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रविवार, 6 जून 2010

“व्यञ्जनावली-चवर्ग” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)




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"च"

Spoon
"च" से चन्दा-चम्मच-चमचम!
चरखा सूत कातता हरदम!
सरदी, गरमी और वर्षा का,
बदल-बदल कर आता मौसम!!

"छ"

"छ" से छतरी सदा लगाओ!
छत पर मत तुम पतंग उड़ाओ!
छम-छम बारिश जब आती हो,
झट इसके नीचे छिप जाओ!!

"ज"
ship

"ज" से जड़ और लिखो जहाज!
सागर पार करो तुम आज!
पानी पर सरपट चलता जो,
उस जहाज पर हमको नाज!!

"झ"
flag

"झ" से झण्डा लगता प्यारा!
झण्डा ऊँचा रहे हमारा!
नही झुका है नही झुकेगा,
हम सबके नयनों का तारा!!

"ञ"
yan copy
"ञ" को अगर बोलना हो तो!
नाक बन्द कर “ज” बोलो तो!
"ञ" की ध्वनि सुनाई देगी,
थोड़ा सा मुँह को खोलो तो!!

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर भाव लिए कविता |एक सुंदर रचना पड़ने को मिली |

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  2. व्यंजनों का सुन्दर प्रयोग ...!!

    जवाब देंहटाएं
  3. आईये जानें .... मन क्या है!

    आचार्य जी

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह जी, यह तो बहुत बढ़िया रहा.

    जवाब देंहटाएं
  5. कमाल कर दिया आदरणीय.........

    जय हो !

    जवाब देंहटाएं
  6. Bhai,
    Is tarah ki rachnayeen likhna sabke bas kii baat nahin.sachmuch ye rachnayen aapke vyktitv kavitv ki parichayak hain. sarahneey.Dil se badhai!

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति....कल से ही सोच रही थी कि च वर्ग को आप कैसे प्रस्तुत करेंगे....लाजवाब प्रस्तुति है..

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत सुंदर चल रही है यह अक्षरो की कडी धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  9. timeline on fashion history http://clothingtrends.eu/diesel-long-sleeve-jacket-for-men-white-item3482.html fashion tv castings 2188715

    जवाब देंहटाएं

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