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शनिवार, 26 अगस्त 2017

दोहे "पनप रहा है भोग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

न्यायालय ने कर दिया, अपना पूरा काम।
कामी बाबा को मिला, उसको सही मुकाम।।

सच्चा सौदा था नहीं, पता चल गया आज।
छल-फरेब के जाल को, समझा सकल समाज।।

देख लिया संसार ने, कामुकता का हाल।
बाबाओं ने कर दिया, गन्दा पूरा ताल।।

रामपाल-गुरमीत भी, निकले आशाराम।
किया इन्होंने सन्त के, चोले को बदनाम।।

नौकाओं में पंथ की, दिखने लगे सुराख।
बाबाओं की अब नहीं, रही पुरानी शाख।।

दाँव-पेंच चलती रही, हरियाणा सरकार।
रौब-दाब को सामने, शासन था लाचार।।

बाबाओं ने देश में, जनता का आराम।
बगुलों ने टोपी लगा, जीना किया हराम।।

सत-संगत की आड़ में, पनप रहा है भोग।
बाबाओं के पाश में, बन्धक है अब योग।।

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द" में सोमवार 28 अगस्त 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com आप सादर आमंत्रित हैं ,धन्यवाद! "एकलव्य"

    जवाब देंहटाएं
  2. जाने कब समझेगी जनता इन बाबाओं को ?

    जवाब देंहटाएं
  3. सही.... सटीक.. लाजवाब ......।
    समसामयिक प्रस्तुति...

    जवाब देंहटाएं
  4. लम्पट बाबाओं को शिखर बिठाने का श्रेय जनता को जाता है जो नहीं समझ पाती की'' परहित सरिस धर्म नहीं '' ------- बहुत सार्थक रचना ---- बहुर बधाई आदरणीय

    जवाब देंहटाएं

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