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मंगलवार, 7 मई 2019

समीक्षा "सकारात्मक एवं अर्थपूर्ण सूक्तियाँ (समीक्षक डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

समीक्षा-सकारात्मक एवं अर्थपूर्ण सूक्तियाँ
(समीक्षक डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

        
मुझे आज डाक से हीरो वाधवानी कृत “सकारात्मक अर्थपूर्ण सूक्तियाँ” नामक कृति मिली। जिसे पढ़कर मुझे अलौकिक अनुभूति हुई। 
मैंने अब तक गद्य-पद्य की सैकड़ों कृतियों पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। सूक्तियों के किसी संग्रह पर कुछ लिखने का यह मेरा प्रथम प्रयास है। मेरा मानना है कि मौलिक सूक्तियों की रचना कोई सन्त या महात्मा ही कर सकता है। आज तक इस प्रकार के जितने भी संग्रह मैंने देखे हैं वह किसी न किसी महापुरुष द्वारा ही रचे गये हैं। हीरो वाधवानी मेरी दृष्टि में कोई सन्त या महात्मा नहीं हैं अपितु एक सामान्य गृहस्थ ही होंगे। लेकिन यदि एक सामान्य व्यक्ति इस प्रकार के ग्रन्थ की रचना करता है तो मैं यह कह सकता हूँ कि वह सन्त-महात्मा से ऊपर कोई महामानव ही हो सकता है।
        अयन प्रकाशन, दिल्ली द्वारा इस पुस्तक को सन् 2017 में प्रकाशित किया गया है। 168 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 300-00 है। जिसे लेखक हीरो वाधवानी ने अपनी माता श्रीमती लीलाबाई और पुत्र होतु (हैरी) वाधवानी को समर्पित किया है। वे अपने जन्मदिन 5 अप्रैल के बारे में लिखते हैं-
“मैंने गद्य साहित्य की 25 विविध विधाओं पर लिखा है, 
जैसे संस्मरण, रेखचित्र, रिपोर्ताज आदि के साथ 
2000 के लगभग सूक्तियाँ लिखी हैं।“
        मेरे विचार से साहित्य के लिए उनकी यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। जिसमें लेखक का उद्देश्य है-
धन और समय न होने के बाद भी उच्चशिक्षा प्राप्त करना”
        आगे वे कहते हैं-
“मैं कोई कथावाचक नहीं हूँ 
किन्तु बिना किसी किसी तैयारी के 
बिना किसी आलेख को देखे 
मैंने फिलीपीन्स के दाबाव शहर के 
हिन्दू टेम्पल में सौ से अधिक प्रवचन किये हैं।“
       अब मैं उनकी सबसे बड़ी सूक्ति का उल्लेख यहाँ पर करना अपना धर्म समझता हूँ। जिसमें वे लिखते है-
“मैं अपनी लिखी पुस्तकें निःशुल्क भेंट करता हूँ  
लेकिन दूसरों की पुस्तकें सदैव खरीदकर ही पढ़ता हूँ।“
       आपके अनुसार-
“धन थोड़े समय का साथी है।...
माँ शहद और पिता मिश्री हैं”
       सहज और बोलचाल की सरल भाषा में समाज के लिए अनमोल वचन लिख देना एक बहुत बड़ी कला होती है। जो हीरो वाधवानी जी की लेखनी में सर्वथा दृष्टिगोचर होती है। जैसे-
“खराबी आँखों में हो तो चश्मे का दोष नहीं है।.... 
क्रोध आये तो जगह बदल दो।.... 
वाणी व्यक्ति का परिचय पत्र है।“
      इस संग्रह की जितनी सराहना की जाये मेरे विचार से वह कम ही होगी। “सकारात्मक अर्थपूर्ण सूक्तियाँ” में से कुछ सूक्तियाँ मैं उदाहरणस्वरूप दे रहा हूँ जिनमें आपने जीवनोपयोगी सन्देश दिये हैं-
“सादगी सदैव पूर्ण और फैशन अक्सर अपूर्ण होता है”
--
“गिरावटः गिरने के बाद दूध 
पानी जितना मूल्य भी नहीं रखता”
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“भाग्य परिश्रम का बेटा है”
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“जानकारी धन और समय बचाती है”
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“गरीब के लिए सारा जग सौतेला है”
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“एक अच्छी पत्नी 
सौ मित्रों के समान होती है”
--
“साहस और लगन नदी नहीं, समन्दर है”
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“सूर्य-चन्द्रमा, मृत्यु और ईश्वर  
इनसे कभी की गलती नहीं होती है।  
इसीलिए ये हमेशा के लिए हैं”
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“परिश्रम पारस पत्थर और अलादीन का चिराग है”
--
“गलतियों को छिपाने वाला पर्दा हमेशा छोटा होता है”
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“प्यार मन्दिर-मस्जिद, गिरजा,  
गुरुद्वारों और मठों की नींव है”
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“क्रोध धैर्य का शत्रु है”
--
“सदाचार चार अक्षर नहीं, पूरी किताब है”
        “सकारात्मक अर्थपूर्ण सूक्तियाँ”  को सांगोपांग पढ़कर मैंने अनुभव किया है कि अनुभव और भावों से ओतप्रोत सूक्तियों के संग्रह की माला में  लेखक हीरो वाधवानी ने मोतियों को पिरोया है। जहाँ सूर, कबीर, तुलसी, नानक आदि सन्तों ने अपने साहित्य के माध्यम से समाज को ज्ञान परोसा है वहीं अनुभवी लेखक हीरो वाधवानी ने भी इस युग में लोगों को बहुत कुछ दिया है।
      अन्त में यही कहूँगा कि साहित्य समाज का वह दर्पण होता है जिसमें व्यक्ति का चित्र उजागर होता है। सूक्तियों की यह कृति भी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। 
      मुझे आशा ही नहीं अपितु विश्वास भी है कि यह कृति समीक्षको की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगी और निकट भविष्य में आपकी अन्यान्य पुस्तकें भी पाठकों को पढ़ने को मिलेंगी।
     हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
(कवि एवं समीक्षक)
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262308
सम्पर्क-7906360576, 7906295141
ई-मेल- roopchandrashastri@gmail.com
वेब साइट- http://uchcharan.blogspot.com/

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