-- मात-पिता
को तुम कभी, मत देना सन्ताप। नित्य
नियम से कीजिए, इनका वन्दन-जाप।। -- आदिकाल
से चल रही, यही जगत में रीत। वर्तमान
ही बाद में, होता सदा अतीत।। -- जग
में आवागमन का, चलता रहता चक्र। अन्तरिक्ष
में ग्रहों की, गति होती है वक्र।। -- जिनके
पुण्य-प्रताप से, रिद्धि-सिद्धि का वास। उनका
कभी न कीजिए, जीवन में उपहास।। -- शीतकाल
में बदन को, ताकत देती धूप। वस्त्र
हमेशा पहनिए, मौसम के अनुरूप।। -- यौवन
जब ढलने लगे, तभी घेरते रोग। वृद्धावस्था
में कभी, मत करना हठयोग।। बुरा
कभी मत सोचिए, करना मत दुष्कर्म। सेवा
और सहायता, जीवन के हैं मर्म।। -- |
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सुंदर व सटीक
जवाब देंहटाएंआदरणीय डॉ साहब को सादर वन्दे !
जवाब देंहटाएं....वृद्धावस्था में कभी, मत करना हठयोग।।....
आपकी बातें अनुभव सिद्ध काढ़े जैसी है , कलयुग में जीवन जीने की कला सिखाते अमूल्य दोहों के लिए भर भर साधुवाद !
प्रणाम !
सुंदर प्रस्तुति आदरणीय ।
जवाब देंहटाएंसुन्दर दोहे
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