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मंगलवार, 16 नवंबर 2010

"अनुराग की बातें करें!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

हर दिवस इक पर्व है अनुराग की बातें करें।
छोडकर निज स्वार्थ हम कुछ त्याग की बातें करें।।

डस लिया संगीत गोरे नाग ने,
छोड़ दी है लय पुरातन राग ने,
आओ हम फिर से पुरातन राग की बातें करें।
छोडकर निज स्वार्थ हम कुछ त्याग की बातें करें।।

कंकरीटों के उगे जंगल सघन,
घट रहे हैं खेत और खलिहान वन,
छाँव पाने के लिए वन-बाग की बातें करे।
छोडकर निज स्वार्थ हम कुछ त्याग की बातें करें।।

बीनते हैं हम विदेशों में निवाला,
देश का हमने निकाला है दिवाला,
दूध को छलनी में दुहकर भाग की बाते करें।
छोडकर निज स्वार्थ हम कुछ त्याग की बातें करें।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर भाव, श्रेष्ठ रचना!

    जवाब देंहटाएं
  2. बीनते हैं हम विदेशों में निवाला,
    देश का हमने निकाला है दिवाला,

    सटीक , सार्थक और सुन्दर रचना .

    जवाब देंहटाएं
  3. बेहद सुन्दर भावप्रधान रचना।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर गीत.. सन्देश के साथ..

    जवाब देंहटाएं
  5. धारदार कटाक्ष व सुन्दर संदेश।

    जवाब देंहटाएं
  6. बीनते हैं हम विदेशों में निवाला,
    देश का हमने निकाला है दिवाला.nice

    जवाब देंहटाएं
  7. छोडकर निज स्वार्थ हम कुछ त्याग की बातें करें।।

    Bilkul sahi baat hai!

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है! हार्दिक शुभकामनाएं!
    लघुकथा – शांति का दूत

    जवाब देंहटाएं

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