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मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

दोहे "श्रम की बात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

श्रमिकों से जिनका नहीं, कोई भी सम्बन्ध।
श्रमिक-दिवस पर लिख रहे, वो भी शोध-प्रबन्ध।।
--
सुबह दस बजे जागते, सोते आधी रात।
खाते माल हराम का, करते श्रम की बात।।
--
काँटे और गुलाब का, कैसा है संयोग।
अन्तर आलू-आम का, नहीं जानते लोग।।
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नहीं गये जो बाग में, देखा नहीं बसन्त।
वही बने हैं आज भी, मजदूरों के सन्त।।
--
जिसने झेली ही नहीं, शीत-ग्रीष्म-बरसात।
वो जननायक कर रहा, मजदूरों की बात।।
--
सस्ता बिका किसान का, गेहूँ-चावल-दाल।
जाते ही बाजार में, आ जाता भूचाल।।
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महँगी बहुत शराब क्यों, कोई नहीं जवाब।
क्यों होती श्रमवीर की, हालत यहाँ खराब।।
--
सत्ता में आये भले, कोई भी सरकार।
कोई श्रमिक-किसान का, नहीं करे उपकार।।
  

सोमवार, 29 अप्रैल 2019

दोहे "चली झूठ की नाव" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


आवारा सी हो गयी, शीतल-सुखद बयार।
चलें चुनावी समर में, छल-बल के हथियार।।

राजनीति के सिन्धु में, चली झूठ की नाव।
भाषण की पतवार से, लड़ते लोग चुनाव।।

भीख माँगने आ गये, सारे भाषणवीर।
प्रजातन्त्र के खेल में, बिकने लगा जमीर।।

दर्पण से छल कर रही, अब खुद की तसवीर।
कृष्ण आजकल लाज का, खींच रहे हैं चीर।।

दानवता का कर रहा, मानव आविष्कार।
प्रजातन्त्र में हो गये, पैदा अब मक्कार।।

रविवार, 28 अप्रैल 2019

समीक्षा “लौट चलें अब गाँव” (समीक्षक-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 “लौट चलें अब गाँव”
(दोहा पंचशती)
प्राचीन और अर्वाचीन का अनूठा संगम
 
        कभी-कभी अनायास ही छन्द शास्त्र के पण्डितों से भेंट हो जाती है। दिल्ली में पिछले सप्ताह किसी पुस्तक के विमोचन में मेरी भेंट सुस्थापित साहित्यकार डॉ. सुरेशचन्द्र शर्मा से हुई। वो बिल्कुल मेरी बगल में ही मंचासीन थे। बातों-बातों में पता लगा कि आप पद्य ही नहीं अपितु गद्य के भी सिद्धहस्त लेखक हैं। आपने मुझे पाँच सौ दोहों के संकलन “लौट चलें अब गाँव” की प्रति भेंट की। पुस्तक को सांगोपांग पढ़ने के उपरान्त विचार आया कि क्यों न पहले “लौट चलें अब गाँव” पर ही कुछ शब्द लिखूँ और कम्प्यूटर के की-बोर्ड पर मेरी अँगुलियाँ चलने लगीं।
     हिन्दी साहित्य शोध संस्थान नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित “लौट चलें अब गाँव” (दोहा पंचशती) 102 पृष्ठों की पाँच सौ दोहों की पेपरबैक पुस्तक है। जिसका मूल्य दो सौ बीस रुपये मात्र है।
     विद्वान कवि डॉ. सुरेशचन्द्र शर्मा ने अपने दोहा संकलन में जन जीवन से जुड़े गाँव और शहर, राजनीति और भ्रष्टाचार, नीति और व्यवहार तथा प्रकृति से सम्बन्धित अनुभव की कसौटी पर कसे हुए उत्कृष्ट दोहों को स्थान दिया है। मेरा मानना है कि कवित्त, गीत-गजल और काव्य की अन्य विधाओं में यह गुंजाइश रहती है कि कवि अपनी बात को मुखड़े अन्तरे, अशआरों या मतला-मक्ता में अपने उद्गार को व्यक्त कर सकता है लेकिन दोहा एक ऐसा छन्द है जिसमें दोहाकार को चार चरणों अर्थात् दो पंक्तियों में ही अपनी बात को कहना होता है। “लौट चलें अब गाँव” में दोहाकार अपने दोहों में अपनी पूरी बात रखने में पूरी तरह सफल रहा है।
       न सरस्वती वन्दना न ईश आराधन तथा बिना समर्पण के कवि डॉ. सुरेशचन्द्र शर्मा ने बिना किसी औपचारिक के अपने दोहों का श्रीगणेश किया है। उनकी दृष्टि में हर एक शब्द माँ शारदे का स्तवन है। प्राचीनता से अर्वाचीनता की दौड़ में यह उचित ही प्रतीत होता है। तेजी से भागते युग और समय में आज पाठकों के पास भी समाय का अभाव है अर्थात वह सीधे-सीधे आपकी बात को आत्मसात् करना चाहते हैं।
      संकलन का शुभारम्भ करते हुए दोहाकार लिखता है-
“बरसों से हूँ शहर में, लेकिन हूँ अनजान।
जीवन ठहरा ताल सा, नहीं जान-पहचान।।
--
आँगन बड़ा उदास था, छोड़ा था जब गाँव।
रोबोटों का शहर है, मन को मिले न छाँव।।
--
आये शहरी धाम में, बरगद के सुख छोड़।
यहाँ अनैतिक काम की, लगी हुई है होड़।।
--
अरे बावले लौट चल, बिखरे तेरे ख्वाब।
यमपाशित यह नगर है, नहीं बची है आब।।”
      राजनीति और भ्रष्टाचार पर चोट करते हुए आहत हुए दोहाकार ने बहुत ही बेबाक होकर अपने दोहे रचे हैं। उदाहरण स्वरूप कुछ दोहे देखिए-
“उल्लू का दरबार है, राजनीति की जात।
खुल्लमखुल्ला बँट रही, अपनों को सौगात।।
--
हे त्रपुरारी देश में, शिशुपालों की फौज।
भलमनसाहत रो रही, मारपीट की मौज।।
--
लोकतन्त्र के नाम पर, आज भीड़ का राज।
मांस नोच कर खा रहे, नेता बनकर बाज।।
--
सिंहासन पर आज है, शकुनी का अधिकार।
इसीलिए तो पाप की, होती जय-जयकार।।”
      नीति और व्यवहार पर दोहाकार ने अपने अन्दाज में अपनी बात कुछ इस प्रकार से कही है-
“बचपन कैसा बेरह, शीघ्र गया वो भाग।
झुलसी कोमल भावना, भूला तुतला राग।।
--
समय पखोरू उड़ चला, ढलता वय-दिनमान।
पौरुष किन्नर हो गया, टूटा किरण मचान।।
--
विषधर दंशित कर रहे, सारा आज समाज।
किन्नर सा व्यवहार कर, खोई सबने लाज।।
--
वक्त डराकर कह रहा, करो हार स्वीकार।
आसा कहती कान में, फिर से करो विचार।।”
      प्रकृति के बारे में दोहाकार ने लिखा है-
“नभ में फैली चाँदनी, बिखरा घट सितचूर्ण।
लगे छोड़ने नीड़ खग, समझ रैन को पूर्ण।।
--
रवि बरसाये आग अब, जलता पूरा देश।
पीपल-पल्लव लाल हैं, क्रूर धरा का वेश।।
--
मुकुट पहनकर आम हैं, व्याकुल और अधीर।
कोकिल क्यों आती नहीं, बात बहुत गम्भीर।।
--
टेढ़े-मेढ़े बह रहे, नाले भर मन दर्प।
दादुर भय से काँपता, समझ भूल से दर्प।।”
       कवि के भावों और अनुभावों से ओत-प्रोत दोहा संकलन “लौट चलें अब गाँव” के बारे में मैने यह अनुभव किया है इसमें संकलित सभी दोहों का भावपक्ष बहुत प्रबल है। किन्तु कलापक्ष के दृष्टिकोण से कुछ दोहे छन्द की कसौटी पर खरे नहीं है। शायद प्रूफ-रीडिंग कवि के द्वारा नहीं किया गया है और टंकणकर्ता ने टंकण में बहुत गल्तियाँ कर दीं है। कुछ दोहे तो ऐसे हैं जो मात्राओं की दृष्टि से तो सही हैं मगर टंकणकर्ता ने अपने मन से शब्दों को समुचित स्थान पर टाइप नहीं किया है। 
     जहाँ सूर, कबीर, तुलसी, जायसी, नरोत्तमदास इत्यादि समस्त कवियों ने अपने साहित्य के माध्यम से समाज को कुछ न कुछ नया देने का प्रयास किया है। वहीं विद्वान दोहाकार डॉ. सुरेशचन्द्र शर्मा ने “लौट चलें अब गाँव” में भी अपने पाँच सौ दोहों में नवीनतम प्रयोग किये हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि निकट भविष्य में इस संकलन का दूसरा संस्करण बिल्कुल शुद्धरूप में पाठकों के सामने आयेगा।
     मैंने अनुभव किया है डॉ. सुरेशचन्द्र शर्मा के दोहे बहुत मार्मिक धारदार और पैने हैं जो दिल पर सीधा वार करते हैं। आशा है पाठक इस दोहाकृति से अवश्य लाभान्वित होंगे और समीक्षकों की दृष्टि में भी यह उपादेय सिद्ध होगी।
     हार्दिक शुभकामनाओं के साथ- 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
समीक्षक एवं साहित्यकार
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262308
सम्पर्क-7906360576, 7906295141
ई-मेल- roopchandrashastri@gmail.com
वेब साइट- http://uchcharan.blogspot.com/ 

शनिवार, 27 अप्रैल 2019

दोहे "केवल कुनबावाद" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


चरणबद्ध होने लगे, जब से आम चुनाव।
देर तलक मझधार में, तब से रहती नाव।।
 --
संसद जाने के लिए, उमड़ रही है भीड़।
पलकों में सबकी सजा, लोकतन्त्र का नीड़।।
-- 
जाति-धर्म के नाम पर, दंगे और फसाद।
राजनीति में बढ़ रहा, केवल कुनबावाद।।
-- 
अगर किसी की खुल गई, एक बार तकदीर।
जीवन भर वो चाहता, बनना यहाँ वजीर।।
-- 
जनता से जिनका नहीं, रहा कभी सम्बन्ध।
उन्हें सियासत की यहाँ, आती खूब सुगन्ध।।
-- 
बेटे-पोतों के लिए, सब करते अनुबन्ध
आती है जनतन्त्र में, राजतन्त्र की गन्ध।।
--

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

समीक्षा “प्रकाश स्तम्भ” (समीक्षक-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


“प्रकाश स्तम्भ”
रुपहली सुबह में आशा की किरण
     सोशल साइट पर मेरे बहुत सारे मित्र हैं। इसलिए सभी को याद रखना बहुत कठिन होता है। पिछले सप्ताह किसी मित्र की पुस्तक के विमोचन में मैं दिल्ली गया था। वहाँ मेरी भेंट सुस्थापित कवयित्री श्रीमती सूक्ष्मलता महाजन से   हुई। वहाँ आपने मुझे अपनी अतुकान्त रचनाओं की कृति “प्रकाश स्तम्भ” भेंट की। जिसको में अपने पुस्तकालय में सहेजने जा ही रहा था। लेकिन जब इस कृति को पढ़ा तो विचार आया कि क्यों न पहले “प्रकाश स्तम्भ” के बारे में ही कुछ शब्द लिखूँ और कम्प्यूटर के की-बोर्ड पर मेरी अँगुलियाँ चलने लगीं।
     अमृत प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित “प्रकाश स्तम्भ” 96 पृष्ठ की अतुकान्त रचनाओं की सजिल्द पुस्तक है। जिसका मूल्य दो सौ रुपये मात्र है।
     विदूषी कवयित्री सूक्ष्म लता महाजन ने अपने काव्य संकलन में 54 विविधवर्णी रचनाओं को स्थान दिया है। मेरा मानना है कि तुकान्त रचनाओं में रचनाकार प्रयास करके तुकबन्दी करता है जिसके कारण कई बार मन के भाव और भा, में भिन्नता आ जाती है लेकिन अतुकान्त रचनाओं में भाव और भाषा में सदैव सामंजस्य रहता है। अतुकान्त लेखन में एक विशेष बात यह होती है कि इसमें प्रभावशाली शब्द ही रचना को जीवन्त और कालजयी बनाते हैं।
      कवयित्री ने अपने संकलन “प्रकाश स्तम्भ” में आम जीवन से जुड़ी मार्गदर्शक, मेला, अबला, डरी हुई लड़की, दहेज, मदहोश जवानी, जमीर, कालचक्र, याद, बीती बतिया, परिणय, टिक-टिक, प्रकटी, जीवन, विशाल, साधु, होली, अमूल्य निधि, अद्वैत, वात्सल्य, कमल पुष्प, मुस्कराता बसन्त, दीपक, जीने की कला, नई दुनिया, मेरा देश, स्तापना, नयासाल, ग्रहण, वायरस, उड़ान, अपने पराये, परमपिता, कर्मतीत, प्रकृति, माला, वर्षगाँठ, मुसाफिर, कोलाहल, साथी, आस, बचपन, प्रकाश स्तम्भ, वीर शिवाजी, जन्मदिन, सुबह, राजनीति, असमंजस, खिवैया, आधुनिकता, आदि शीर्षकों से उपयोगी रचनाओं पर अपनी कलम चलाई है।
      प्रत्येक रचना शब्द माँ शारदे का स्तवन होता है। अतः कवयित्री ने सरस्वती वन्दना के मिथक को झुठलाते हुए “मार्गदर्शक” शीर्षक से संकलन का शुभारम्भ करते हुए लिखा है-
“अन्धकार के अथाह सागर में
आनन्द किरणें फैला रहा
अपने-पराये का भेद किये बिन
मार्ग सबको दिखा रहा

आशा की किरणें फैला कर
मार्ग करता सबका जगमग
दिन रात वो खड़ा अडिग
राह तकता आगन्तुक की”
      नारी शक्ति का आह्वान करते हुए “अबला” से कवयित्री ने अपनी अभिव्यक्ति में लिखा है-
“क्यूँ पुकारे तुझे कह अबला
तू तो है सृष्टि का आधार
सिखलाती सबको व्यवहार
करती जीवन का उद्धार”
      कवयित्री ने “जमीर” शीर्षक से अपनी बात कुछ इस प्रकार से कही है-
“बनते जाओ तुम फकीर
चमका लो अपनी तकदीर
यही है बाबा की तदबीर
जगा कर रखो अपना जमीर”
      “मेरा देश” के बारे में कवयित्री ने देश भक्ति के बारे में अनेकता में एकता का सन्देश देते हुए लिखा है-
“देश मेरा यह प्यारा देश
इसमें समाये बहुत से प्रदेश
भिन्न-भिन्न सबके परिवेश
फिर भी दिखते सभी हैं एक”
      “मेरा बाबा परमपिता” के बारे में अपने उद्गार प्रकट करते हुए कवयित्री ने लिखा है-
“कौन कहता है वो नहीं है
वह तो हर पल हर घड़ी यहीं है
अपनों के साथ अपनों के बीच
हर पौध को रहा है सींच”
      “जीने की कला” में अपने विचार देते हुए कवयित्री सूक्ष्म लता महाजन कहती हैं-
“जीना एक कला है
करना सबका भला है
दुश्मन हो या हो दोस्त
देने में न करना कोफ्त”
     “कर्मातीत” को परिभाषित करते हुए कवयित्र लिखती हैं-
“अपने प्रेम में जकड़े रखना
माया के जाल में न फँसने देना
उल्टे होकर लटकने न देना
बढ़ते रहें हम तुम थामे रखना”
     “मुस्कराता बसन्त” कैसा होना चाहिए, देखिए-
“सरदी का कोहरा हटा
फैली सर्वत्र स्वर्णिम छटा
लुप्त हो गयी आलस्य की घटा
मुस्कराता बसन्त है द्वार पर खड़ा”
       वर्तमान परिवेश में “डरी हुई लड़की” के बारे में कवयित्री ने अपने शब्द कुछ इस प्रकार उकेरे हैं-
“कितनी डरी हुई है लड़की
गुहार लगाती मिन्नतें करती
उनसे वो मनुहार है करती
जो शायद हैं खुद डरे हुए
दुःख विषाद से भरे हुए”
      साहित्य की विभिन्न विधाएँ साहित्यकार की देन होती हैं। जो समाज को दिशा प्रदान करती हैं, जीने का मकसद बताती हैं। सूर, कबीर, तुलसी, जायसी, नरोत्तमदास इत्यादि समस्त कवियों ने अपने साहित्य के माध्यम से समाज को कुछ न कुछ नया देने का प्रयास किया है। “प्रकाश स्तम्भ” भी इसी तरह का प्रयोग है। जो कवयित्री सूक्ष्म लता महाजन की कलम से निकला है।
     मुझे आशा ही नहीं अपितु पूरा विश्वास भी है कि आपकी कविताएँ पाठकों के दिल की गहराइयों तक जाकर अपनी जगह बनायेगी और समीक्षकों की दृष्टि में भी यह उपादेय सिद्ध होगी। साथ ही मुझे आसा है कि निकट भविष्य में आपकी अन्य कृतियाँ भी पाठकों को पढ़ने को मिलेंगी।
     हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-  
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
समीक्षक एवं साहित्यकार
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262308
सम्पर्क-7906360576, 7906295141
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गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

गीत "पीले झूमर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अमलतास के पीले गजरेझूमर से लहराते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते हैं।।

ये मौसम की मार, हमेशा खुश हो कर सहते हैं,
दोपहरी में क्लान्त पथिक को, छाया देते रहते हैं,
सूरज की भट्टी में तपकर, कंचन से हो जाते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते हैं।।

उछल-कूद करते मस्ती में, गिरगिट और गिलहरी भी,
वासन्ती आभास कराती, गरमी की दोपहरी भी,
प्यारे-प्यारे सुमन प्यार से, आपस में बतियाते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते हैं।।

लुभा रहे सबके मन को, जो आभूषण तुमने पहने,
अमलतास तुम धन्य, तुम्हें कुदरत ने बख्शे हैं गहने,
सड़क किनारे खड़े तपस्वी, अभिनव “रूप” दिखाते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते हैं।।

बुधवार, 24 अप्रैल 2019

ग़ज़ल "दिल की लगी क्या चीज़ है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दिलज़लो से पूछिएदिल की लगी क्या चीज़ है
लटकाए फिरता है गले में,  वो यार का ताबीज़ है

हमराह तो हमराह सेताउम्र करता है वफा
इश्क में पागल दरिन्दालाँघता दहलीज़ है

राज़ दिल के खोलने को, हमसफर तो चाहिए
ज़िन्दग़ी में एक ऐसे, दोस्त की तजबीज़ है  

चाहता करना भलाई, किन्तु करता तो नहीं
है बहुत कुछ आदमी, लेकिन बना *आजीज़ है

दिल सदा रहता जवां,  प्यार बसता है जहाँ
हुस्न से मत कर मुहब्बत, 'रूप' तो नाचीज़ है 
*आजीज=पराया 

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