-- न्यायव्यवस्था
से नहीं, मिलता आज सुकून। मुजरिम
को अच्छा लगे, देरतलब कानून।। -- लोकतन्त्र
में न्याय का, सपना चकनाचूर। अपराधी
के सामने, याचक है मजबूर।। -- धनबल-तनबल-राजबल, जन-गण
रहे पछाड़। बच
जाते मक्कार भी, लेकर शक की आड़।। -- मोटी
रकम डकार कर, करते बहस वकील। गद्दारों
के पक्ष में, देते तर्क दलील।। -- उपवन-कानन
खेत में, फैल रही विष-बेल। हत्या-लूट
बलात का, चलता जग में खेल। -- बन्धन
में हैं लड़कियाँ, लड़के हैं आजाद। बेटी
की इस देश में, कौन सुने फरियाद।। -- माँ-बहनों
के रूप की, लगती बोली आज। बढ़ते
भ्रष्टाचार से, दूषित हुआ समाज।। -- |
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