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रविवार, 25 जनवरी 2009

हो गया क्यों देश ऐसा ? (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक")

कल्पनाएँ डर गयी हैं,
भावनाएँ मर गयीं हैं,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा ??

पक्षियों का चह-चहाना,
लग रहा चीत्कार सा है।
षट्पदों का गीत गाना,
आज हा-हा कार सा है।
गीत उर में रो रहे हैं,
शब्द सारे सो रहे हैं,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा ??

एकता की गन्ध देता था,
सुमन हर एक प्यारा,
विश्व सारा एक स्वर से,
गीत गाता था हमारा,
कट गये सम्बन्ध प्यारे,
मिट गये अनुबन्ध सारे ,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा ??

आज क्यों पागल,
स्वदेशी हो गया है ?
रक्त क्यों अपना,
विदेशी हो गया है ?
पन्थ है कितना घिनौना,
हो गया इन्सान बौना,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा ??

आज भी लोगों को,
पावस लग रही है ,
चाँदनी फिर क्यों ,
अमावस लग रही है ?
शस्त्र लेकर सन्त आया,
प्रीत का बस अन्त आया,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा ??

11 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा लेख है ....आपका और आपके नए ब्लॉग का स्वागत है .....लिखते रहें ......

    अनिल कान्त
    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी पोस्ट यहाँ भी है……नयी-पुरानी हलचल

    http://nayi-purani-halchal.blogspot.com/

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सार्थक चिंतन .. अच्छी रचना जो देश के प्रति आपकी चिन्ता को व्यक्त कर रही है ..

    जवाब देंहटाएं
  4. चाँदनी फिर क्यों ,

    अमावस लग रही है ?
    desh ke prati chintan jhalak raha hai ..!!

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत भावपूर्ण रचना \
    आशा

    जवाब देंहटाएं
  6. आज के हालात का बहुत सुन्दर चित्रण किया है।….. धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  7. आज क्यों पागल,
    स्वदेशी हो गया है ?
    रक्त क्यों अपना,
    विदेशी हो गया है ?
    पन्थ है कितना घिनौना,
    बहुत बढ़िया रचना है कल्पनाएँ मर.... सब , भावनाएं डर गईं ,स्वप्न सब बिखर गए ,रास्ते में लुट गए हम है कलेजा किसका नम ?.

    जवाब देंहटाएं

  8. दिनांक 27/01/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    'हो गया क्यों देश ऐसा' .........हलचल का रविवारीय विशेषांक.....रचनाकार....रूप चंद्र शास्त्री 'मयंक' जी

    जवाब देंहटाएं

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