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बुधवार, 7 सितंबर 2016

गीत "बहती जल की धार निरन्तर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उत्तर से दक्षिण को, भू पर।
बहती जल की धार निरन्तर।।

संसर्गों में जो भी आता,
तन-मन से पावन हो जाता,
अवगुण हो जाते छूमन्तर।
बहती जल की धार निरन्तर।।

सुनकर कलकल-छलछल के सुर,
आनन्दित हो जाता है उर,
निर्मल हो जाता है अन्तर।
बहती जल की धार निरन्तर।।

कुदरत का है साज अनोखा,
इसमें नही बनावट-धोखा,
चलता जाता चक्र निरन्तर।
बहती जल की धार निरन्तर।।

3 टिप्‍पणियां:

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