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शनिवार, 5 दिसंबर 2020

बालकविता "जय विजय-अच्छे-अच्छे काम करूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मैं अपनी मम्मी-पापा के,
नयनों का हूँ नन्हा-तारा। 
मुझको लाकर देते हैं वो,
रंग-बिरंगा सा गुब्बारा।।
--
मुझे कार में बैठाकर,
वो रोज घुमाने जाते हैं।
पापा जी मेरी खातिर,
कुछ नये खिलौने लाते हैं।। 
--
मैं जब चलता ठुमक-ठुमक,
वो फूले नही समाते हैं।
जग के स्वप्न सलोने,
उनकी आँखों में छा जाते हैं।। 
--
ममता की मूरत मम्मी-जी
पापा-जी प्यारे-प्यारे।
मेरे दादा-दादी जी भी,
हैं सारे जग से न्यारे।। 
--
सपनों में सबके ही,
सुख-संसार समाया रहता है।
हँसने-मुस्काने वाला,
परिवार समाया रहता है।। 
--
मुझको पाकर सबने पाली हैं,
नूतन अभिलाषाएँ।
क्या मैं पूरा कर कर पाऊँगा,
उनकी सारी आशाएँ।। 
--
मुझको दो वरदान प्रभू!
मैं सबका ऊँचा नाम करूँ।
मानवता के लिए जगत में,
अच्छे-अच्छे काम करूँ।।
--

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

गीत "5 दिसम्बर, हमारी 47वीं प्रणय जयन्ती" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

तुम कलिका हो मन उपवन की।
तुलसी हो मेरे आँगन की।।
 
तुमसे ही तोे ये घर, घर है,
सपनों का आबाद नगर है,
सुख-दुख में हो साथ निभाती,
आभा-शोभा तुमसे वन की।
संगी-साथी साथी इस जीवन की।।
 
तुम कोयल सी चहक रही हो,
तुम जूही सी महक रही हो,
नेह सुधा सरसाने वाली,
तुम घन चपला हो सावन की।
संगी-साथी साथी इस जीवन की।।
 
तुम शीतल बयार मतवाली,
पतझड़ में भी हो हरियाली,
जंगल चमन बनाया तुमने,
तुम आभा-शोभा उपवन की।
संगी-साथी साथी इस जीवन की।।
 
तुम हो प्यारे मीत हमारे,
तुम पर गीत रचे हैं सारे,
नाती-पोतों की किलकारी,
याद दिलाती है बचपन की।
संगी-साथी साथी इस जीवन की।।
 
युग बीता चालिस सालों का,
अब चाँदी सा रँग बालों का,
प्रणयदिवस के महापर्व पर,
यादें वाबस्ता यौवन की।
संगी-साथी साथी इस जीवन की।।
 
अमर भारती नाम तुम्हारा,
रूपतुम्हारा लगता है प्यारा,
मेरा मन मतवाला पंछी,
लेकिन तुम हो भोले मन की।
संगी-साथी साथी हो जीवन की।।

गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

गीत "हार गये हैं ज्ञानी-ध्यानी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कुहरा करता है मनमानी।
जाड़े पर आ गयी जवानी।।
--
नभ में धुआँ-धुआँ सा छाया,
शीतलता ने असर दिखाया,
काँप रही है थर-थर काया,
हीटर-गीजर शुरू हो गये,
नहीं सुहाता ठण्डा पानी।
जाड़े पर आ गयी जवानी।।
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बालक विद्यालय ना जाते,
कोरोना से सब घबराते,
 मोबाइल से मन बहलाते,
रोग भयंकर फैला जग में,
हार गये हैं ज्ञानी-ध्यानी।
जाड़े पर आ गयी जवानी।
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कहता पापी पेट हमारा,
बिना कमाए नही गुजारा,
काम बिना नहीं कोई चारा,
श्रम करने से जी न चुराओ,
ऋतुएँ तो हैं आनी जानी।
जाड़े पर आ गयी जवानी।।
--
चूल्हे और अलाव जलाओ,
गर्म-गर्म भोजन को खाओ,
काम समय पर सब निबटाओ,
खाना-सोना और कमाना,
जीवन की है यही कहानी।
जाड़े पर आ गयी जवानी।।
--

बुधवार, 2 दिसंबर 2020

गीत "खार पर निखार है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

शराब का चलन बढ़ा, खुमार ही खुमार है।
बेवजह गुरूर का, चढ़ा हुआ बुखार है।।
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मुश्किलों में हों भले, फिर धुन में मस्त है,
ताप के प्रकोप से, लोग रोग ग्रस्त हैं,
आन-बान, शान-दान, स्वार्थ में शुमार है।
बेवजह गुरूर का, चढ़ा हुआ बुखार है।।
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हो गये उलट-पलट, वायदे समाज के,
दीमकों ने चाट लिए, कायदे रिवाज़ के,
प्रीत के विमान पर, सम्पदा सवार है।
बेवजह गुरूर का, चढ़ा हुआ बुखार है।।
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वायदों पे आज, लोकतन्त्र है लदा हुआ,
षटपदों के गान पर, फूल हर फिदा हुआ,
गुल गुलाम बन गये, खार पर निखार है।
बेवजह गुरूर का, चढ़ा हुआ बुखार है।।
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झूठ के प्रभाव से, सत्य है डरा हुआ,
बेबसी की मार से, आदमी मरा हुआ,
राक्षश प्रसन्न है, देव बेकरार है।
बेवजह गुरूर का, चढ़ा हुआ बुखार है।।

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मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

दोहे "जातिवाद में बँट गये, महावीर हनुमान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पुरखों का इससे अधिक, होगा क्या अपमान।
जातिवाद में बँट गये, महावीर हनुमान।।
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राजनीति के बन गये, दोनों आज गुलाम।
जनता को लड़वा रहे, पण्डित और इमाम।।
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भजन-योग-प्रवचन गये, अब योगी जी भूल।
लगे फाँकने रात-दिन, राजनीति की धूल।।
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रास नहीं आता जिन्हें, योगासन का कार्य।
व्यापारी से बन गये, अब तो योगाचार्य।।
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दल के दल-दल में धँसे, महापुरुष श्री राम।
रावण मौज मना रहे, राम हुए बदनाम।।
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गंगा मइया के लिए, झूठे सब ऐलान।
अनशन करके दे रहे, सन्त स्वयं की जान।।
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आँख मूँदकर है पड़ी, गफलत में सरकार।
अरबों-खरबों की रकम, नेता गये डकार।।
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सोमवार, 30 नवंबर 2020

गीत "रो रहा समृद्धशाली व्याकरण" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सभ्यताशालीनता के गाँव में,
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
कर्णधारों की कुटिलता देखकर,
देश का दूषित हुआ वातावरण।
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सुर हुए गायबमृदुल शुभगान में,
गन्ध है अपमान कीसम्मान में,
आब खोता जा रहा अन्तःकरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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शब्द अपनी प्राञ्जलता खो रहा,
ह्रास अपनी वर्तनी का  हो रहा,
रो रहा समृद्धशाली व्याकरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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लग रहे घट हैं भरेपर रिक्त हैं,
लूटने में राज कोसब लिप्त हैं,
पंक से मैला हुआ है आवरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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रविवार, 29 नवंबर 2020

दोहे "देव दिवाली पर्व" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दीपों का त्यौहार है, देव दिवाली पर्व।

परम्परा पर देश की, हम सबको है गर्व।।

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गुरु नानक का जन्मदिन, देता है सन्देश।
जीवन में धारण करो, सन्तों के उपदेश।।
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गुरू पूर्णिमा पर्व पर, खुद को करो पवित्र।
मेले में जाना नहीं, घर में रहना मित्र।।
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कोरोना के काल में, मन हो रहा उचाट।
सरिताओं के आज हैं, सूने-सूने घाट।।
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गंगा के तट पर नहीं, आज लगाना भीड़।
नहीं बनाना घाट पर, पटकुटियों के नीड़।।
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कहता है इस साल तो, हर-हर का हरद्वार।
मैली मत करना कभी, गंगा जी की धार।।
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गंगा जी के नाम से, भारत की पहचान।
करती तीनों लोक में, गंगा मोक्ष प्रदान।।

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