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बुधवार, 6 मार्च 2019

ग़ज़ल "बसन्ती रूप है पहना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बहुत मज़बूत बन्धन है, इसे कमजोर मत कहना
बँधी जो प्यार की डोरी, बहुत अनमोल वो गहना

रिवाज़ों और रस्मों की, यहाँ परवाह है किसको
भले अवरोध कितने हों, नदी का काम है बहना

ज़माने के सितम के सामने, सजदा नहीं करना
मुकद्दर के थपेड़ों को, हमेशा प्यार से सहना

अमर है आत्माएँ जब, तो फिर क्या मौत से डरना
मुहब्बत की रवायत है, सलीबों पर टँगे रहना

फिज़ाओं का भरोसा क्या, न जाने कब बदल जायें
बड़ी मुश्किल से गुलशन ने, बसन्ती “रूप” है पहना

2 टिप्‍पणियां:

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