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गुरुवार, 2 मई 2019

दोहे "सूना है घर-बार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

युगों-युगों से सुन रहा, युग वीणा झंकार।
अब माला के साथ माँ, भाला भी लो धार।।
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माँ तुम हो करुणामयी, करती हो उपकार।
भाला लेकर कीजिए, दुष्टों का संहार।।
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माँ की ममता का नहीं, जग में बना विकल्प।
लेकिन आदर-भाव का, मन में हो संकल्प।।
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शक्तिस्वरूपा हो तुम्हीं, तुम्हीं ज्ञान का पुंज।
तुमसे ही है चहकता, मन का शब्द-निकुंज।।
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बिना आपके शारदे, सूना है घर-बार।
कल्याणी माता हरो, मन के सकल विकार।।
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खाली झोली साथ है, मेला लगे उदास।
भर दो मन को ज्ञान से, करता हूँ अरदास।।
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मेरी करुण पुकार पर, देना माता ध्यान।
पूजन-वन्दन का नहीं, मुझको कुछ भी ज्ञान।।
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ज्ञानदायिनी आप हो, सेवक है नादान।
वाणी में भर दीजिए, माता सुर-लय-तान।।
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(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

2 टिप्‍पणियां:

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