गुलदस्ता जैसा लगे, ब्लॉगिंग का संसार। टिप्पणियों से पोस्ट का, बढ़ जाता शृंगार।१। जल्दी-जल्दी बाँट दे, निज गठरी का ज्ञान। नहीं साथ में जाएगा, कंचन विमल-वितान।२। ज्वाला ठण्डी पड़ गई, राख हुए अंगार। साजन के ही साथ में, गये सभी सिंगार।३। पात पीत जब हो गये, हरे-भरे नहीं होय। इस असार संसार में, अमर हुआ नहीं कोय।४। जीत न पाये काल को, क्या ज्ञानी क्या सन्त। ग्रास मौत का बन गये, वैज्ञानिक-गुणवन्त।५। |
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बुधवार, 7 दिसंबर 2011
"कंचन विमल-वितान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मंगलवार, 6 दिसंबर 2011
"रोज हाट से लौकी लाओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
लौकी होती गुणकारी है। बीमारी इससे हारी है।। रोज हाट से लौकी लाओ। छीलो-काटो और पकाओ।। सब्ज़ी या रायता बनाओ। रोटी-पूड़ी के संग खाओ।। चाहे इसका जूस निकालो। थोड़ा काला नमक मिलालो।। रोज सवेरे यह रस पी लो। आनन्दित हो जीवन जी लो।। यह रसायन हितकारी है। इसीलिए लौकी प्यारी है।। |
सोमवार, 5 दिसंबर 2011
"हमारी 38वीं वैवाहिक वर्षगाँठ पर " डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
साथी साथ निभाते रहना। मेरे मन के उपवन में तुम, सुन्दर सुमन खिलाते रहना।। ![]() दुख आया या सुख मुस्काया, साथ-साथ सब हमने झेले, गाड़ी के दो पहिए बनकर, पार किये हैं सभी झमेले, मेरी सरगम में आगे भी, तुम आवाज़ मिलाते रहना। मेरे मन के उपवन में तुम, सुन्दर सुमन खिलाते रहना।। मेरे माता और पिता जी, धन्य हुए बेटी को पाकर, सगी बेटियाँ भूल गये हैं, तुमसे पाकर इतना आदर, बेटे, पोते-पोती पर भी, स्नेह सुधा बरसाते रहना। मेरे मन के उपवन में तुम, सुन्दर सुमन खिलाते रहना।। रोटी-दूध उन्हें भी मिलता, जो बिन झोली के बेचारे, चौकीदारी करते रहते, टॉम-फिरंगी प्यारे-प्यारे, अपनी मोहक मुस्कानों से, सबका मन बहलाते रहना। मेरे मन के उपवन में तुम, सुन्दर सुमन खिलाते रहना।। सफर हुआ अड़तिस वर्षों का, घर मेरा बन गया हबेली, लेकिन तुम लगती हो मझको, अब भी बिल्कुल नई-नवेली, स्वप्निल आँखो के कोनों में, सुख-सपने दिखलाते रहना। मेरे मन के उपवन में तुम, सुन्दर सुमन खिलाते रहना।। |
रविवार, 4 दिसंबर 2011
"चंचल मन की हाथ में, रखना खींच लगाम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
♥ आज भी देखिए कुछ दोहे ♥ ![]() जीवन के दो चक्र है, सुख-दुख जिनके नाम। दोनों ही हालात में, धीरज से लो काम।। चंचल मन की हाथ में, रखना खींच लगाम। इसके हाथों तुम कभी, बनना नहीं गुलाम।। जिसने मन पर कर लिया, स्वामी बन अधिकार। मानवता का मिल गया, उसको ही उपहार।। सरल सुभाव अगर नहीं, धर्म-कर्म सब व्यर्थ। छल और कपट मनुष्य का, करता सदा अनर्थ।। जीवन प्रहसन के सभी, इस दुनिया में पात्र। सबका जीवन है यहाँ, चार दिनों का मात्र।। |
शनिवार, 3 दिसंबर 2011
‘‘सब जगह राम है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
रम रहा सब जगह राम है। ये धरा राम का धाम है।। सच्चा-सच्चा लगे, सबसे अच्छा लगे, कितना प्यारा प्रभू नाम है। ये धरा राम का धाम है।। नाम जप लो अभी, राम भज लो सभी, लगता कोई नहीं दाम है। ये धरा राम का धाम है।। वो खुदा-ईश्वर, सबको देता है वर, वो ही रहमान है श्याम है। ये धरा राम का धाम है।। वो अजर है अमर, सब जगह उसका घर, सबके करता सफल काम है। ये धरा राम का धाम है।। |
शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011
"क्यों हाथों को छोड़ा?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मित्रों! आज शुक्रवार के चर्चा मंच पर कुछ तुकबन्दी बन गई है! यह चित्र प्रस्तुत है! देखो सरपट दौड़ रहा है, दो पैरों का घोड़ा। घोटक राजा कुछ तो बोलो, क्यों हाथों को छोड़ा?। इन्सानों की बस्ती में, सब वक्र चाल चलते हैं। इनकी घुड़सालों में कितने, घोड़े-गर्दभ पलते हैं।। चारा खाते हुए तुम्हारी, अकल गई क्यों मारी? अपनी जात बदलकर, तुमने भूल करी है भारी।। दो पग वालों के मन में, छल-कपट समाये रहते हैं। जो इनके दिल में होता है, कभी न उसको कहते हैं।। एक बार अपने निर्णय पर, सोच-विचार अवश्य करो। उसके बाद मनुजता की, देहली पर अपने कदम धरो।। चाल तुम्हारी मस्तानी, ये सहन नहीं कर पायेंगे। घोटालों के भार-बोझ, तुम पर ही लादे जायेंगे।। |
गुरुवार, 1 दिसंबर 2011
"निज मन के उद्गार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
सुन्दर दोहे कह रहे, टिप्पणियों में मित्र।
अनुशंसा की रीत भी, होती बहुत विचित्र।१।
जो देखा वो लिख दिया, नहीं नव्य-सन्देश।
अज्ञानी कैसे करे, ज्ञानी को उपदेश।२।
जिनकी झोली में भरा, रत्नों का अम्बार।
किन्तु आज वो देखते, औरों का भण्डार।३।
अंकित पृष्ठों में करो, निज मन के उद्गार।
संचित कर रख लीजिए, ये अनुपम उपहार।४।
वन्दन माता का करो, पा जाओगे ज्ञान।
खुश होकर देंगी वही, प्रज्ञा का शुभदान।५।
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