नाथ भगवान जय-जय जय वरदानी माता जय-जय-जय गणपति महाराजा जय-जवान और जय-किसान जय-विजय जय-विजय अगस्त जय-विजय पत्रिका जय-विजय पत्रिका में मेरा गीत जय-विजय पत्रिका अक्टूबर-2016 में मेरी ग़ज़ल प्रकाशित जयविजय जयविजय नवम्बर 2018 जयविजय मई-15 जयविजय में मेरी ग़ज़ल जयविजय-जून जरी-सूत या जूट के धागे हैं अनमोल जरूरी है जल का स्रोत अपार कहाँ है जल जीवन की आस जल दिवस जल बिना बदरंग कितने जल बिना बेरंग कितने जल रहा च़िराग है जलद जल धाम ले आये जलधारा जलमग्न खटीमा जहरीला पेड़:A Poison Tree जाँच-परख कर मीत जागरण जागा दयानन्द का ज्ञान जागेगा इंसान जाति-धर्म के मन्त्र जातिवाद में बँट गये जादू-टोने जान बिस्मिल हुई जानिए मेरे खटीमा को भी जाने वाला साल जाम जाम ढलने लगे ज़ारत जालजगत जालजगत की शाला है ज़ालिमों से पुकार मत करना जिजीविषा जितना चाहूँ भूलना उतनी आती याद जितने ज्यादा आघात मिले जिनके पास जमीर ज़िन्दगी ज़िन्दग़ी अब नरक बन गयी है ज़िन्दगी इक खूबसूरत ख़्वाब है जिन्दगी का सफर निराला है ज़िन्दग़ी का सहारा ज़िन्दग़ी की सलीबों पे चढ़ता रहा ज़िन्दग़ी के तीन मुक्तक ज़िन्दग़ी के लिए जिन्दगी जिन्दगी पे भारी है ज़िन्दग़ी भर उन्हें आज़माते रहे जिन्दगी भर सलामत रहो साजना ज़िन्दगी भर सलामत रहो साजना ज़िन्दग़ी में न ज़लज़ले होते जिन्दगी में प्यार-Life in a Love ज़िन्दग़ी सस्ती हुई जिन्दगी है बस अधूरी ज़िन्दग़ी जिन्दा उसूल हैं ज़िन्दादिली जिन्दादिली का प्रमाण दो जियो ज़िन्दगी को जिसमें पुत्रों के लिए होते हैं उपवास जी रहा अब भी हमारे गाँव में जीत का आचरण जीते-जी की माया जीना पड़ेगा कोरोना के साथ जीना-मरना सदा से जीने का अंदाज जीने का अन्दाज़ जीने का अन्दाज़ निराला जीने का आधार हो गया जीने का ढंग जीव सभी अल्पज्ञ जीवन जीवन आशातीत हो गया जीवन का गीत जीवन का चक्र जीवन का ताना-बाना जीवन का भावार्थ जीवन का विज्ञान जीवन का संकट गहराया जीवन का है मर्म जीवन किताबी हो गया जीवन की अब शाम हो गई जीवन की आपाधापी में जीवन की ये नाव जीवन की है भोर तुम्हारे हाथों में जीवन के आधार जीवन के हैं खेल जीवन के हैं ढंग निराले जीवन को हँसी-खेल समझना न परिन्दों जीवन जटिल जलेबी जैसा जीवन जीना है दूभर जीवन तो बहुत जरा सा है जीवन दर्शन समझाया जीवन पतँग समान जीवन बगिया चहके-महके जीवन में अभिसार जीवन में सन्तुष्ट जीवन में है मित्रता जीवन ललित-ललाम जीवन श्रम के लिए बना है जीवन है बदहाल जीवन है बेहाल जीवनचक्र जीवनयात्रा जीवित देवी-देवता दुनिया में माँ-बाप जीवित रहती घास जीवित हुआ पराग जीवित हुआ बसन्त जुलाईः18 जुल्म के आगे न झुकेंगे जुल्म झोंपड़ी पर ढाया जूझ रहा है देश जूती-टोपी बनी सहेली जूतों की बौछार जून-2109 जेठ लग रहा है चौमासा जैविकपिता जो नंगापन ढके बदन का हमको वो परिधान चाहिए जोकर जोकर खूब हँसाये जोकर-बौने ज्ञान का तुम ही भण्डार हो ज्ञान का प्रसाद लो ज्ञान की अमावस ज्ञान न कोई दान ज्ञान हुआ विकलांग ज्ञानी भी मूरख बनें ज्यादा दाद मिला करती है ज्यादा दोहाखोर ज्यादातर तो कट गयी ज्येष्ठ पुत्र का जन्मदिन ज्येष्ठ पुत्र नितिन का जन्मदिन ज्येष्ठ पूर्णिमा झंझावात बहुत गहरे हैं झंझावातों में झटका और हलाल झण्डे रहे सँभाल झनकइया मेला गंगास्नान झनकइया-खटीमा झरता हुआ प्रपात झरने करते शोर झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई की 160वीं पुण्यतिथि पर विशेष झाँसी की रानी झाड़ुएँ सवाँर लो झालर-बन्दनवार झुक गयी है कमर झुकेगी कमर धीरे-धीरे झूठ की तकरीर बच गयी झूठ जायेगा हार झूमर से लहराते हैं झूमर से सोने के गहने झूल रही हैं ममता-माया झूला झूले कैसे पड़ें बाग में? झेल रहा है देश झेलना जरूरी है टाबर टोली टिप्पणियाँ टिप्पणी और पसन्द टिप्पणी पोस्ट टुकड़ा-एमी लोवेल टूटा कुनबेवाद से टूटी-फूटी रोमन-हिन्दी टॉम-फिरंगी टॉम-फिरंगी प्यारे-प्यारे टोपी टोपी हिन्दुस्तान की टोपी है बलिदान की ठलवे-जलवे ठहर गया जन-जीवन ठिठुर रहा है गात ठिठुर रही है सबकी काया ठिठुरा बदन है ठिठुरा सकल समाज ठेंगा न सूरज को दिखाना चाहिए ठेले पर बिकते हैं बेर ठोकरें खाकर सँभलना सीखिए डमरू का अब नाद सुनाओ डरता हूँ डरा और धमका रहा कोतवाल को चोर डरा रहा देश को है करोना डूबे गोताखोर डॉ. गंगाधर राय डॉ. महेन्द्र प्रताप पाण्डेय 'नन्द' डॉ. राजविन्दर कौर डॉ. सारिका मुकेश डॉ. सुभाष वर्मा डॉ. हरि 'फैजाबादी' डॉ.धर्मवीर डॉ.राष्ट्रबन्धु डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ डॉक्टर गोपेश मोहन जैसवाल डोल रहा ईमान डोलियाँ सजने लगीं ढंग निराले होते जग में मिले जुले परिवार के ढंग हमारे बदल गये ढकी ढोल की पोल ढल गयी है उमर ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए ढाईआखर ढुल-मुल नहीं उसूल ढोंग और षड़यन्त्र ढोंग-आडम्बर ढोंगी और कुसन्त ढोंगी साधू ढोलकी का सुर नगाड़ा हो गया तंज करने से बिगड़ती बात हैं तजना नहीं उमंग तजो पश्चिमी रीत तन्त्र अब खटक रहा है तन्त्र ये खटक रहा है तपते रेगिस्तानों में तब मैने माँ तुम्हें पुकारा तब-तब मैं पागल होता हूँ तबाही के कुछ ताजा चित्र तमन्नाओं की लहरे हैं तम्बाकू दो त्याग तम्बाकू को त्याग दो तम्बाकू दो छोड़ तम्बाकू निषेध दिवस तम्बाकू निषेध दिवस पर सन्देश तरबूज तरस रहा माँ-बाप की तवर्ग ताजमहल का सच ताजमहल की हकीकत ताल-लय उदास हैं तालाबों की पंक तिगड़ी की खिचड़ी तिज़ारत तिज़ारत में सियासत है तिजारत ही तिजारत है तितली तितली आई! तितली आई!! तितली करती नृत्य तितली है फूलों से मिलती तिनका-तिनका दोहा संग्रह तिनके चुन-चुन लाती हैं तिरंगा बना देंगे हम चाँद-तारा तिलक दूज का कर रहीं तीज आ गई है हरियाली तीजो का आया त्यौहार चलो झूला झूलेंगे तीजो का त्यौहार तीन अध्याय तीन तलाक तीन दिनों से भार बारिश तीन मिसरी शायरी (तिरोहे) तीन मुक्तक तीन साल का लेखा जोखा तीन-लाइना तीस सितम्बर तुकबन्दी तुकबन्दी को ही अपनाओ तुकबन्दी मादक-उन्मादी तुकबन्दी से खिलता उपवन तुम पंखुरिया फैलाओ तो तुम साथ क्या निभाओगे? तुम हो दुर्गा रूप तुमने सबका काज सँवारा तुमसे ही मेरा घर-घर है तुमसे ही है दुनियादारी तुम्हारे चरण-रज का कण चाहता हूँ तुम्हारे हाथों में तुम्ही मेरी आराधना तुम्हीं ज्ञान का पुंज तुम्हीं साधना-तुम ही साधन तुलसी का पौधा गुणकारी तुलसी का बिरुआ गुणकारी तुलसीदास तुहिन-हिम नभ से अचानक धरा पर झड़ने लगा तू माँ का वरदान ना पाये तू से आप और सर तूफानों से लड़ने में तेजपाल का तेज तेरह दोहे तेरह सितम्बर तेल कान में डाला क्यों? तेल-लकड़ी तेवर नहीं अब वो रहे तो कोई बात बने तोंद झूठ की बढ़ी हुई है तोता तोल-तोलकर बोल त्योहारों की रीत त्यौहार त्यौहारों की गठरी त्यौहारों पर किसी का खाली रहे न हाथ थक जायेगी नयी रीत फिर थम जाये घुसपैंठ थमे हुए जल में सदा बन जाते शैवाल थर-थर काँपे देह थाली के बैंगन थीम चुराई मेरी थोड़ी है अवशेष थोड़े दिन का प्यार थोड़े दोहाकार है दंगों का है जोर दबा सुरीला कोकिल का सुर दबी हुई कस्तूरी होगी दम घुटता है आज चमन में दम घुटता है आज वतन में दमक उठा है रूप भी’ दया करो हे दुर्गा माता दयानन्द पाण्डेय दरबान बदलते देखे हैं दरवाजे की दस्तक दर्द का मरहम दर्द का सिलसिला दिया तुमने दर्द की छाँव में मुस्कराते रहे दर्द दिल में जगा दिया उसने दर्पण असली 'रूप' दिखाता दर्पण काला-काला क्यों दर्पण में तसबीर दलबदलू दशहरा दशहरा पर दस दोहे दस दोहे दहे दहेज दाढ़ी में है चोर दादी अम्मा दादी जी! प्रसाद दे दो ना दाम नहीं है पास दामिनी काण्ड की बरसी दामिनी को भावभीनी श्रद्धांजलि दिखने लगा उजाड़ दिखायी तो नहीं जाती दिखावा हटाओ दिन आ गये हैं प्यार के दिन में छाया अँधियारा दिन में सितारों को बुलाते हो दिन है कितना खास दिन है देवोत्थान का व्रत-पूजन का खास दिन हैं अब नजदीक दिनकर है भयभीत दिनांक 27-04-2016 दिया तिरंगा गाड़ दिल दिल की आग दिल की बात दिल की बेकरारी दिल की लगी क्या चीज़ है दिल के करीब और दिल से दूर दिल को बेईमान न कर दिल तो है मतवाला गिरगिट दिल में इक दीप जलाकर देखो दिल-ए-ज़ज़्बात दिलों में उल्फतें कम हैं दिल्लगी समझते हैं दिल्ली दिवस आज का खास दिवस बढ़े हैं शीत घटा है दिवस बहुत है खास दिवाली दिवाली को मनाएँ हम दिवाली मेला दिवाली मेला-नानकमत्ता साहिब दिव्य स्वरूप विराट दिशाहीन को दिशा दिखाते दिसम्बर दीन-ईमान के चोंचले मत करो दीन-ईमान पल-पल फिसलने लगे दीप अब कैसे जलेगा...? दीप खुशियों के जलाओ दीप खुशियों के जलें दीप जगमगाइए दीपक जलाएँ बार-बार दीपक-बाती दीपशिखा सी शान्त दीपावली दीपावली की शुभकामनाएँ दीपावली के दोहे दीपावली. अँधियारा हरते जाएँगे दीपों की दीपावली दीमक ने पाँव जमाया है दीमकों से चमन को कैसे बचायें? दीवाली पर देवता दुख-सन्ताप बहुत झेले हैं दुखद समाचार दुनिया का भूगोल दुनिया की नियति दुनिया की है रीत दुनिया को दें ज्ञान दुनिया भर में सबसे न्यारा दुनिया में इंसान दुनिया में नाचीज दुनिया वक्र है दुनिया से वह चला गया दुनियादारी दुनियादारी जाम हो गई दुर्गा जी की वन्दना दुर्गा जी के नवम् रूप हैं दुर्गा माता दुर्दशा दुल्हिन बिना सुहाग के लगा रही सिंदूर दुश्मन से लोहा लेना होगा दुष्ट हो रहे पुष्ट दूध-दही अपनाना है दूर करो अज्ञान दूर निकल जाते हैं बादल दूरी की मजबूरी दूषित हुआ वातावरण दूषित है परिवेश दे दो ज्ञान भवानी माता दे रहा मधुमास दस्तक देंगे नाम मिटाय देंगे बदल लकीर देंगे मिटा गुरूर देख तमाशा होली का देख बसन्ती रूप देखना इस अंजुमन को देखो कितना मुक्त है आभासी संसार देता है ऋतुराज निमन्त्रण देता है सन्देश देते हैं आनन्द देते हैं आनन्द अनोखा रिश्ते-नाते प्यार के देनी पड़ती घूस देव उत्थान देव दिवाली पर्व देव दीपावली देवउठनी देवदत्त 'प्रसून' देवदत्त 'प्रसून' जी हमारे बीच नहीं रहे। देवदत्त सा शंख देवपूजन के लिए सजने लगी हैं थालियाँ देवभूमि अपना भारत देवालय का सजग सन्तरी देवोत्थान देवोत्थान प्रबोधिनी एकादशी देश कहाये विश्वगुरू तब देश का दूषित हुआ वातावरण देश की अंजुमन बेच देंगे देश की कहानी देश की हालत देश को सुभाष चाहिए देश भक्ति गीत देश-प्रेम गीत देश-भक्ति गीत देश-समाज देशप्रेम का दीप जलेगा देशभक्त गुमनाम हो गये देशभक्ति देशभक्ति का जाप देशभक्ति गीत देशभक्तिगीत देशभक्तों का नमन होना चाहिए देहरा दून-सखनऊ के चित्र देहरादून यात्रा देहरादून यात्रा-दस दोहे दो अक्टूबर दो आँखें दो आँखों की रीत दो कुणडलियाँ दो कुण्डलियाँ दो गीत दो जून दो जून की रोटी दो जून रोटी दो पक्षों के बोल दो बच्चे होते हैं अच्छे दो मुक्तक दो शब्द दो हजार के नोट दो हाथों का घोड़ा दो-अक्टूबर दोनों पुस्तकों का विमोचन दोपहरी में शाम हो गई दोस्ती-दग़ाबाजी दोह दोहा दोहा ग़ज़ल दोहा गीत दोहा छन्द दोहा पच्चीसी दोहा महिमा दोहा सप्तक दोहा-अष्टक दोहा-गीत दोहा-मुक्तक दोहाग़ज़ल दोहागीत दोहागीत. उपवन का परिवेश दोहागुणगान दोहाचित्र दोहाचोर दोहाछन्द दोहावली दोहाष्टक दोहासंग्रह दोहे दोहे "हनुमान जयन्ती" दोहे "राजनीति में हंस" दोहे और मुक्तक दोहे का विन्यास दोहे पर दोहे दोहे रखना सम अनुपात दोहे-जलता हुआ अलाव दोहे. उलटी गिनती पाक की दोहे. करवाचौथ सुहाग का दोहे. धीरज से लो काम दोहे. पर्व लोहिड़ी का हमें दोहे. पावस का आगाज दोहे. बहुत अनोखे ढंग दोहे. बापू जी के देश में बढ़ने लगे दलाल दोहे. भइयादूज दोहे. भारत देश महान दोहे. माता का अवतार दोहे. योगिराज का जन्मदिन दोहे" रचता जाय कुम्हार दोहेे दोहे् दोहों का मर्म दोहों पर दोहे दोहों में कुछ ज्ञान दोौहे धड़कन बिना शरीर धधक रही है आग धन का खुल्ला खेल धनतेरस धनतेरस त्यौहार धन्यवाद-ज्ञापन