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मंगलवार, 29 जनवरी 2019

दोहे "बन जाता संगीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अमल-धवल होता नहीं, सबका चित्त-चरित्र।
जाँच-परख के बाद ही, यहाँ बनाना मित्र।।।

रखना नहीं घनिष्ठता, उन लोगों के संग।
जो अपने बनकर करें, गोपनीयता भंग।।

जिसमें हो सन्देश कुछ, रचना ऐसा गीत।
सात सुरों के मेल से, बन जाता संगीत।।

जो समाज को दे दिशा, कहलाता साहित्य।
जीवन दे जो जगत को, वो होता आदित्य।।

महादेव बन जाइए, करके विष का पान।
धरा और आकाश में, देंगे सब सम्मान।।

1 टिप्पणी:

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