गुरुवार, 8 नवंबर 2018

गीत "भाई दूज का तिलक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मेरे भइया तुम्हारी हो लम्बी उमर,

 कर रही हूँ प्रभू से यही कामना।
लग जाये किसी की न तुमको नजर,
दूज के इस तिलक में यही भावना।।

चन्द्रमा की कला की तरह तुम बढ़ो,
उन्नति के शिखर पर हमेशा चढ़ो,
कष्ट और क्लेश से हो नही सामना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।।


थालियाँ रोली चन्दन की सजती रहें,
सुख की शहनाइयाँ रोज बजती रहें,
 हों सफल भाइयों की सभी साधना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।। 

रोशनी से भरे दीप जलते रहें,
नेह के सिन्धु नयनों में पलते रहें,
आज बहनों की हैं ये ही आराधना।
दूज के इस तिलक में यही भावना।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ९ नवंबर २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  2. बहुत अच्छी सामयिक रचना

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर!!
    बहनो का भाइयों के लिये सुंदर भावनात्मक गीत ।

    उत्तर देंहटाएं

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