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नभ में छाये काले बादल।
मन भरमाते काले बादल।।
दिन में छाया है अँधियारा,
बादल से सूरज है हारा,
बौराये हैं काले बादल।
मन भरमाते काले बादल।।
चपला चम-चम चमक रही है,
आसमान मॆं दमक रही है,
बरस रहे हैं काले बादल।
मन भरमाते काले बादल।।
बादल होते हैं मतवाले,
जीवन जग को देने वाले,
बारिश लाते काले बादल।
मन भरमाते काले बादल।।
जब गरमी ज्यादा बढ़ जाती।
लू तन-मन को तब झुलसाती।
फिर गहराते काले बादल।
मन भरमाते काले बादल।।
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| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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बुधवार, 24 जून 2020
बालगीत ‘फिर गहराये काले बादल’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
सोमवार, 22 जून 2020
प्रकाशन "रिमझिम वाले भादो-सावन नहीं रहे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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महक लुटाते कानन पावन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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आज आदमी में मानवता सुप्त हुई
गौशालाएँ भी नगरों से लुप्त हुई
दाग लगे हैं आज चमन के दामन में
वैद्यराज सा नीम नहीं है आँगन में
ताल और लय मनभावन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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यौवन आने से पहले सूखी डाली
लुटी-पिटी सी है पेड़ों की हरियाली
कौन करेगा आज चमन की रखवाली
बने हुए खुदगर्ज आज वन के माली
कृष्णचन्द्र के अब वृन्दावन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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इन्द्रधनुष ने रंग बदलने छोड़ दिये
इतिहासों के पृष्ठ पलटने छोड़ दिये
रीत-रिवाज पुराने हमने छोड़ दिये
भारतीय परिधान पहनने छोड़ दिये
रिमझिम वाले भादो-सावन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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शिक्षा का अब है अकाल विद्यालय में
मस्त हो रही नई पौध मदिरालय में
दादा-दादी पड़े हुए वृद्धालय में
घर के मसले तय होते न्यायालय में
देवतुल्य पर्वत के पाहन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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रविवार, 21 जून 2020
दोहे "छोटे पुत्र विनीत का, जन्मदिवस है आज"
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छोटे पुत्र विनीत का, जन्मदिवस है आज।
बादल नभ में खुशी से, बजा रहा है साज।।
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पूरे किये विनीत ने, इकतालीस बसन्त।
खुशियाँ कुल परिवार में, पसरी हैं अत्यन्त।।
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अपने-अपने ढंग से, लाये सब उपहार।
इस अवसर पर दे रहा, मैं तो प्यार अपार।।
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मेरे कर्मों का दिया, प्रभु ने ये प्रतिदान।
पढ़-लिख करके बन गये, दोनों पुत्र महान।।
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अनुकम्पा का ईश की, कैसे करूँ बखान।
सेवारत सरकार में, मेरी हैं सन्तान।।
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इस पड़ाव में उमर के, नहीं मुझे कुछ चाह।
बस मुझको परिवार की, मिलती रहे पनाह।।
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देता शुभ आशीष मैं, तुमको सौ-सौ बार।
रहना घर-परिवार में, बनकर सदा उदार।।
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अभ्यागत के लिए तुम, बन्द न करना द्वार।
कभी किसी भी मोड़ पर, होना मत लाचार।।
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शनिवार, 20 जून 2020
दोहागीत "जग में केवल योग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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सात सुरों के योग से, बन जाता संगीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।१।
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अगर चाहते आप हो, पास न आये रोग।
रोज सुबह कर लीजिए, ध्यान लगा कर योग।।
मत-मज़हब का है नहीं, जिससे कुछ अनुबन्ध।
रखना ऐसे योग से, जीवन भर सम्बन्ध।।
मधुर कण्ठ से ही सदा, अच्छा लगता गीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।२।
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सन्त हमारे देश के, अगर छोड़ दें भोग।
नहीं अदालत में चले, फिर उन पर अभियोग।।
सत्य-सनातन योग की, महिमा बड़ी अनन्त।
योगी को ही समझिए, अब तो असली सन्त।।
जो सिखलाता योग को, वो होता है मीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।३।
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धन से हो जाता नहीं, कोई बहुत अमीर।
जग में वो धनवान है, जिसका स्वस्थ शरीर।।
दूषण फैला हर जगह, फैले घातक रोग।
शमन करेगा रोग को, जग में केवल योग।।
अपना आज सँवार लो, कर लो कर्म पुनीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।४।
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बिगड़ गया वातावरण, बिगड़ा आज चरित्र।
ऐसे में तो योग ही, तन-मन करे पवित्र।।
दीर्घ आयु का विश्व में, एक मात्र आधार।
तभी जगत ने लिया, योगदिवस स्वीकार।।
मौसम के उपहार हैं, गरमी-पावस-शीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।५।
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सात सुरों के योग से, बन जाता संगीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।।
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संस्मरण "पितृ दिवस पर विशेष" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरे पूज्य पिता जी!
![]()
यह
घटना सन् 1979 की है। उस समय मेरा निवास जिला-नैनीताल की नेपाल सीमा पर स्थित
बनबसा कस्बे में था।
![]()
पिता जी और माता जी उन दिनों नजीबाबाद में रहते थे। लेकिन मुझसे मिलने
के लिए बनबसा आये हुए थे। पिता जी की आयु उस समय 55-60 के बीच की रही होगी। शाम
को वो अक्सर बाहर चारपाई बिछा कर बैठे रहते थे। उस दिन भी वो बाहर ही चारपाई पर
बैठे थे।
तभी एक व्यक्ति मुझसे मिलने
के लिए आया। वो जैसे ही मेरे पास आया, पिता जी
एक दम तपाक से उठे और उसका हाथ इतना कस कर पकड़ा कि उसके हाथ से चाकू छूट कर
नीचे गिर पड़ा। तब मुझे पता लगा कि यह व्यक्ति तो मुझे चाकू मारने के लिए आया
था।
पिता जी ने अब उस गुण्डे को अपनी गिरफ्त में ले लिया था और वो उनसे
छूटने के लिए फड़फड़ा रहा था परन्तु पकड़ ऐसी थी कि ढीली होने का नाम ही नही ले
रही थी। अब तो यह नजारा देखने के लिए भीड़ जमा हो गई थी। इस गुण्डे टाइप आदमी की
भीड़ ने भी अच्छी-खासी पिटाई लगा दी थी।
छूटने का कोई चारा न देख इसने यह स्वीकार कर ही लिया कि डाक्टर साहब के
पड़ोसी ने मुझे चाकू मारने के लिए 1000रुपये तय किये थे और इस काम के लिए 100
रुपये पेशगी भी दिये थे।
आज वह गुण्डा और मेरा उस समय का सुपारी देने वाला पड़ोसी इस दुनिया में
नही है। परन्तु मेरे पिता जी सन् 2014 तक भी 90 वर्ष की आयु में बिल्कुल स्वस्थ थे। लेकिन वृद्धावस्था के कारण अशक्त हो गये थे।
जीवन के अन्तिम क्षणों तक पिता जी मेरे साथ ही रहे। मैं और मेरा परिवार उनकी
पूरी निष्ठा से सेवा में संलग्न रहे।
आज मुझे समझ में आता है
कि
पिता होते हुए पुत्र पर
कोई आँच नही आ सकती है।
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मेरे पिता जी का देहान्त 91 वर्ष की
आयु में
सन् 2014 में खटीमा में हुआ।
उस समय मैंने कुछ दोहे
रचे थे-
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पूज्य पिता जी आपका,
वन्दन शत्-शत्
बार।
बिना आपके है नहीं,
जीवन का आधार।।
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बचपन मेरा खो गया, हुआ वृद्ध मैं आज।
सोच-समझकर अब मुझे, करने हैं सब काज।।
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जब तक मेरे शीश पर, रहा आपका हाथ।
लेकिन अब आशीष का,
छूट गया है
साथ।।
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तारतम्य टूटा हुआ,
उलझ गये हैं
तार।
कौन मुझे अब करेगा,
पिता सरीखा
प्यार।।
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माँ ममता का रूप है,
पिता सबल आधार।
मात-पिता सन्तान को,
करते प्यार
अपार।।
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सूना सब संसार है,
सूना घर का
द्वार।
बिना पिता जी आपके,
फीके सब
त्यौहार।।
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तात मुझे बल दीजिए,
उठा सकूँ मैं
भार।
एक-नेक बनकर रहे,
मेरा ये
परिवार।।
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मन्दिर,
मसजिद-चर्च की, हमें नहीं दरकार।
पितृ-दिवस पर पिता को, नमन हजारों बार।।
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पिता विधातारूप है,
घर का पालनहार।
जीवनरूपी नाव को,
तात लगाता पार।।
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माली बनकर सींचता,
जो घर का
उद्यान।
रखता है सन्तान का,
पिता हमेशा
ध्यान।।
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पिता बिना लगता हमें, सूना पूरा गाँव।
पिता सदा परिवार को,
देता शीतल छाँव।
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जिसकी उपमा का नहीं,
जग में है
उपमान।
देवतुल्य उस तात का,
करना मत अपमान।।
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दोहे "क्षणभंगुर हैं प्राण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
क्षणभंगुर है यह जगत, अमर एक भगवान।
फिर भी सत्य न मानता, अभिमानी इंसान।।
जीवन का तो एक दिन, निश्चित है निर्वाण।
समझ नहीं पाता मनुज, क्षणभंगुर हैं प्राण।।
बड़ी शान से खिल रहा, नाजुक फूल कनेर।
क्षणभंगुर है जिन्दगी, रहा सुमन मुँह फेर।।
आदिकाल से हैं वही, धरा और आकाश।
जीव-प्रकृति-ईश का, कभी न होता नाश।।
जीवन के हैं सफर में, कहीं चढ़ाई-ढाल।
करते बहुत विनाश हैं, क्षणभंगुर भूचाल।।
जीवन में होता नहीं, कामनाओं का अन्त।
जो इनसे निर्लिप्त है, वही कहाता सन्त।।
जब मिट जाता मोह है, तब आता आरोह।
जीते जी मिटता नहीं, जीवन का व्यामोह।।
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