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शनिवार, 20 जून 2020

दोहागीत "जग में केवल योग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सात सुरों के योग से, बन जाता संगीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।१।
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अगर चाहते आप हो, पास न आये रोग।
रोज सुबह कर लीजिए, ध्यान लगा कर योग।।
मत-मज़हब का है नहीं, जिससे कुछ अनुबन्ध।
रखना ऐसे योग से, जीवन भर सम्बन्ध।।
मधुर कण्ठ से ही सदा, अच्छा लगता गीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।२।
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सन्त हमारे देश के, अगर छोड़ दें भोग।
नहीं अदालत में चले, फिर उन पर अभियोग।।
सत्य-सनातन योग की, महिमा बड़ी अनन्त।
योगी को ही समझिए, अब तो असली सन्त।।
जो सिखलाता योग को, वो होता है मीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।३।
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धन से हो जाता नहीं, कोई बहुत अमीर।
जग में वो धनवान है, जिसका स्वस्थ शरीर।।
दूषण फैला हर जगह, फैले घातक रोग।
शमन करेगा रोग को, जग में केवल योग।।
अपना आज सँवार लोकर लो कर्म पुनीत। 
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।४।
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बिगड़ गया वातावरण, बिगड़ा आज चरित्र।
ऐसे में तो योग ही, तन-मन करे पवित्र।।
दीर्घ आयु का विश्व में, एक मात्र आधार।
तभी जगत ने लिया, योगदिवस स्वीकार।।
मौसम के उपहार हैंगरमी-पावस-शीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।५।
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सात सुरों के योग से, बन जाता संगीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।।
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2 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार (22-06-2020) को 'कैनवास में आज कुसुम कोठारी जी की रचनाएँ' (चर्चा अंक-3740) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    -रवीन्द्र सिंह यादव

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर सृजन आदरणीय।
    सार्थक योग का महत्व समझाते सुंदर दोहे।

    जवाब देंहटाएं

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