-- पढ़े-लिखे करते नहीं, पुस्तक से सम्वाद। इसीलिए पुस्तक-दिवस, नहीं किसी को याद।। -- पुस्तक उपयोगी नहीं, बस्ते का है भार। बच्चों को कैसे भला, होगा इनसे प्यार।। -- अभिरुचियाँ समझे बिना, पौध रहे हैं रोप। नन्हे मन पर शान से, देते कुण्ठा थोप।। -- बालक की रुचियाँ समझ, देते नहीं सुझाव। बेमतलब की पुस्तकें, भर देंगी उलझाव।। -- पाठक-पुस्तक में हमें, करना होगा न्याय। पुस्तक-दिन के सार्थक, होंगे तभी उपाय।। -- अब कोई करता नहीं, पुस्तक से सम्वाद। इसीलिए पुस्तक-दिवस, नहीं किसी को याद।। -- हैं पुस्तक के नाम पर, बस्ते का ही भार। बच्चों को कैसे भला, पुस्तक से हो प्यार।। -- राजनीति में हो गये, पढ़े-लिखे मगरूर। हितकारी शिक्षा हुई, भारत में मजबूर।। -- |
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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रविवार, 23 अप्रैल 2023
दोहे "विश्व पुस्तक-दिन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
दोहे "अच्छे हों उपमान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- कविता क्या है? कविता साहित्य की वह विधा है, जिसमें मनोभावों को गेयता और कलात्मक रूप में किसी भाषा के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है। अर्थात् कविता का शाब्दिक अर्थ है – काव्यात्मक रचना या कवि की कृति जो छन्दों की श्रंखलाओं में विधिधिवत बाँधी गयी हो। -- शब्दकोश-श्रम से बने, कविता का संयोग। फोकट में सब चाहते, पाना मोहनभोग।। -- जिनको छन्दविधान की, कुछ भी नहीं तमीज। वो भी अब लिखने लगे, कविता जैसी चीज।। -- कारण हैं वो कौन से, हों जिनसे अनुरक्त। बिना साधना के नहीं, होता कोई भक्त।। -- दोष भाग्य को दे रहे, बिना किये तदवीर। मरुथल में मिलता नहीं, दूर-दूर तक नीर।। -- सीधी-सच्ची बात को, कहने में क्या शर्म। गद्य-पद्य का भेद का, समझ लीजिए मर्म।। -- जिसमें होती गेयता, वो कहलाते गीत। सुर-लय के ही साथ है, साज और संगीत।। -- कविता रचने के लिए, रखना होगा ध्यान। उपमाओं के साथ में, अच्छे हों उपमान।। -- |
शनिवार, 22 अप्रैल 2023
दोहे "कंकरीट का जाल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- एक साल में एक दिन, धरती का त्यौहार। कैसे धरती दिवस का, सपना हो साकार।१। -- कंकरीट जबसे बना, जीवन का आधार। धरती की तब से हुई, बड़ी करारी हार।२। -- पेड़ कट गये भूमि के, बंजर हुई जमीन। प्राणवायु घटने लगी, छाया हुई विलीन।३। -- नैसर्गिक अनुभाव का, होने लगा अभाव। दुनिया में होने लगे, मौसस में बदलाव।४। -- शस्य-श्यामला भूमि को, किया प्रदूषित आज। कुदरत से खिलवाड़ अब, करने लगा समाज।५। -- नकली सुमनों में नहीं, होता है मकरन्द। कृत्रिमता में खोजता, मनुज आज आनन्द।६। -- जहर बेचकर लोग अब, लगे बढ़ाने कोष। औरों के सिर मढ़ रहे, अपने सारे दोष।७। -- ओछे कर्मों से हुए, हम कितने मजबूर। आज मजे से दूर हैं, कृषक और मजदूर।८। -- जबसे जंगल में बिछा, कंकरीट का जाल। धरती पर आने लगे, चक्रवात-भूचाल।९। -- अब तो मुझे बचाइए, धरती कहे पुकार। पेड़ लगाकर कीजिए, धरती का शृंगार।१०। -- |
शुक्रवार, 21 अप्रैल 2023
ग़ज़ल "बनारस में गंगा तो उलटी बही है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- ये भी सही और वो भी सही है हारे का हथियार तो बस यही है। -- लबों ने सहारा लिया है कहन में कहावत के जरिये सभी कुछ कही है -- चलें शेर-शायर अलग राह अपनी बनारस में गंगा तो उलटी बही है -- वही बन गया आदमी दोजहाँ में हिदायत बुजुर्गों की जिसने सही है -- जो लिक्खा नहीं मायने क्या है उसके बताता जमा-खर्च खाता-बही है -- हकीकत से मत अपना दामन बचाना न जमती फटे दूध से तो दही है -- कमजोर बुनियाद पर जो बनी है झटकों से वो ही इमारत ढही है -- नहीं ‘रूप’ से जंग लड़ना है मुमकिन अदाओं की अपनी रवायत रही है -- |
गुरुवार, 20 अप्रैल 2023
बालगीत "मन को बहुत लुभाते आम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- एक साल में आते आम। सबके मन को भाते आम।। -- जब वर्षा से आँगन भरता, स्वाद बदलने को जी करता, तब पेड़ों पर आते आम। सबके मन को भाते आम।। -- चटनी और अचार बनाओ, पक जाने पर काटो-खाओ, आम सभी के होते आम। सबके मन को भाते आम।। -- कच्चा सबसे खट्टा होता, पक जाने पर मीठा होता, लंगड़ा वो कहलाते आम। सबके मन को भाते आम।। -- बम्बइया की शान निराली, खुशबू होती है मतवाली, अपनी ओर लुभाते आम। सबके मन को भाते आम।। -- |
बुधवार, 19 अप्रैल 2023
ग़ज़ल "पाषाणों को गढ़ने में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
जाने कैसे भूल हो गई, अन्तर्मन को पढ़ने में। कल्पनाएँ निर्मूल हो गईं, पाषाणों को गढ़ने में। -- हार नहीं मानी मैंने, संघर्षों के तूफानों से, राहें ही प्रतिकूल हो गईं, सोपानों को चढ़ने में। -- उठती-गिरती लहरों से, नौका को सदा बचाया है, भरी जवानी धूल हो गई, तूफानों से लड़ने में। -- आगत और अनागत का स्वागत मैं दिल से करता हूँ, नदियाँ सूखी गूल हो गई, अरमानों को मढ़ने में। -- “रूप” कभी भी रास न आया, नादानों को फूलों का, बातें ऊल-जलूल हो गईं, गुलदानों को जड़ने में। -- |
मंगलवार, 18 अप्रैल 2023
दोहे, "माँग लीजिए ज्ञान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- खाली कभी न बैठिए, करते रहिए काम। लिखने-पढ़ने से सदा, होगा जग में नाम।। -- खाली रहे दिमाग तो, मन में चढ़े फितूर। खुराफात इंसान को, कर देती मग़रूर।। -- करे किनारा सुजन जब, मिट जाते सम्बन्ध। दुनियादारी में धरे, रह जाते अनुबन्ध।। -- नहीं कभी अभिमान से, बनती कोई बात। ज्ञानी-सन्त-महन्त की, मिट जाती औकात।। -- धन-दौलत-सौन्दर्य पर, मत करना अभिमान। सेवा करके गुरू की, माँग लीजिए ज्ञान।। -- गुरु इतना ही चाहता, शिष्यों से प्रतिदान। जीवनभर करते रहेें, चेले उसका मान।। -- मन में रहे उदारता, आदर के हों भाव। मेहनत की पतवार से, पार लगेगी नाव।। -- |
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