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गुरुवार, 9 मई 2019

दोहे "सर्प-नेवले मीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
वातावरण चुनाव का, वैमनस्य का रोग।
किसे वोट दें या न दें, असमंजस में लोग।।
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लोकतन्त्र के खेल में, सभी चाहते जीत।
राजनीति में बन गये, सर्प-नेवले मीत।।
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गधे राजसी हों भले, या विपक्ष के बैल।
जंगल के परिवेश में, सबके मन में मैल।।
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झूठ और छल-कपट से, मिल जाये बस वोट।
दल-दल की इस पंक में, भरा हुआ है खोट।।
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वादे लोक-लुभावने, भाषण में है झूठ।
हरे-भरे से वृक्ष को, बना दिया है ठूठ।।
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1 टिप्पणी:

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