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सोमवार, 10 नवंबर 2014

"गीत-जीवन का ताना-बाना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ताना-बाना बुनते-बुनते,
कोई जीवनभर रहा पस्त।।
परिणय बन्धन जब से बाँधा,
हो गया प्रणय का पथ प्रशस्त।।

कुछ ऐसे भी हैं भाग्यवान,
जिनके साथी करुणानिधान,
गाते दिन-प्रतिदिन मधुर गान,
जीवनभर रहते सदा मस्त।
हो गया प्रणय का पथ प्रशस्त।।

कुछ को फूलों का साज मिला,
कुछ को काँटों की ताज मिला,
कुछ को न अभी भी काज मिला,
कुछ अपनों से हो गये त्रस्त।
हो गया प्रणय का पथ प्रशस्त।।

कोई दौलत में खेल रहा,
कोई विपदाएँ झेल रहा,
कोई पापड़ को बेल रहा,
सब कीर्तिमान हो गये ध्वस्त।
हो गया प्रणय का पथ प्रशस्त।।

कुछ भूतल पर सो जाते है,
कुछ गद्दों पर अकुलाते हैं,
कुछ दुख सहकर मुस्काते हैं,
पश्चिम में होता सूर्य अस्त। 
हो गया प्रणय का पथ प्रशस्त।।

5 टिप्‍पणियां:

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