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शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

"सुरभित सुमन रोया हुआ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


 नीड़ में सबके यहाँ प्रारब्ध है सोया हुआ
काटते उसकी फसल जो बीज था बोया हुआ

खोलकर अपनी न देखी, दूसरों की खोलता
गन्ध को है खोजता, मूरख हिरण खोया हुआ

कोयले की खान में, हीरा कहाँ से आयेगा
मैल है मन में भरा, केवल बदन धोया हुआ

अब तो माली ही वतन का खाद-पानी खा रहे 
इस लिए आता नज़र सुरभित सुमन रोया हुआ

खोट ने पॉलिश लगाकर "रूप" कंचन का धरा
पुण्य ने बनकर श्रमिक अब, पाप को ढोया हुआ

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत गूढ़ गूढ़ बातें कही आपने शास्त्री जी | बहुत उम्दा |

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति .पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब,

    जवाब देंहटाएं
  3. कवच कर भर कंकन घन रूप कंचन का धरा ।
    पुण्य श्रमिक के कर स्वेद सीकर पिरोया हुवा ।।

    जवाब देंहटाएं
  4. कोयले की खान में, हीरा कहाँ से आयेगा
    मैल है मन में भरा, केवल बदन धोया हुआ,,,,,बहुत उम्दा प्रस्तुति,,,,

    सभी ब्लॉगर परिवार को करवाचौथ की बहुत बहुत शुभकामनाएं,,,,,

    RECENT POST : समय की पुकार है,

    जवाब देंहटाएं
  5. नीड़ में सबके यहाँ प्रारब्ध है सोया हुआ
    काटते उसकी फसल जो बीज था बोया हुआ

    अब तो माली ही वतन का खाद-पानी खा रहे
    इस लिए आता नज़र सुरभित सुमन रोया हुआ

    बहुत सुन्दर !

    जवाब देंहटाएं
  6. शुक्रवार, 2 नवम्बर 2012

    "सुरभित सुमन रोया हुआ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

    नीड़ में सबके यहाँ प्रारब्ध है सोया हुआ
    काटते उसकी फसल जो बीज था बोया हुआ

    खोलकर अपनी न देखी, दूसरों की खोलता
    गन्ध को है खोजता, मूरख हिरण खोया हुआ

    कोयले की खान में, हीरा कहाँ से आयेगा
    मैल है मन में भरा, केवल बदन धोया हुआ

    अब तो माली ही वतन का खाद-पानी खा रहे
    इस लिए आता नज़र सुरभित सुमन रोया हुआ

    खोट ने पॉलिश लगाकर "रूप" कंचन का धरा
    पुण्य ने बनकर श्रमिक अब, पाप को ढोया हुआ


    कोयले की धुंध में पूरी अटी सरकार है ,

    भ्रष्ट होने का यहाँ ,सबको मिला अधिकार है .

    आज के राजनीतिक परिवेश का परिपूर्ण प्रक्षेपण करती रचना है .बधाई शास्त्री

    जी .

    जवाब देंहटाएं
  7. शुक्रवार, 2 नवम्बर 2012

    "सुरभित सुमन रोया हुआ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

    नीड़ में सबके यहाँ प्रारब्ध है सोया हुआ
    काटते उसकी फसल जो बीज था बोया हुआ

    खोलकर अपनी न देखी, दूसरों की खोलता
    गन्ध को है खोजता, मूरख हिरण खोया हुआ

    कोयले की खान में, हीरा कहाँ से आयेगा
    मैल है मन में भरा, केवल बदन धोया हुआ

    अब तो माली ही वतन का खाद-पानी खा रहे
    इस लिए आता नज़र सुरभित सुमन रोया हुआ

    खोट ने पॉलिश लगाकर "रूप" कंचन का धरा
    पुण्य ने बनकर श्रमिक अब, पाप को ढोया हुआ


    कोयले की धुंध में पूरी अटी सरकार है ,

    भ्रष्ट होने का यहाँ ,सबको मिला अधिकार है .

    आज के राजनीतिक परिवेश का परिपूर्ण प्रक्षेपण करती रचना है .बधाई शास्त्री

    जी .

    जवाब देंहटाएं
  8. अपना दल और अपना बल है ,पैंसठ सालों का अनुभव है ,

    हमने तो बस यह सीखा है ,भोजन भूखे का संबल है .

    (2)


    इत्मीनान से भोजन करके ,खूब मौज आराम करो ,

    आरोपों से क्या डरना है ,अपना अपना काम करो .

    जवाब देंहटाएं
  9. खोट ने पॉलिश लगाकर "रूप" कंचन का धरा
    पुण्य ने बनकर श्रमिक अब, पाप को ढोया हुआ-----बहुत सार्थक पंक्तियाँ आज के सामजिक परिवेश में करारा व्यंग्य करती हुई शानदार प्रस्तुति बधाई आपको

    जवाब देंहटाएं
  10. कोयले की खान में, हीरा कहाँ से आयेगा
    मैल है मन में भरा, केवल बदन धोया हुआ


    बहुत सुंदर, काश लोग समझ पाएं

    जवाब देंहटाएं
  11. अति सुन्दर ....बिलकुल सच्ची बातें काफी गहरी.

    जवाब देंहटाएं
  12. सुमनों की 'पंखुडियां' नोचीं हास किया है मैला |
    'आस्थाओं'को किया मलिन,'विशवास' किया है मैला ||
    वास५तव में आप की बात सटीक है !

    जवाब देंहटाएं
  13. मन मे मैल भरा तो साबुन लगाने से का होय
    इन्‍ही पॅिक्‍तयो से सम्‍बंधित रचनाओ को प्रकट कर धयानाकर्षण के लिये धन्‍यवाद

    यूनिक ब्लॉग---------जीमेल की नई सेवा

    जवाब देंहटाएं

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