-- जो मानवता के लिए, चढ़ता गया सलीब। वो ही होता कौम का, सबसे बड़ा हबीब।। -- जिसमें होती वीरता, वही भेदता व्यूह। चलता उसके साथ ही, जग में विज्ञ समूह।। -- मंजिल हो जिस राह में, उस पर चलते लोग। पालन करता नियम जो, वो ही रहे निरोग।। -- जो जन सेवा के लिए, करता है पुरुषार्थ। उसके सारे काम ही, कहलाते परमार्थ।। -- थोथी बातों से नहीं, कोई बने मसीह। लालच में जपता सदा, ढोंगी ही तस्बीह।। -- जिसके दिल में हों भरे, ममता-समता-प्यार। वो जनता के हृदय पर, कर लेता अघिकार।। -- दीन-दुखी-असहाय को, बाँटो कुछ उपहार। शिक्षा देता है यही, क्रिसमस का त्यौहार।। -- |
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बुधवार, 25 दिसंबर 2024
दोहे "क्रिसमस का त्यौहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सोमवार, 16 दिसंबर 2024
प्रकाशन "साहित्यसुधा पाक्षिक पत्रिका में मेरा गीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
नेक-नीयत हमेशा सलामत रहे डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' -- मीत बेशक बनाओ बहुत से मगर, मित्रता में शराफत की आदत रहे। स्वार्थ आये नहीं रास्ते में कहीं, नेक-नीयत हमेशा सलामत रहे।। -- भारती का चमन आप सिंचित करो, भाव मौलिक भरो, शब्द
चुनकर धरो, काल को जीत लो अपने ऐमाल से, गीत में सुर की धारा सलामत रहे। नेक-नीयत हमेशा सलामत रहे।। -- आपकी बात से, ज्ञान
गंगा बहे, मन में उल्लास हो, गात चंगा
रहे, बन्दगी में दिखावा कभी मत करो, आशिकी में भी शुचिता सलामत रहे। नेक-नीयत हमेशा सलामत रहे।। -- मत घमण्डी बनो, बैर को
छोड़ दो, जिन्दगी सादगी की, तरफ मोड़
दो, ढाई आखर का है बस यही फलसफा, आदमीयत का ज़ज़्बा सलामत रहे।। नेक-नीयत हमेशा सलामत रहे।। -- दिलरुबा नेह का धर्म तो जान लो, आप अच्छा-बुरा कर्म तो जान लो, ‘रूप’ दरिया
नहीं एक तालाब है, साथ सूरत के सीरत सलामत रहे। नेक-नीयत हमेशा सलामत रहे।। -- |
रविवार, 8 दिसंबर 2024
दोहे "काल का वार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कुदरत के कानून पर, नहीं
किसी का जोर। मिलता सबको न्याय है, साधू
हों या चोर।1। घूस वहाँ चलती नहीं, चलता नहीं जुगाड़। कर्मों के अनुसार ही, खुलते
वहाँ किवाड़।2। -- धर्मशास्त्र को खोलकर, करते
लोग प्रयास। स्वर्ग-नर्क की कुंजियाँ, चित्रगुप्त
के पास।3। -- कल तक भी अज्ञान थे, अब भी
हैं अज्ञान। समझ न पाये आजतक, जीवन का विज्ञान।4। -- कोई आवागमन की, बदल न पाया रीत। ज्ञानी-सन्त सुना रहे, अपने
मन के गीत।5। -- अपने झूठे ज्ञान पर, मत करता अभिमान। ईश्वर से बढ़कर नहीं, कोई
भी विद्वान।6। -- दाता के है हाथ में, सकल जगत की डोर। हरदम उसकी रजा में, रहना भाव-विभोर।7। -- कंचन काया को कभी, माया से मत तोल। दौलत के अभिमान में, बुरे वचन मत बोल।8। -- झेल नहीं पाया मनुज, कभी काल का वार। ज्ञानी राजा-रंक भी, गये काल से हार।9। -- |
गुरुवार, 5 दिसंबर 2024
दोहे "धीरे-धीरे कट गये, ये इक्यावन साल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
जीवन के संग्राम में, किया बहुत संघर्ष। वैवाहिक जीवन हुआ, अब इक्यावन वर्ष।1। सजनी घर के काम में, बँटा रही है हाथ। चैन-अमन से कट रहा, जीवन उसके साथ।2। धीरे-धीरे कट गये, ये इक्यावन साल। ताल-मेल के साथ में, जीवन है खुशहाल।3। उबड़-खाबड़ राह से, कभी न मानी हार। मजबूती से नाव की, थामी है पतवार।4। होते रहते हैं कभी, आपस में मतभेद। हम दोनों नहीं, रखते हैं मनभेद।5। धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल। जीवन के हल हो गये, सारे कठिन सवाल।6। जीवन कटता जा रहा, ताल-मेल के साथ। सुख-दुख दोनों में रहे, मिले हमारे हाथ।7। विनती करता हूँ यही, कृपा करो हे राम। आगे भी चलता रहे, ऐसे ही सब काम।8। |



