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कोयल और कबूतरी, सेंक रहे हैं धूप।
बिना नहाये लग रहा, मैला उनका रूप।।
अच्छा लगता है बहुत, शीतकाल में घाम।
खिली गुनगुनी धूप में, सिक जाता है चाम।।
छा जाता कुहरा सघन, माघ-पौष के मास।
जलते तभी अलाव हैं, चौराहों के पास।।
नभ में सूरज गुम हुआ, हाड़ कँपाता शीत।
दाँतों से बजने लगा, किट-किट का संगीत।।
दिवस हुए छोटे बहुत, लम्बी हैं अब रात।
खाने में है बढ़ गया, भोजन का अनुपात।।
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बहुत सुन्दर दोहे आदरणीय 👌
जवाब देंहटाएंकोयल और कबूतरी, सेंक रहे हैं धूप।
जवाब देंहटाएंबिना नहाये लग रहा, मैला उनका रूप।।
अच्छा लगता है बहुत, शीतकाल में घाम।
खिली गुनगुनी धूप में, सिक जाता है चाम।।
छा जाता कुहरा सघन, माघ-पौष के मास।
जलते तभी अलाव हैं, चौराहों के पास।।
नभ में सूरज गुम हुआ, हाड़ कँपाता शीत।
दाँतों से बजने लगा, किट-किट का संगीत।।
दिवस हुए छोटे बहुत, लम्बी हैं अब रात।
खाने में है बढ़ गया, भोजन का अनुपात।।
सांगीतिक भाव और अर्थ से ससिक्त शीत का शाब्दिक बिम्ब शास्त्री जी का मनभावन लोकलुभावन।
एक प्रतिक्रिया वीरुभाई :
महाननगर ने फेंक दी मौसम की संदूक ,
पेड़ परिंदों से हुआ कितना बुरा सलूक।
बढ़ा प्रदूषण इस कदर जीना हुआ हराम ,
बच्चों को मिलने लगी मधुमेह अविराम।
हवा दिल्ली की पागल ...
हुई मिट्टी भी घायल।
veerujan.blogspot.com
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vigyanpaksh.blogspot.com
vigyanspectrum05.blogspot.com
सुन्दर सामयिक दोहे
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