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शुक्रवार, 8 मार्च 2019

दोहे "जूतों की बौछार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जूता चलता देखकर, मोदी-योगी मौन।
भगवा की सरकार में, फूट डालता कौन।।

हैं जूते के सामने, जनसेवक लाचार।
करते उनपर सांसद, जूतों की बौछार।।

जूता चलता देखकर, हुए लोग आवाक।
अनुशासित दल की बनी, खिल्ली और मजाक।।

अहंकार का ऐसा चढ़ा, भूल गये औकात।
अपनी ही जनसभा में, मचा रहे उत्पात।।

सड़कछाप भी हो गये, मतलब में अनुरक्त।
मजबूरी में बन गये, सोग देश के भक्त।।

जाति-धर्म के नाम पर, भारत किया विभक्त।
जनसेवक हैं जोंक से, चूस रहे हैं रक्त।।

2 टिप्‍पणियां:

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