देशभक्ति-दलभक्ति के, संगम थे अभिराम। |
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शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020
बुधवार, 31 जुलाई 2019
दोहे "उपन्यास सम्राट को नमन हजारों बार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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निर्धनता के जो रहे, जीवनभर पर्याय।
लमही में पैदा हुए, लेखक धनपत राय।।
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आम आदमी की व्यथा, लिखते थे जो नित्य।
प्रेमचन्द ने रच दिया, सरल-तरल साहित्य।।
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जीवित छप्पन वर्ष तक, रहे जगत में मात्र।
लेकिन उनके साथ सब, अमर हो गये पात्र।।
फाकेमस्ती में जिया, जीवन को भरपूर।
उपन्यास सम्राट थे, आडम्बर से दूर।।
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उपन्यास 'सेवासदन', 'गबन' और 'गोदान'।
हिन्दी-उर्दू अदब पर, किया बहुत अहसान।।
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'रूठीरानी' को लिखा, लिक्खा 'मिलमजदूर'।
प्रेमचन्द मुंशी रहे, सदा मजे से दूर।।
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लेखन में जिसका नहीं, झुका कभी किरदार।
उस लमही के लाल को, नमन हजारों बार।।
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शुक्रवार, 20 जुलाई 2018
"गीतकार नीरज तुम्हें, नमन हजारों बार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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गीतकार नीरज तुम्हें, नमन हजारों बार।।
स्वप्न झर गये फूल से, लुटा साज-शृंगार।
आँगन से वटवृक्ष का, मिटा आज आकार।।
दया नहीं करता कभी, क्रूर काल का पाश।
नीरज बिन सूना हुआ, हिन्दी का आकाश।।
आज शोक सन्तप्त है, हिन्दी का प्रासाद।
नीरज जी को कर रहे, हिन्दी प्रेमी याद।।
जीवनभर जिसने किया, हिन्दी का ही काम।
अमर रहेगा युगों तक, उस नीरज का नाम।।
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सोमवार, 31 जुलाई 2017
दोहे "तुलसीदास-नमन हजारों बार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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श्रावण शुक्ला सप्तमी, दिवस आज है खास।
माँ हुलसी की कोख से, जनमे तुलसीदास।।
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मानस के इस सन्त का, जनम दिवस है आज।
मना रहा अनुभाव से, जिसको आज समाज।।
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मर्यादित श्री राम का, लिया सबल आधार।
मानस की महिमा सभी, करते हैं स्वीकार।।
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अपने भारत देश में, कण-कण में श्री राम।
राम नाम के जाप से, बनते बिगड़े काम।।
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कविवर तुलसीदास ने, दिया हमें उपहार।
दोहा-चौपाई हरें, मन के सकल विकार।।
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जिसने सत् साहित्य का, चमन किया गुलजार।
उस हुलसी के लाल को, नमन हजारों बार।
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जो करता है भक्ति का, जन-जन में संचार।
उसकी ही होती सदा, जग में जय-जयकार।।
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