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बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

"...काम हमारे आते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

MFT00367जो स्वदेश का मान बढ़ाते,
वो ही दक्ष कहाते हैं।
धरा सुसज्जित होती जिनसे,
वो ही वृक्ष कहाते हैं।

हरित क्रान्ति के संवाहक जो,
जन-गण के रखवाले हैं,
जो प्राणों को देने वाली,
मन्द समीर बहाते हैं।

पत्ते, फूल, मूल, फल जिसके, 
जीवन देने वाले हों,
देते हैं जो अन्न, और 
अमृत सा जल बरसाते हैं।

उपवन, आँगन, खेत, बाग में, 
हमको पेड़ लगाने हैं,
जिनकी शीतल छाया में ही, 
जीव-जन्तु सुख पाते हैं।

धरती का श्रृंगार अमर, 
उन पेड़ों की हरियाली से,
कदम-कदम पर, ये 
जीवन में काम हमारे आते हैं।

14 टिप्‍पणियां:

  1. एक मनुष्य दंभ ,
    जिसको दो फल,
    तो जाने कब पत्थर मारे,
    एक ये हरित स्तंभ,
    मारो पत्थर तो,
    पुष्प कदम्ब दे जातें है ...

    बहुत सुन्दर रचना, लिखते रहिये ...

    जवाब देंहटाएं
  2. सुन्दर सन्देश देती रचना.

    जवाब देंहटाएं
  3. धरती का श्रृंगार अमर,
    उन पेड़ों की हरियाली से,
    कदम-कदम पर, ये
    जीवन में काम हमारे आते हैं।

    saarthak prastuti !

    .

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

    जवाब देंहटाएं
  5. ख़ूबसूरत और सन्देश देती हुई शानदार रचना लिखा है आपने! आपकी लेखनी को सलाम!

    जवाब देंहटाएं
  6. वृक्ष की महत्ता बताती हुई एक सुन्दर रचना है ।

    जवाब देंहटाएं
  7. sunder kavita

    ----- eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं

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