![]() चमका तारा उसी का, जो करता है काज। कर्मशील इन्सान के, सिर पर सजता ताज।। अपने प्यारे देश का, आओ रक्खें मान। जगद्गुरू बनकर पुनः, दुनिया को दें ज्ञान।। प्रतिभाओं का देश में, यदि होगा सम्मान। फिर जाएँ परदेश क्यों, भारत के विद्वान।। चन्द्रगुप्त शासक बनें, मन्त्री हो चाणक्य। नवरत्नों के साथ में, चमकेंगे माणिक्य।। हो गद्दारों के लिए, फाँसी का कानून। आयेगा तब देश में, सच्चा चैन-सुकून।। |
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गुरुवार, 17 नवंबर 2011
"दोहे-दुनिया को दें ज्ञान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
बुधवार, 16 नवंबर 2011
"ज़िन्दगी खूब खिलखिलाती है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
जब भी पुरवा बयार आती है ज़िन्दगी खूब खिलखिलाती है जब भी बादल फलक घिरते हैं याद प्रीतम की तब सताती है जब भी भँवरे गुहार करते हैं तब कली ग़ुल सा मुस्कराती है सर्दियाँ शीत जब उगलतीं हैं चाँदनी भी कहर सा ढाती है ज़िन्दगीभर सफर में रहना है मंज़िलें हाथ नहीं आती है “रूप” रहता नहीं सलामत है धूप यौवन की ढलती जाती है |
मंगलवार, 15 नवंबर 2011
‘‘जिन्दगी की है बहार-श्रीमती आशा शैली’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
गीत, खुशबू और थोड़ी सी फुहार बस यही तो जिन्दगी की है बहार आम्र तरु-फुनगी की ललछौंही छटा घिर के छम-छम बरसती नभ से घटा हरित-गर्भा यह धरा होने लगे तब समझना सृष्टि हित कुछ सुख बँटा फिर से जब आने लगे रुत पर निखार बस यही तो जिन्दगी की है बहार खेतिहर ने हल उठाया हरष कर दे चले आशीष बादल बरस कर हुमक-कर बहने नदी-नाले लगे उतर आया स्वर्ग इस पल धरा पर पक्षियों की खेत में उतरे कतार बस यही तो जिन्दगी की है बहार घन-गगन पर्वत से जब मिलने लगे बाग सारा मोद में खिलने लगे मन्द चलती पवन भी इठला उठे और उदासी की शिला हिलने लगे बाग में जाने का मन हो बार-बार |
" बाल मेला और विमोचन के दृश्य" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
रविवार, 13 नवंबर 2011
"आज बन गये सब व्यापारी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
आपाधापी की दुनिया में, मतलब की सब दुनियादारी। दुनियादारी के मेले में, आज बन गये सब व्यापारी।। बिना काम के कोई किसी को, बिल्कुल याद नहीं करता है, अमृत पाने के लालच में , सागर का पानी भरता है, स्वार्थ पड़ा है सब पर भारी। दुनियादारी के मेले में, आज बन गये सब व्यापारी।। मानवता के इस दंगल में, केवल दाँव-पेंच चलते हैं, धनवानों की घुड़सालों में, बलशाली घोड़े पलते हैं, पश्चिम की असभ्य आँधी से, पूरब की पुरवा है हारी। दुनियादारी के मेले में, आज बन गये सब व्यापारी।। सजे-धजे परिधान छोड़कर, अंगों का हो रहा प्रदर्शन, सोच हुई है कितनी बौनी, घटा “रूप” का सब आकर्षण, भूल गये हैं शब्द लाज का, फैशन की पनपी बीमारी। दुनियादारी के मेले में, आज बन गये सब व्यापारी।। |
शनिवार, 12 नवंबर 2011
"बालदिवस के अवसर पर- दोनों पुस्तकों का विमोचन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
शुक्रवार, 11 नवंबर 2011
"मेला गंगास्नान-झनकइया-खटीमा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


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