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रविवार, 28 फ़रवरी 2021

गीत "मौसम ने ली है अँगड़ाई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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पवन बसन्ती लुप्त हो गई,
मौसम ने ली है अँगड़ाई।
गेहूँ की बालियाँ सुखाने,
पछुआ पश्चिम से है आई।।
पर्वत का हिम पिघल रहा है,
निर्झर बनकर मचल रहा है,
जामुन-आम-नीम गदराये,
फिर से बगिया है बौराई।
गेहूँ की बालियाँ सुखाने,
पछुआ पश्चिम से है आई।।
रजनी में चन्दा दमका है,
पूरब में सूरज चमका है,
फुदक-फुदककर शाखाओं पर,
कोयलिया ने तान सुनाई।
गेहूँ की बालियाँ सुखाने,
पछुआ पश्चिम से है आई।।
वन-उपवन की शान निराली,
चारों ओर विछी हरियाली,
हँसते-गाते सुमन चमन में,
भँवरों ने गुंजार मचाई।
गेहूँ की बालियाँ सुखाने,
पछुआ पश्चिम से है आई।।
सरसों का है रूप सलोना,
कितना सुन्दर बिछा बिछौना,
मधुमक्खी पराग लेने को,
खिलते गुंचों पर मँडराई।
गेहूँ की बालियाँ सुखाने,
पछुआ पश्चिम से है आई।।
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शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

गीत "गाता है ऋतुराज तराने" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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वासन्ती मौसम आया है,
प्रीत और मनुहार का।
गाता है ऋतुराज तराने,
बहती हुई बयार का।।
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पंख हिलाती तितली आयी,
भँवरे गुंजन करते हैं,
खेतों में कंचन पसरा है,
हिरन कुलाँचे भरते हैं,
टेसू हुआ लाल अंगारा,
बरस रहा रँग प्यार का।
गाता है ऋतुराज तराने,
बहती हुई बयार का।।
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नीड़ बनाने को पक्षीगण,
तिनके चुन-चुनकर लाते,
लटके गुच्छे अंगूरों के,
सबके मन को भरमाते,
कल-कल, छल-छल का स्वर भाता
गंगा जी की धार का।
गाता है ऋतुराज तराने,
बहती हुई बयार का।।
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झड़बेरी पर बेर आ गये,
पेड़ों पर नव पल्लव हैं,
शाम-सवेरे अपने घर में,
पंछी करते कलरव हैं,
धन्यवाद करते हैं सारे,
ईश्वर के उपकार का।
गाता है ऋतुराज तराने,
बहती हुई बयार का।।
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कलियों पर निखार आया है,
फूलों पर छाया यौवन,
चहक रहे हैं बाग-बगीचे,
महक रहा खिलता उपवन,
ढंग निराला होता जग में,
होली के त्यौहार का।
गाता है ऋतुराज तराने,
बहती हुई बयार का।।

--

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

बालकविता "आयी रेल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 
धक्का-मुक्की रेलम-पेल।
आयी रेल-आयी रेल।।
 
इंजन चलता सबसे आगे।
पीछे -पीछे डिब्बे भागे।।

हार्न बजाताधुआँ छोड़ता।
पटरी पर यह तेज दौड़ता।।
 
जब स्टेशन आ जाता है।
सिग्नल पर यह रुक जाता है।।

जब तक बत्ती लाल रहेगी।
इसकी जीरो चाल रहेगी।।

हरा रंग जब हो जाता है।
तब आगे को बढ़ जाता है।।
 
बच्चों को यह बहुत सुहाती।
नानी के घर तक ले जाती।।

सबके मन को भाई रेल।
आओ मिल कर खेलें खेल।।

धक्का-मुक्की रेलम-पेल।
आयी रेल-आयी रेल।।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

गीत "आँसू यही बताते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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दुख आने पर नयन बावरे,
खारा जल बरसाते हैं।
हमें न सागर से कम समझो,
आँसू यही बताते हैं।।
--
हार नहीं जो कभी मानता,
पसरे झंझावातों से,
लेकिन हुआ पराजित मनवा,
अपनों की कटु बातों से,
चोट अगर दिल पर लगती,
तो आँसू को ढरकाते हैं।
हमें न सागर से कम समझो,
आँसू यही बताते हैं।।
--
सुमन हमेशा काँटों के,
सँग-साथ खिला करता है,
अमृत के ही साथ सिन्धु में,
गरल मिला करता है,
दुख में भरी वेदना कितनी,
आँसू सब कह जाते हैं।
हमें न सागर से कम समझो,
आँसू यही बताते हैं।।
--
ज्वार और भाटा जीवन के,
साथ चला करते हैं,
नकली कागज के प्रसून,
हर बार छला करते हैं,
आपा-धापी की महफिल में,
झूठा जश्न मनाते हैं।
हमें न सागर से कम समझो,
आँसू यही बताते हैं।।
--
कभी-कभी दिनकर भी,
कुछ शीतलता दे जाता है,
लेकिन शीतल चन्दा भी तो,
दिल में आग लगाता है।
सुखद सलोने सपने मन में,
झूठी आस बँधाते हैं।
हमें न सागर से कम समझो,
आँसू यही बताते हैं।।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

ग़ज़ल "आँखें कर देतीं इज़हार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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गुस्सा-प्यार और मनुहार
आँखें कर देतीं इज़हार 
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नफरत-चाहत की भाषा का
आँखों में संचित भण्डार
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बिन काग़ज़ के, बिना क़लम के
लिख देतीं सारे उद्गार
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नहीं छिपाये छिपता सुख-दुख
करलो चाहे यत्न हजार
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पावस लगती रात अमावस
हो जातीं जब आँखें चार
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नहीं जोत जिनकी आँखों में
उनका है सूना संसार
--
'रूप' इन्हीं से जीवन का है
आँखें कुदरत का उपहार
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मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

गीत "आँसू की कथा-व्यथा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

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आँखों की कोटर में,
जब खारे आँसू आते हैं।
अन्तस में उपजी पीड़ा की,
पूरी कथा सुनाते हैं।।
--
धीर-वीर-गम्भीर इन्हें,
चतुराई से पी लेते हैं,
राज़ दबाकर सीने में,
अपने लब को सी लेते हैं,
पीड़ा को उपहार समझ,
चुपचाप पीर सह जाते हैं।
अन्तस में उपजी पीड़ा की,
पूरी कथा सुनाते हैं।।
--
चंचल मन है, भोलातन है,
नयन बहुत मतवाले हैं,
देख रहे दुनियादारी को,
इनके खेल निराले हैं,
उनसे नेह हमेशा होता,
जो आँखों को भाते हैं।
अन्तस में उपजी पीड़ा की,
पूरी कथा सुनाते हैं।।
--
मन के नभ पर जब,
बादल की सूरत गहराती है,
आँखों के दर्पण में,
उसकी मूरत आ जाती है,
जैसी होती मन की हालत,
वैसा “रूप” दिखाते हैं।
अन्तस में उपजी पीड़ा की,
पूरी कथा सुनाते हैं।। 
--

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

गीत "सत्य-अहिंसा की मैं अलख जगाऊँगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जो मेरे मन को भायेगा
,
उस पर मैं कलम चलाऊँगा।
दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
आगे को बढ़ता जाऊँगा।।
--
मैं कभी वक्र होकर घूमूँ,
हो जाऊँ सरल-सपाट कहीं।
मैं स्वतन्त्र हूँमैं स्वछन्द हूँ,
मैं कोई चारण भाट नहीं।
फरमाइश पर नहीं लिखूँगा,
गीत न जबरन गाऊँगा।
दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
आगे को बढ़ता जाऊँगा।।
--
भावों की अविरल धारा में,
मैं डुबकी खूब लगाऊँगा।
शब्दों की पतवार थाम,
मैं नौका पार लगाऊँगा।
घूम-घूम कर सत्य-अहिंसा
 की मैं अलख जगाऊँगा।
दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
आगे बढ़ता जाऊँगा।।
--
चाहे काँटों की शय्या हो,
या नर्म-नर्म हो सेज सजे।
सारंगी का गुंजन सुनकर,
चाहे ढोलक-मृदंग बजे।
अत्याचारी के दमन हेतु,
शिव का डमरू बन जाऊँगा।
दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,
आगे बढ़ता जाऊँगा।।
--

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

गीत "सत्य कहने में झमेला हो गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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वातावरण कितना विषैला हो गया है।
मधुर केला भी कसैला हो गया है।।
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लाज कैसे अब बचायेगी की अहिंसा,
पल रही चारों तरफ है आज हिंसा
सत्य कहने में झमेला हो गया है।
मधुर केला भी कसैला हो गया है।।
--
अब किताबों में सजे हैं ढाई आखर,
सिर्फ कहने को बचे हैं नाम के घर,
आदमी कितना अकेला हो गया है।
मधुर केला भी कसैला हो गया है।।
--
इंसान के अब दाँत पैने हो गये हैं.
मनुज के सिद्धान्त सारे खो गये हैं,
बस्तियों का ढंग बनैला हो गया है।
मधुर केला भी कसैला हो गया है।।
--
प्रीत की अब आग ठण्डी हो गयी है,
पीढ़ियों की सोच गन्दी हो गयी है,
सभ्यता का रूप मैला हो गया है।
मधुर केला भी कसैला हो गया है।।
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शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

दोहागीत "फीके हैं त्यौहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दोहा गीत
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बात-बात पर हो रही, आपस में तकरार।
भाई-भाई में नहीं, पहले जैसा प्यार।।
(१)
बेकारी में भा रहा, सबको आज विदेश।
खुदगर्ज़ी में खो गये, ऋषियों के सन्देश।।
कर्णधार में है नहीं, बाकी बचा जमीर।
भारत माँ के जिगर में, घोंप रहा शमशीर।।
आज देश में सब जगह, फैला भ्रष्टाचार।
भाई-भाई में नहीं, पहले जैसा प्यार।।
(२)
आपाधापी की यहाँ, भड़क रही है आग।
पुत्रों के मन में नहीं, माता का अनुराग।।
बड़ी मछलियाँ खा रहीं, छोटी-छोटी मीन।
देशनियन्ता पर रहा, अब कुछ नहीं यकीन।।
छल-बल की पतवार से, कैसे होंगे पार,
भाई-भाई में नहीं, पहले जैसा प्यार।।
(३)
ओढ़ लबादा हंस का, घूम रहे हैं बाज।
लूट रहे हैं चमन को, माली ही खुद आज।।
खूनी पंजा देखकर, सहमे हुए कपोत।
सूरज अपने को कहें, ये छोटे खद्योत।।
मन को अब भाती नहीं, वीणा की झंकार।
भाई-भाई में नहीं, पहले जैसा प्यार।।
(४)
जब हो सबका साथ तो, आता तभी विकास।
महँगाई के दौर में, टूट रही है आस।।
कोरोना ने हर लिया, जीवन का सुख-चैन।
समय पुराना खोजते, लोगों के अब नैन।।
आशाएँ दम तोड़ती, फीके हैं त्यौहार।
भाई-भाई में नहीं, पहले जैसा प्यार।।
(५)
कुनबेदारी ने हरा, लोकतन्त्र का 'रूप'।
आँगन में आती नहीं, सुखद गुनगुनी धूप।।
दल-दल के अब ताल में, पसरा गया है पंक।
अब वो ही राजा हुए, कल तक थे जो रंक।।
जन-जन का हो उन्नयन, मन में यही विचार।
भाई-भाई में नहीं, पहले जैसा प्यार।।
-- 

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

दोहे "कीर्तिमान सब ध्वस्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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कोरोना के काल में, ऐसी मिली शिकस्त।
महँगाई ने कर दिये, कीर्तिमान सब ध्वस्त।।
--
ईंधन महँगा हो रहा, जनता है लाचार।
बिचौलियों के सामने, बेबस है सरकार।।
--
दोनों हाथों से रहे, दौलत लोग समेट।
फिर भी भरता है नहीं, उनका पापी पेट।।
--
दुख आये या सुख मिले, रखना मृदुल स्वभाव।
कर देते कड़वे वचन, सीधा दिल पर घाव।।
--
जिसका होता है उदय, उसका होता अस्त।
अंग बुढ़ापे में सभी, हो जाते हैं पस्त।।
--
सबको सुख है बाँटता, सुन्दर विमल-वितान।
जाना पड़ता छोड़कर, जब होता अवसान।।
-- 
बिखरे हैं संसार में. भाँति-भाँति के रंग।
देश-काल अनुसार ही, रखना अपने ढंग।।
 --

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

गीत "मोहक रूप बसन्ती छाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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बौराई गेहूँ की काया,
फिर से अपने खेत में।
सरसों ने पीताम्बर पाया,
फिर से अपने खेत में।।
--
हरे-भरे हैं खेत-बाग-वन,
पौधों पर छाया है यौवन,
झड़बेरी ने 'रूप' दिखाया,
फिर से अपने खेत में।।
--
नये पात पेड़ों पर आये,
टेसू ने भी फूल खिलाये,
भँवरा गुन-गुन करता आया,
फिर से अपने खेत में।।
--
धानी-धानी सजी धरा है,
माटी का कण-कण निखरा है,
मोहक रूप बसन्ती छाया,
फिर से अपने खेत में।।
--
पर्वत कितना अमल-धवल है,
गंगा की धारा निर्मल है,
कुदरत ने सिंगार सजाया,
फिर से अपने खेत में।।
--

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

दोहे "सिंह बने शृंगाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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वासन्ती मौसम हुआ, सुधर रहे हैं हाल।
सूर्यमुखी ऐसे खिला, जैसे हो पिंजाल*।।
--
शैल-शिखर पर कल तलक, ठिठुरा था सिंगाल*
सूर्य-रश्मियाँ कर रहीं, उनको आज निहाल।।
--
राजनीति में बन गये, बगुले आज मराल।
सन्तों का चोला पहन, पनप रहे पम्पाल*
--
हिंसा के परिवेश में, सिंह बने शृंगाल।
पत्र-निलय में आजकल, गायब हुए टपाल*।।
--
मँडराते हैं गगन में, चील और कौवाल*
दानव जैसे हो गये, मानव आज कराल*।।
--
नदियों में कीचड़ दिखी, हालत है विकराल।
तालाबों में उग रहे, जहाँ-तहाँ शैवाल।।
--
जगह-जगह पर हो रहे, दंगे और बवाल।
राजनीति की आग में, जलता है बंगाल।।
--------

शब्दार्थः-
पिंजाल-स्वर्ण, सिंगाल-पहाड़ी बकरा, पम्पाल-दुष्ट, 
टपाल-चिट्ठी/पत्री, कौवाल-कौआ, कराल-दुष्ट

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

गीत "बज उठी वीणा मधुर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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खिल उठा सारा चमन
,
दिन आ गये हैं प्यार के।
रीझने के खीझने के,
प्रीत और मनुहार के।। 
--
चहुँओर धरती सज रही है,
डालियाँ सब फूलती,
पायल छमाछम बज रहीं,
नव-बालियाँ हैं झूलती,
डोलियाँ सजने लगीं,
दिन आ गये शृंगार के।
रीझने के खीझने के,
प्रीत और मनुहार के।।
--
झूमते हैं मन-सुमन,
गुञ्जार भँवरे कर रहे,
टेसुओं के फूल वन में, 
रंग अनुपम भर रहे,
गान कोयल गा रही,
दिन आ गये अभिसार के।
रीझने के खीझने के,
प्रीत और मनुहार के।।
--
कचनार की कच्ची कली भी,
मस्त हो बल खा रही,
हँस रही सरसों निरन्तर,
झूमकर कर इठला रही,
बज उठी वीणा मधुर,
सुर सज गये झंकार के।
रीझने के खीझने के,
प्रीत और मनुहार के।। 
--

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