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रविवार, 2 अगस्त 2015

दोहे "मित्र शब्द का है नहीं, दूजा बना विकल्प" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हम तो प्रतिदिन माँगते, दुनियाभर की खैर।
अमन-चैन से सब रहें, अपने हों या गैर।।
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जिस पग पर काँटे चुभें, वहाँ न रखना पैर।
जहाँ एक दिन मित्रता, बाकी दिन हो बैर।।
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मतलब की है दोस्ती, मतलब का सब प्यार।
मतलब के ही वास्ते, होती है मनुहार।।
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सौ-सौ बार विचारिए, क्या होता है मित्र।
खूब जाँचिए-परखिए, उसका चित्त-चरित्र।।
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हँसी-खेल मत समझिए, दुनिया बड़ी विचित्र।
जीवन में है मित्रता, पावन और पवित्र।।
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जिसको अपना कह दिया, वो जीवनभर मीत।
सच्ची होनी चाहिए, दिल में उपजी प्रीत।।
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आज मित्रता-दिवस पर, कर लेना संकल्प।
मित्र शब्द का है नहीं, दूजा बना विकल्प।।

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