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सोमवार, 22 जून 2020

प्रकाशन "रिमझिम वाले भादो-सावन नहीं रहे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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महक लुटाते कानन पावन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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आज आदमी में मानवता सुप्त हुई
गौशालाएँ भी नगरों से लुप्त हुई
दाग लगे हैं आज चमन के दामन में
वैद्यराज सा नीम नहीं है आँगन में
ताल और लय मनभावन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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यौवन आने से पहले सूखी डाली
लुटी-पिटी सी है पेड़ों की हरियाली
कौन करेगा आज चमन की रखवाली
बने हुए खुदगर्ज आज वन के माली
कृष्णचन्द्र के अब वृन्दावन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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इन्द्रधनुष ने रंग बदलने छोड़ दिये
इतिहासों के पृष्ठ पलटने छोड़ दिये
रीत-रिवाज पुराने हमने छोड़ दिये
भारतीय परिधान पहनने छोड़ दिये
रिमझिम वाले भादो-सावन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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शिक्षा का अब है अकाल विद्यालय में
मस्त हो रही नई पौध मदिरालय में
दादा-दादी पड़े हुए वृद्धालय में
घर के मसले तय होते न्यायालय में
देवतुल्य पर्वत के पाहन नहीं रहे
गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे
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6 टिप्‍पणियां:

  1. इंद्रधनुष ने रंग बदलने छोड़ दिए।
    वाह! शानदार प्रस्तुति सर।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही सुन्दर गीत ... सच है की इंतना कुछ छोड़ दिया है हमने की आज के सावन भादों भी बनावटी लगते हैं ... लाजवाब गीत ...

    जवाब देंहटाएं
  3. बेहतरीन और लाजवाब गीत ।

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह बहुत सुंदर अभिव्यक्ति आदरणीय ।

    जवाब देंहटाएं
  5. सच आज के हालातों को देख मन व्यथित होना लाजिमी है लेकिन कर भी क्या सकते है वक्त कहां ठहरता है!
    बहुत अच्छी प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर सृजन आदरणीय सर .

    जवाब देंहटाएं

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