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सोमवार, 6 मई 2019

दोहे "उल्लू की परवाज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मिट्टी के लड़डू मिले, कंकड़ वाली दाल। 
शुद्ध पेय जल के बिना, जीना हुआ मुहाल।।
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दाँव-पेंच के खेल में, पग-पग पर हैं जाल।
करें आचमन अब कहाँ, गंगा है बदहाल।।
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वचनबद्ध कोई नहीं, दावों में है खोट।
साम-दाम, छल-छद्म से, हाँसिल करते वोट।।
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मतलब के कारण हुए, साँप-नेवले साथ।
बने हुए हैं नाथ वो, जो थे कभी अनाथ।।
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पण्डित जी के जाल में, फँसा हुआ यजमान।
नहीं सियासत में बचा, धर्म और ईमान।।
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सूख रहे हैं देश में, नदी सरोवर-ताल।
नेह नहीं है दिलों में, हालत है विकराल।।
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अन्धकार का राज है, उल्लू की परवाज।
आसन पर आसीन है, अब तो कुश्तीबाज।

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