घूमते शब्द कानन में उन्मुक्त से, जान पाये नहीं प्रीत का व्याकरण। बस दिशाहीन सी चल रही लेखिनी, कण्टकाकीर्ण पथ नापते हैं चरण।। -- ताल बनती नहीं, राग कैसे सजे, बेसुरे हो गये साज-संगीत हैं। ढाई-आखर बिना है अधूरी ग़ज़ल, प्यार के बिन अधूरे प्रणयगीत हैं। नेह के स्रोत सूखे हुए हैं सभी, खो गये हैं सभी आजकल आचरण। कण्टकाकीर्ण पथ नापते हैं चरण।। -- सूदखोरों की आबाद हैं बस्तियाँ, आज गिरवीं पड़ा है तिजोरी में दिल। बिक रहा बोतलों में जहाँ पेयजल, आचमन के लिए है कहाँ अब सलिल। खोखले छन्द बोलेंगे कैसे व्यथा, स्वार्थ के वास्ते आज पोषण-भरण। कण्टकाकीर्ण पथ नापते हैं चरण।। -- चारणों के नगर में, सुख़नवर कहाँ, जिन्दग़ी चल रही भेड़ की चाल से। कौन तूती के सुर को सुनेगा यहाँ, मढ़ रहे ढपलियाँ, बाल की खाल से। लाज कैसे बचे द्रोपदी की यहाँ, कंस ओढ़े हुए हैं कृष्ण का आवरण, कण्टकाकीर्ण पथ नापते हैं चरण।। -- |
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गुरुवार, 7 जनवरी 2021
गीत "प्यार के बिन अधूरे प्रणयगीत हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 6 जनवरी 2021
प्रीत का व्याकरण-गीत "तुम्हारे हाथों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।। -- लहराती-बलखाती, पेंग बढ़ाती है, नीलगगन में ऊँची उड़ती जाती है, होती भावविभोर तुम्हारे हाथों में। कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।। -- वसुन्धरा की प्यास बुझाती है गंगा, पावन गंगाजल करता तन-मन चंगा, सरगम का मृदु शोर तुम्हारे हाथों में।। कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।। -- उपवन में कलिकाएँ जब मुस्काती हैं, भ्रमर और तितली को महक सुहाती है, जीवन की है भोर तुम्हारे हाथों में। कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।। -- प्रणय-प्रेम के बिना अधूरी पावस है, बिन “मयंक” के छायी घोर अमावस है, चन्दा और चकोर तुम्हारे हाथों में। कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।। -- |
मंगलवार, 5 जनवरी 2021
भूमिका "प्रीत का व्याकरण" (डॉ. महेन्द्र प्रताप पाण्डेय 'नन्द')
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सोमवार, 4 जनवरी 2021
सरस्वती वन्दना "रचनाएँ रचवाती हो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रोज-रोज सपनों में आकर, |
रविवार, 3 जनवरी 2021
दोहे "मौसम करे बवाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
अन्धकार ऐसा हुआ, जैसे श्यामल रात।। अकस्मात सरदी बढ़ी, मौसम करे बवाल। पर्वत के भूभाग में, जीना हुआ मुहाल।। पर्वत पर दिनभर हुआ, खूब आज हिमपात। किट-किट बजते दाँत हैं, ठिठुर रहा है गात।। मैदानी भू-भाग पर, सर्दी में बरसात। तेज हवाएँ बाँटती, जाड़े की सौगात।। सूरज नभ में है नहीं, खिली नहीं है धूप। कम्बल चादर ओढ़कर, लोग पी रहे सूप।। धूल-धुन्ध सब धुल गयी, निर्मल है परिवेश। सारे जग से अलग है, अपना भारत देश।। दूध नहीं अच्छा लगे, अच्छी लगती चाय। जाड़ा अब लिखने लगा, नये-नये अध्याय।। |
शनिवार, 2 जनवरी 2021
दोहे "कुहरे की सौगात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
नभ पर छायी है
घटा, ठिठुर रहा है
गात। |
शुक्रवार, 1 जनवरी 2021
"सबको मुबारक नया वर्ष हो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
--1--देश-दुनिया में पसरा हुआ हर्ष हो,देशभक्ति के ज़ज़्बे का
उत्कर्ष हो।धानी धरती हमेशा रहे उर्वरा,
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आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल। श्वेत -श्याम से नजर आ रहे मेघों के दल। कही छाँव है कहीं घूप है, इन्द्रधनुष कितना अनूप है, मनभावन ...
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