-- जनता के जनतन्त्र में, जनता की है हार। खाने वाले हैं बहुत, लेकिन एक अनार।1। -- धनुष हाथ में है नहीं, चला रहे सब तीर। सबके नहीं नसीब की, खुलती है तकदीर।2। -- तू—तू, मैं-मैं की लगी, राजनीति में होड़। लूटनीति के खेल में, फूटनीति बेजोड़।3। -- सबके मन में है भरा, लोभ-दम्भ भरपूर। जनसाधारण है इसलिए, आज मजे से दूर।4। -- नहीं रहे चाणक्य से, राजनीति में सन्त। कूटनीति का हो गया, लगता है अब अन्त।5। -- निश्छल मन के भाव ही, देते हैं उल्लास। जीवन को करते सरस, हास और परिहास।6। -- अपने प्यारे देश में, समझो तभी सुराज। बिना लोभ-लालच करें, जब हम अपने काज।7। -- दिखता दूषणयुक्त है, संसद का परिवेश। व्यंग्य बाण से हैं भरे, सन्तों के सन्देश।8। -- संसद में बिखरे हुए, भाँति-भाँति के रंग। राजनीति के आज तो, बिगड़ रहे हैं ढंग।9। -- जनसेवक की भूल पर, क्यों होते हो रुष्ट। इनका मन तो बावरा, कभी न हो सन्तुष्ट।10। -- |
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