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बुधवार, 26 अगस्त 2009

‘‘हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं’’ (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



काम कुछ करते नही बातें बनाना जानते हैं।

हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं।।


मुफ्त का खाया है अब तक और खायेंगे सदा,

जोंक हैं हम तो बदन का खून पीना जानते हैं।

हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं।।


राम से रहमान को हमने लड़ाया है सदा,

हम मजहब की आड़ में रोटी पकाना जानते हैं।

हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं।।


गाय की औकात क्या? हम दुह रहे हैं सांड भी,

रोजियाँ ताबूत में से हम कमाना जानते हैं।

हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं।।


दाँत खाने के अलग हैं और दिखाने के अलग,

थूक आँखों में लगा आँसू बहाना जानते हैं।

हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

26 टिप्‍पणियां:

  1. जनता है इक काठ का उल्लू यही हम मानते है,
    अपने भाई बंधु को ही हम सभी पहचानते है.

    हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं।।

    बढ़िया व्यंग..बधाई..

    जवाब देंहटाएं
  2. बिल्कुल सही बात पर आपने व्यंग्य किया है! हाल ही में सिर्फ़ जॉर्ज बुश पर ही नहीं बल्कि चिदाम्बरम जी पर भी जूते से हमले किए गए थे! "हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं" ये सौ फीसदी सच्चाई है! बेहतरीन रचना !

    जवाब देंहटाएं
  3. दाँत खाने के अलग हैं और दिखाने के अलग
    थूक आँखों में लगा आँसू बहाना जानते हैं।
    हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं।।
    क्या सटीक अभिवयक्ति है बधाई

    जवाब देंहटाएं
  4. काम कुछ करते नही बातें बनाना जानते हैं।

    हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं।।

    sahee baat

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह
    वाह
    शास्त्रीजी वाह !
    वे खाना जानते हैं तो अपन खिलाना जानते हैं
    हुनर अपना ख़ूब हम भी आज़माना जानते हैं
    हा हा हा हा
    बधाई............अच्छी रचना के लिए !

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह शास्त्री जी बहुत खुब, आपने तो तोङे मे ही सच्चाई को उकेर दिया। बहुत सुन्दर रचना

    जवाब देंहटाएं
  7. वाह शास्त्रीजी वाह !एक अच्छी कब्बाली

    जवाब देंहटाएं
  8. waah waah shastri ji aaj to kamaal kar diya........netaon ka sajeev aur satik chitran kar diya..........vaise aise hi joote marte rahiye.........magar asar nhi hone wala aakhir neta jo thahre.

    जवाब देंहटाएं
  9. आज तो भिगो कर मारा शाष्त्रीजी.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  10. अरे क्या कमाल की खिंचाई की है आपने..

    जवाब देंहटाएं
  11. कमाल का व्यंग्य कसा है आपने.. हैपी ब्लॉगिंग

    जवाब देंहटाएं
  12. बहुत ही सटीक व्यंग्य सर. आभार

    जवाब देंहटाएं
  13. vवाह मयंक जी खूब अच्छी सुनाई आपने भिगो भिगो कर मारे हैं जूते बधाई

    जवाब देंहटाएं
  14. ब्लॉगर्स मित्रों!
    साधारण व्यक्ति हूँ, इसलिए तुकबन्दियों में साधारण
    शब्दों का ही प्रयोग करता हूँ।
    आप सबकी स्नेहसिक्त टिप्पणियों का आभारी हूँ।

    जवाब देंहटाएं
  15. वाह शास्त्री जी वाह,
    पर हम तो सुने हैं कि आप भी खटिमा के बड़े नेताओं में शुमार होते हो...

    जवाब देंहटाएं
  16. बहुत ही कमाल का व्यंग है.

    जवाब देंहटाएं
  17. हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं।।
    बहुत बढ़िया व्यंग्य है डाक्टसा...
    ये जूते का प्रसंग अचानक सूझा या भाजपा में चल रही जूतमपैजार से कुछ प्रेरणा मिली ?

    जवाब देंहटाएं
  18. इशाअल्लाह सबकी मुरादें पूरी होंगी।

    जवाब देंहटाएं
  19. क्या खूबसूरती से इनकी चाहतों पर प्रकाश डाला है..!!
    बहुत बढ़िया ..!!

    जवाब देंहटाएं

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