तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।। मुश्किलों में हैं सभी, फिर भी धुन में मस्त है, ताप के प्रकोप से, आज सभी ग्रस्त हैं, आन-बान, शान-दान, स्वार्थ में शुमार है। तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।। हो गये उलट-पलट, वायदे समाज के, दीमकों ने चाट लिए, कायदे रिवाज़ के, प्रीत के विमान पर, सम्पदा सवार है। तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।। अंजुमन पे आज, सारा तन्त्र है टिका हुआ, आज उसी वाटिका का, हर सुमन बिका हुआ, गुल गुलाम बन गये, खार पर निखार है। तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।। झूठ के प्रभाव से, सत्य है डरा हुआ, बेबसी के भाव से, आदमी मरा हुआ, राम के ही देश में, राम बेकरार है। तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।। |
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शनिवार, 26 नवंबर 2011
"खार पर निखार है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
शुक्रवार, 25 नवंबर 2011
‘‘बचा लो पर्यावरण’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
![]() घटते वन, बढ़ता प्रदूषण, गाँव से पलायन शहरों का आकर्षण। जंगली जन्तु कहाँ जायें? कंकरीटों के जंगल में क्या खायें? मजबूरी में वे भी बस्तियों में घुस आये! -- क्या हाथी, क्या शेर? क्या चीतल, क्या वानर? त्रस्त हैं, सभी जानवर। खोज रहे हैं सब अपना आहार, हो रहे हैं नर अपनी भूलों का शिकार। -- ![]() अभी भी समय है, लगाओ पेड़, उगाओ वन, हो सके तो बचा लो, पर्यावरण! ○ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' खटीमा (उत्तराखण्ड) |
गुरुवार, 24 नवंबर 2011
"हमारे नेता महान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
बेटी है, बँगला है, खेती है, घपलों में घपले हैं, दिल काले हैं कपड़े उजले हैं, उनके भइया हैं, इनके साले हैं, जाल में फँस रहे, कबूतर भोले-भाले हैं, गुण से विहीन हैं अवगुण की खान हैं जेबों में रहते इनके भगवान हैं इनकी दुनिया का नया विज्ञान है दिन में इन्सान हैं रात को शैतान हैं परदा डालते हैं भाषण से घोटालों पर तमाचे भी पड़ते हैं कभी-कभी गालों पर आदत हो गई है लातों के भूतों को खाते हैं यदा-कदा जनता के जूतों को न कोई धर्म है न ही ईमान है मुफ्त में करते नही अहसान हैं हर रात को बदलते नये मेहमान है हमारे देश के नेता सचमुच महान हैं! |
बुधवार, 23 नवंबर 2011
‘‘हमसफर बनाइए’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
ज़िन्दगी के रास्तों पे कदम तो बढ़ाइए। इस सफर को नापने को हमसफर बनाइए।। राह है कठिन मगर लक्ष्य है पुकारता, रौशनी से आफताब मंजिलें निखारता, हाथ थामकर डगर में साथ-साथ जाइए। ज्वार का बुखार आज सिंधु को सता रहा, प्रबल वेग के प्रवाह को हमें बता रहा, कोप से कभी किसी को इतना मत डराइए। काट लो हँसी-खुशी से, कुछ पलों का साथ है, चार दिन की चाँदनी है, फिर अँधेरी रात है, इन लम्हों को रार में, व्यर्थ मत गँवाइए। पुंज है सुवास का, अब समय विकास का, वाटिका में खिल रहा, सुमन हमारी आस का, सुख का राग, आज साथ-साथ गुनगुनाइए। |
सोमवार, 21 नवंबर 2011
"हाँ यही मौत का लक्षण है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
हाँ यही मौत का लक्षण है!! उठकर बैठो आँखें खोलो अपने मुख से कुछ तो बोलो हिलना-डुलना क्यों बन्द हुआ तन-मन क्यों ब्रह्मानन्द हुआ सब ढला आज सिंगार-साज चलती धारा क्यों रुकी आज क्या यही मौत का लक्षण है? मातम पसरा सारे घर में आँसू नयनों के कोटर में सब सजा रहे अन्तिम डोली देंगे काँधा सब हमजोली फिर चिता सजाई जाएगी कंचन काया जल जाएगी क्या यही मौत का लक्षण है? जब याद तुम्हारी आयेगी तब यादें ही रह जाएँगी जीवन की रीत निराली है पर मौत बहुत बलशाली है जिन्दगी चार दिन का खेला फिर उजड़ जायेगा ये मेला क्या यही मौत का लक्षण है? हाँ यही मौत का लक्षण है!! |
रविवार, 20 नवंबर 2011
"यह क्षण माता जी के जीवन में अब कभी नहीं आयेंगे।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
शनिवार, 19 नवंबर 2011
"जन्म दिवस पर शत्-शत् नमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
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