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निर्दोष से प्रसून भी, डरे हुए हैं आज। चिड़ियों की कारागार में, पड़े हुए हैं बाज। -- अश्लीलता के गान, नौजवान गा रहा, फटी हुई पतलून से, जग को रिझा रहा, भौंडे सुरों के शोर में, सब दब गये हैं साज। चिड़ियों की कारागार में, पड़े हुए हैं बाज।। -- श्वान और विडाल जैसा, मेल हो रहा, नग्नता, निलज्जता का, खेल हो रहा, चैनल समाज की जहाँ हों, लूट रहे लाज। चिड़ियों की कारागार में, पड़े हुए हैं बाज।। -- भटकी हुई जवानी है, भारत के लाल की, ऐसी है दुर्दशा, मेरे भारत-विशाल की, आजाद और सुभाष के, सपनों पे गिरी गाज। चिड़ियों की कारागार में, पड़े हुए हैं बाज।। -- लिखने को बहुत कुछ है अगर लिखने को आयें, लिखकर कठोर सत्य, यहाँ किसको सुनायें, जंगल में लोमड़ी के यहाँ, सिर पे धरा है ताज। चिड़ियों की कारागार में, पड़े हुये हैं बाज।। -- रोती पवित्र भूमि, आसमान रो रहा, लगता है घोड़े बेच के, भगवान सो रहा, अब तक तो मात्र कोढ़ था, अब हो गयी है खाज। चिड़ियों की कारागार में, पड़े हुए हैं बाज।। -- |
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मंगलवार, 22 सितंबर 2020
गीत "सपनों पे गिरी गाज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सोमवार, 21 सितंबर 2020
बालकविता "काँधे पर हल धरे किसान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
-- सूरज चमका नील-गगन में। काँधे पर हल धरे किसान। करता खेतों को प्रस्थान।। मेहनत से अनाज उपजाता। -- |
रविवार, 20 सितंबर 2020
गीत "दीन-ईमान के चोंचले मत करो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- दूरिया कम करो फासले मत करो। -- |
शनिवार, 19 सितंबर 2020
गीतिका "मन्द समीर बहाते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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-- धरा सुसज्जित होती जिनसे, वो ही वृक्ष कहाते हैं, जो गौरव और मान बढ़ाते, वो ही दक्ष कहाते हैं। -- हरित क्रान्ति के संवाहक, ये जन,गण के
रखवाले, प्राण प्रवाहित करने वाली, मन्द समीर बहाते हैं। -- पत्ते, फूल, मूल, फल जिनके, जीवन देने वाले हैं, देते हैं ये अन्न और अमृत सा जल बरसाते हैं। -- उपवन, आँगन, खेत, बाग में हमको पेड़ लगाने हैं, इनकी शीतल छाया में ही जीव-जन्तु सुख पाते हैं। धरती का तो 'रूप' अमर है पेड़ों की हरियाली से, कदम-कदम पर ये जीवन में काम हमारे आते हैं। |
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शुक्रवार, 18 सितंबर 2020
गीत "खेतों में झुकी हैं डालियाँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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-- धान्य से भरपूर, खेतों में झुकी हैं
डालियाँ। धान के बिरुओं ने, पहनी हैं नवेली बालियाँ।। क्वार का आया महीना, हो गया निर्मल गगन, ताप सूरज का घटा, बहने लगी शीतल पवन, देवपूजन के लिए, सजने लगी हैं थालियाँ। धान के बिरुओं ने, पहनी हैं नवेली बालियाँ।। थम गई बरसात, अब मौसम सुहाना आ गया,
षटपदों को रूप, उपवन का सलोना भा
गया, हो गयी हैं अब नगर
की साफ-सुथरी नालियाँ। धान के बिरुओं ने, पहनी हैं नवेली बालियाँ।। सुमन-कलियों की चमन
में, डोलियाँ सजने लगीं, भ्रमर गुंजन कर रहे, शहनाइयाँ बजने लगीं, प्रणय-मण्डप में
मधुर, बजने लगीं हैं
तालियाँ। धान के बिरुओं ने, पहनी हैं नवेली बालियाँ।। -- |
गुरुवार, 17 सितंबर 2020
दोहे "हमारे प्रधानमन्त्री मोदी जी का जन्मदिन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- गाँधी और पटेल ने, जहाँ लिया अवतार। मोदी का गुजरात ने, दिया हमें उपहार।। -- देवताओं से कम नहीं, होता है देवेन्द्र। सौ सालों के बाद में, पैदा हुआ नरेन्द्र।। -- साधारण परिवार का, किया चमन गुलजार। मोह छोड़ संसार का, त्याग दिया घर-बार।। -- युगों-युगों के बाद में, लेते जन्म सपूत। दयानन्द की धरा के, मोदी स्वयं सुबूत।। -- समझौता जिसको नहीं, बैरी से स्वीकार। उस मोदी के हाथ में, भारत की पतवार।। -- दामोदर नर इन्द्र से, ऊँचा माँ का भाल। अभिनन्दन जग कर रहा, ले पूजा का थाल।। -- जन्म-दिवस पर आपको, नमन हजारों बार। दीर्घ आयु की कामना, करता दोहाकार।। -- |
बुधवार, 16 सितंबर 2020
पाँच मुक्तक "चाँदनी रात बहुत दूर गई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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आज मेरे छोटे से शहर में एक बड़े नेता जी पधार रहे हैं। उनके चमचे जोर-शोर से प्रचार करने में जुटे हैं। रिक्शों व जीपों में लाउडस्पीकरों से उद्घ...
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आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल। श्वेत -श्याम से नजर आ रहे मेघों के दल। कही छाँव है कहीं घूप है, इन्द्रधनुष कितना अनूप है, मनभावन ...
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