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शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

दोहे "सपनों का संसार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सपनों में आने लगे, राम और रहमान।
सपनों में अब जी रहे, मेहनतकश इंसान।।
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सच्ची होती है नहीं, सपनों की हर बात।
सपनों में ही देखिए, जन्नत की सौगात।।
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आवारा सपने हुए, हरजाई हैं मीत।
जीवन में कैसे बजे, अब मधुरिम संगीत।।
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सत्य हारता जा रहा, झूठ रहा है जीत।
कलयुग में भूले सभी, अपना आज अतीत।।
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हिंसा के परिवेश में, धर्म रहा दम तोड़।
बिना गणित के कर रहे, गुणा-भाग औ जोड़।।
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होता बड़ा हसीन है, सपनों का संसार।
लेकिन जीवन में नहीं, इनका कुछ आधार।।

3 टिप्‍पणियां:

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