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शनिवार, 9 मार्च 2019

दोहे "गये आचरण भूल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

होता भगवा रंग पर, जिनको कभी गुमान।।
सरेआम वो कर रहे, कद-पद का अपमान।।
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नेता करते हरकतें, अब तो ऊल-जुलूल। 
सत्ता मद में चूर हो, गये आचरण भूल।। 
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अपने भारत देश में, कहाँ खो गया प्यार।
बात-बात पर हो रहा, आपस में तकरार।।
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भूल गये हैं लोग अब, ऋषियों के उपदेश। 
पोथी-पतरों में निहित, अब जीवन सन्देश।।
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आज विदेशी बोलियाँ, लोग रहे हैं बोल।
अपनी गठरी छोड़कर, उनकी रहे टटोल।।
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देशभक्ति का हो रहा, धीरे-धीरे ह्रास।
ऐसी हालत देखकर, मन हो रहा उदास।।

2 टिप्‍पणियां:

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