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मंगलवार, 14 मई 2019

दोहे "अपना चौकीदार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



आरोपों की हो जहाँ, भाषण में बरसात।
राजनीति के खेल में, वहाँ न होती मात।।
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शह पर शह पड़ती बहुत, चलते फिर भी चाल।
क्रोधित होकर नोंचते, नेता सिर के बाल।।
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दल-दल में सब हैं फँसे, गिरवीं बुद्धि-विवेक।
मतलब पड़ने पर हुए, सारे बैरी एक।।
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बैरी की करतूत पर, होते पीले-लाल।
लेकिन कभी न खून में, आता कहीं उबाल।।
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पहले जैसा है नहीं, अपना चौकीदार।
पहले जैसा अब नहीं, उसका है किरदार।।
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जिसके जैसे कर्म हों, वैसी हो तकदीर।
भेद-भाव जनतन्त्र में, करना नहीं वजीर।।
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शासन करने को मिला, आसन है अनमोल।
वाणी के वागीश के, फिर क्यों बिगड़े बोल।।

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