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रविवार, 13 दिसंबर 2009

"अब तो मिलनें में भी लगे पहरे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



हले पाबन्दियाँ थीं हँसने में,
अब तो रोने में भी लगे पहरे।
पहले बदनामियाँ थीं कहने में,
अब तो सहने में भी लगे पहरे।


कितने पैबन्द हैं लिबासों में,
जिन्दगी बन्द चन्द साँसों मे,
पहले हदबन्दियाँ थीं चलने में,
अब ठहरने में भी लगे पहरे।


शूल बिखरे हुए हैं राहों मे,
नेक-नीयत नहीं निगाहों में
पहले थीं खामियाँ सँवरने में,
अब उजड़ने में भी लगे पहरे।


अब हवाएँ जहर उगलतीं हैं,
अब फिजाएँ कहर उगलतीं हैं,
पहले गुटबन्दियाँ थीं कुनबे में,
अब तो मिलनें में भी लगे पहरे।


22 टिप्‍पणियां:

  1. शूल बिखरे हुए हैं राहों मे,
    नेक-नीयत नहीं निगाहों में
    पहले थीं खामियाँ सँवरने में,
    अब उजड़ने में भी लगे पहरे।

    बहुत सुंदर पंक्तियों के साथ....बेहतरीन रचना....

    जवाब देंहटाएं
  2. अब हवाएँ जहर उगलतीं हैं,
    अब फिजाएँ कहर उगलतीं हैं,
    पहले गुटबन्दियाँ थीं कुनबे में,
    अब तो मिलनें में भी लगे पहरे।
    बहुत सुन्दर रचना सर . बिलकुल सामयिक है . आभार

    जवाब देंहटाएं
  3. अब हवाएँ जहर उगलतीं हैं,
    अब फिजाएँ कहर उगलतीं हैं,
    पहले गुटबन्दियाँ थीं कुनबे में,
    अब तो मिलनें में भी लगे पहरे।
    सच्चाई की रोशनी दिखाती आपकी बात हक़ीक़त बयान करती है।

    जवाब देंहटाएं
  4. पहले गुटबन्दियाँ थीं कुनबे में,
    अब तो मिलनें में भी लगे पहरे।

    यथार्थ को दर्शाती रचना।

    जवाब देंहटाएं
  5. "पहले थीं खामियाँ सँवरने में,
    अब उजड़ने में भी लगे पहरे"।

    oh! ye kaisa daur he?

    जवाब देंहटाएं
  6. शूल बिखरे हुए हैं राहों मे,
    नेक-नीयत नहीं निगाहों में
    पहले थीं खामियाँ सँवरने में,
    अब उजड़ने में भी लगे पहरे....

    बहुत लाजवाब शास्त्री जी ..... कमाल का लिखा है आपने ........ आज का चित्रण .....

    जवाब देंहटाएं
  7. बदलते परिवेश को दर्शाती रचना

    जवाब देंहटाएं
  8. कितने पैबन्द हैं लिबासों में,
    जिन्दगी बन्द चन्द साँसों मे,
    पहले हदबन्दियाँ थीं चलने में,
    अब ठहरने में भी लगे पहरे।
    बहुत सुंदर पंक्तियाँ ..बेहतरीन अभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
  9. पहले गुटबन्दियाँ थीं कुनबे में,
    अब तो मिलनें में भी लगे पहरे।


    -कितना सच!!!

    जवाब देंहटाएं
  10. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार (23-05-2021 ) को 'यह बेमौसम बारिश भली लग रही है जलते मौसम में' (चर्चा अंक 4074) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

    जवाब देंहटाएं
  11. बहुत ही शानदार सटीक विश्लेषण आज के दौर का ।

    जवाब देंहटाएं
  12. सच्चाई को कहती उत्कृष्ट रचना

    जवाब देंहटाएं
  13. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (07-06-2021 ) को 'शूल बिखरे हुए हैं राहों में' (चर्चा अंक 4089) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

    जवाब देंहटाएं
  14. शूल बिखरे हुए हैं राहों मे,
    नेक-नीयत नहीं निगाहों में
    पहले थीं खामियाँ सँवरने में,
    अब उजड़ने में भी लगे पहरे।
    बेहतरीन रचना आदरणीय 👌

    जवाब देंहटाएं
  15. पहले पाबन्दियाँ थीं हँसने में,
    अब तो रोने में भी लगे पहरे।
    पहले बदनामियाँ थीं कहने में,
    अब तो सहने में भी लगे पहरे।

    बहुत सटीक और सुंदर रचना आदरणीय 🙏

    जवाब देंहटाएं
  16. जबरदस्त रचना... हार्दिक बधाई आ.मयंक जी!

    जवाब देंहटाएं

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