(१) आग से खेलना मत, जलाती है ये अपनी औकात सबको, बताती है ये सिर्फ ज़ज़्बात से बात बनती नहीं, दिल्लगी दिल-लगी बन सताती है ये (२) श्वेत परिधान हैं, सादगी के लिए सभ्यता है बनी, आदमी के लिए दाग माथे का हो या हो पौशाक का दाग़ तो दाग़ है ज़िन्दग़ी के लिए (३) सात रंगों सी सुहानी, फाग है ये ज़िन्दग़ी दोस्ती की गन्ध देती, बाग़ है ये ज़िन्दग़ी ज़िन्दग़ी में ग़लत सुर को, मत लगा देना कभी प्रीत के अनुराग जैसा, राग है ये ज़िन्द़गी -- |
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सोमवार, 5 फ़रवरी 2024
तीन मुक्तक "दाग़ तो दाग़ है ज़िन्दग़ी के लिए" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रविवार, 11 फ़रवरी 2018
मुक्तक "आचरण होता नहीं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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बाँटते उपदेश लेकिन, आचरण होता नहीं।
भावना के साथ में, अन्तःकरण होता नहीं।
देख कर इस दुर्दशा को, दुःख होता है बहुत,
है नयी कविता, मगर कुछ व्याकरण होता नहीं।।
--
पेड़ को देते चुनौती, आजकल बौने शज़र।
नासमझ भोले पतिंगे, मानते खुद को अजर।
सामने कुछ और हैं, पर पीठ पीछे और कुछ,
भीड़ में हमदर्द तो, आता नहीं कोई नज़र।।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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सोमवार, 27 मार्च 2017
"भारतीय नववर्ष-2074 का हार्दिक शुभकामनाएँ"
रविवार, 29 जनवरी 2017
कवित्त और मुक्तक "नेता आया बिनबुलाया है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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भारत की महानता का, नही है अतीत याद,
वोट माँगने को, नेता आया बिनबुलाया है।
देश का कहाँ है ध्यान, होता नित्य सुरापान,
जाति, धर्म, प्रान्त जैसे, मुद्दों को भुनाया है।
युवराज-सन्त चल पड़े, गली-हाट में,
निर्वाचन के दौर ने, ये दिवस भी दिखाया है।।
--
दुर्बल पौधों को ही ज्यादा, पानी-खाद मिला करती है।
चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला करती है।
सूखे पेड़ों पर बसन्त का, कोई असर नही होता है,
यौवन ढल जाने पर सबकी गर्दन बहुत हिला करती है।।
--
तुम्हारी याद को लेकर, बड़ी ही दूर आये हैं।
लबों पर प्यास आयी तो, तुम्हारे जाम पाये हैं।
छिपाकर अपनी आँखों में तुम्हारा नूर लाये हैं,
लिखाकर दिल की कोटर में, तुम्हारा नाम लाये हैं।
--
आँखें कभी छला करती हैं,
आँखे कभी खला करती हैं।
गैरों को अपना कर लेती,
जब ये आँख मिला करती हैं।।
--
नेह का नीर पिलाकर देखो।
शोख कलियों को खिला कर देखो। वेवजहा हाथ मिलाने से कुछ नहीं होगा- दिल से दिल को तो मिलाकर देखो।।
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अब तो हर बात बहुत दूर गई।
दिल की सौगात बहुत दूर गई। रौशनी अब नज़र नहीं आती चाँदनी रात बहुत दूर गई।।
--
जीवन में तम को हरने को, चिंगारी आ जाती है।
घर को आलोकित करने को, बहुत जरूरी बाती है।
होली की ज्वाला हो चाहे, तम से भरी अमावस हो-
हवनकुण्ड में ज्वाला बन, बाती कर्तव्य निभाती है।
--
हम दधिचि के वंशज हैं, ऋषियों की हम सन्ताने हैं।
मातृभूमि की शम्मा पर, आहुति देते परवाने हैं।
दुनियावालों भूल न करना, कायर हमें समझने की-
उग्रवाद-आतंकवाद से, डरते नहीं दीवाने हैं।
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शनिवार, 12 मार्च 2016
मेरे दो मुक्तक "समय का चक्र चलता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गुरुवार, 10 मार्च 2016
शनिवार, 24 अक्टूबर 2015
मुक्तक "कभी भी लाचार हमको मत समझना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कुटिलता के भाव को पहचानते हैं,
शत्रुता दिल में नहीं हम ठानते हैं।
वो बहुत खुलकर चलाते तीर अपने,
वार हम चुपचाप सहना जानते हैं।।
हम सुमन के हैं हितैषी, गन्ध को पहचानते हैं,
इसलिए हमसे कुटिल-काँटे, लड़ाई ठानते हैं।
छेदते हैं जो हमारे, वतन का नाजुक बदन,
ठोकरों से हम उन्हें, हरदम कुचलना जानते हैं।।
दरियादिली को, बुज़दिली तुम मत समझना,
दिल की लगी को, दिल्लगी तुम मत समझना।
वक्त आने पर बहा देंगे लहू की धार को,
कभी भी लाचार हमको मत समझना।।
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बुधवार, 21 अक्टूबर 2015
"पाँच मुक्तक" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
![]()
जानते हैं सच, तभी तो मौन हैं वो,
और ज्यादा क्या कहें हम, कौन हैं वो।
जो हमारे दिल में रहते थे हमेशा-
हरकतों से हो गए अब गौण हैं वो।१।
--
दिल तो सूखा कुआँ नहीं होता,
बिन लिखे मजमुआँ नहीं होता।
लोग पल-पल की ख़बर रखते हैं-
आग के बिन धुँआ नहीं होता।२।
--
उनकी सौगात बहुत दूर गई,
अब तो हर बात बहुत दूर गई।
रौशनी होगी नहीं तारों से-
चाँदनी रात बहुत दूर गई।३।
--
कोई आया था हौसले भरने,
कोई आया था चोंचले करने।
कोई आया था खास मक़सद से-
कोई आया था फासले करने।४।
--
इतनी मजबूत राह थी पाई,
एक बरसात में बनी खाई।
दोष क्यों दे रहे हो लहरों को-
जब किनारे हुए हैं हरजाई।५।
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सोमवार, 5 अक्टूबर 2015
"काँटे और सुमन-एक मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]()
काँटे और सुमन दोनों ही, संग-साथ में पलते हैं।
सुख-दुख की घड़ियों में दोनों, संग-साथ में चलते हैं।
फूलों को काँटों की संगत, सबसे अच्छी लगती है-
खतरा उन इंसानों से, जो इनको सदा मसलते हैं।।
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शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015
"कुटिल-काँटे लड़ाई ठानते हैं-तीन मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कुटिलता के भाव को पहचानते हैं,
शत्रुता दिल में नहीं हम ठानते हैं।
वो बहुत खुलकर चलाते बाण अपने,
किन्तु हम चुपचाप सहना जानते हैं।।
--
हम सुमन के हैं हितैषी, गन्ध को पहचानते हैं,
इसलिए हमसे कुटिल-काँटे लड़ाई ठानते हैं।
छेदते हैं जो सुकोमल पुष्प का नाजुक बदन,
ठोकरों से हम उन्हें, हरदम कुचलना जानते हैं।।
--
बुज़दिली! दरियादिली को मत समझना,
दिल्लगी! दिल की लगी को मत समझना।
वक्त आने पर बहा देंगे रुधिर की धार को,
खड्ग को लाचार इतना मत समझना।।
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गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015
"ज़िन्दग़ी के तीन मुक्तक" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
(१)
आग से खेलना मत, जलाती है ये
अपनी औकात सबको, बताती है ये
सिर्फ ज़ज़्बात से बात बनती नहीं,
दिल्लगी दिललगी बन सताती है ये
(२)
श्वेत परिधान हैं, सादगी के लिए
सभ्यता है बनी, आदमी के लिए
दाग माथे का हो या हो पौशाक का
दाग़ तो दाग़ है ज़िन्दग़ी के लिए
(३)
सात रंगों सी सुहानी, फाग है ये ज़िन्दग़ी
दोस्ती की गन्ध देती, बाग़ है ये ज़िन्दग़ी
ज़िन्दग़ी में ग़लत सुर को, मत लगा देना कभी
प्रीत के अनुराग जैसा, राग है ये ज़िन्द़गी
|
रविवार, 1 फ़रवरी 2015
"तीन मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]()
आँखें कभी छला करती हैं,
आँखे कभी खला करती हैं।
गैरों को अपना कर लेती,
जब ये आँख मिला करती हैं।।
--
दुर्बल पौधों को ही ज्यादा, पानी-खाद मिला करती है।
चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला
करती है।
सूखे पेड़ों पर बसन्त का, कोई असर नही होता
है,
यौवन ढल जाने पर सबकी गर्दन बहुत हिला करती है।।
--
तुम्हारी याद को लेकर, बड़ी ही दूर आये हैं।
लबों पर प्यास आयी तो, तुम्हारे जाम पाये हैं।
छिपाकर अपनी आँखों में तुम्हारा नूर लाये हैं,
लिखाकर दिल की कोटर में, तुम्हारा नाम
लाये हैं।
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शनिवार, 31 जनवरी 2015
"कुछ मुक्तक-आग के बिन धुँआ नहीं होता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
जानकर सारी हक़ीक़त, आज कितने मौन हैं वो,
और ज्यादा क्या कहें, दुश्मन नहीं तो कौन हैं वो।
प्राण बनकर जो हमारे दिल में रहते थे कभी,
हरकतों से आज अपनी, हो गये खुद गौण हैं वो।१।
--
दिल कभी सूखा कुआँ नहीं होता,
बिन लिखे मजमुआँ नहीं होता।
लोग पल-पल की ख़बर रखते हैं,
आग के बिन धुँआ नहीं होता।२।
--
उनकी सौगात बहुत दूर गई,
अब तो वो बात बहुत दूर गई।
रौशनी है कहाँ सितारों में,
चाँदनी रात बहुत दूर गई।३।
--
कोई आया था हौसले भरने,
कोई आया था चोंचले करने।
कोई आया था खास मक़सद से,
कोई आया था फासले करने।४।
--
एक धारा पहाड़ से आई,
राह बरसात में बनी खाई।
दोष क्यों दे रहे हो लहरों को,
जब किनारे हुए हैं हरजाई।५।
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सोमवार, 16 सितंबर 2013
1850वीं पोस्ट "तीन मुक्तक" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
"तीन मुक्तक"
(१)
आग को आग समझो, जलाती है ये
अपनी औकात सबको बताती है ये
दिल के ज़ज़्बात से खेलना मत कभी,
अच्छे-अच्छों के दिल को सताती है ये
(२)
श्वेत परिधान हैं, सादगी के लिए
सभ्यता है बनी, आदमी के लिए
दाग माथे का हो या हो पौशाक का
दाग़ तो दाग़ है ज़िन्दग़ी के लिए
(३)
सात रंग से भरा, फाग है ज़िन्दग़ी
दोस्ती का चमन, बाग है ज़िन्दग़ी
मत ग़लत सुर लगाना, कभी भी यहाँ
गीत और प्रीत का राग है ज़िन्द़गी
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शनिवार, 10 अगस्त 2013
"भारत माँ का कीर्तन-भजन होना चाहिए" (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक')
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भारत माँ का कीर्तन-भजन होना चाहिए।
देश की सीमाओँ को बचाने के लिए तो आज,
तन-मन प्राण का हवन होना चाहिए।
शासकों को सीधी चाल चलने की जरूरत है,
तुष्टिकरण नीति का दमन होना चाहिए।
ईंट का जवाब अब देना होगा पत्थरों से,
बैरियों को कब्र में दफन होना चाहिए।
कोठी-बंगलों में ऐश बन्द होनी चाहिए,
सबके लिए मामूली भवन होना चाहिए।
रत्न-भूषण और श्री चाटुकारिता के चिह्न से,
मुक्त अपना प्यारा ये चमन होना चाहिए।
उग्रवादियों को सजा फाँसी की मिले तुरन्त,
अपने प्यारे देश में अमन होना चाहिए।
नेताओं की लाश को न झण्डे लपेटा जाये,
शहीदों का तिरंगा कफन होना चाहिए।
आजादी की जंग में जिन्होंने बलिदान दिया,
उन देशभक्तों का नमन होना चाहिए
जाति-धर्म, भाषा और भूषा की न होड़ लगे,
सबसे पहले अपना वतन होना चाहिए।
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