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शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

दोहे "गणनायक भगवान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

शुक्ल चतुर्थी से शुरू, चतुर्दशी अवसान।
दस दिन रहता देश में, श्रद्धा का उन्वान।।

गणनायक भगवान की, महिमा बहुत अनन्त।
कृपा आपकी हो गर, जीवन बने बसन्त।।

मोदक प्रिय हैं आपको, गणनायक भगवान।
बनकर वाहन आपका, मूषक बना महान।।

साँझ-सवेरे आरती, उसके बाद प्रसाद।
होता है दरबार में, घण्टा ध्वनि का नाद।।

करता है आराधना, मन से सकल समाज।
बिना आपके तो नहीं, होता मंगल काज।।

विध्नविनाशक आप हो, सभी गणों के ईश।
पूजा करते आपकी, सुर-नर और मुनीश।।

सबसे पहले आपकी, पूजा होती देव।
सबकी रक्षा कीजिए, जय-जय गणपतिदेव।।

2 टिप्‍पणियां:

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