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गुरुवार, 9 जनवरी 2014

"सितम बहुत सरदी ने ढाया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मैदानों में कुहरा छाया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
 
सूरज को बादल ने घेरा,
शीतलता ने डाला डेरा,
ठिठुर रही है सबकी काया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
 
कलियों पर मौसम के पहरे,
बहुत निराश हो रहे भँवरे,
गुंजन उनको रास न आया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
 
सरसों के सब बिरुए रोते,
गेहूँ अपना धीरज खोते है,
हरियाली का हुआ सफाया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
 
बया नीड़ से झाँक रही है,
इधर-उधर को ताँक रही है,
शीतलता ने हाड़ कँपाया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।
 
बूढ़े-बच्चे काँप रहे हैं,
सभी आग को ताप रहे हैं,
हिम पर्वशिखरों पर छाया।
सितम बहुत सरदी ने ढाया।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया-
    आभार गुरु जी-

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (10.01.2014) को " चली लांघने सप्त सिन्धु मैं (चर्चा -1488)" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है,नव वर्ष की मंगलकामनाएँ,धन्यबाद।

    जवाब देंहटाएं
  3. सर्दी को बहुत सुंदर चित्रमयी कविता से अंकित किया है आपने, अतिसुंदर...साधुवाद;-))
    सादर,
    सारिका मुकेश

    जवाब देंहटाएं
  4. सर्दी का बहुत अच्छा और लयात्मक चित्रण !!!
    अति सुँदर !!!
    - बाँकवि

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर चित्र और रचना |

    जवाब देंहटाएं
  6. सितम बहुत सरदी ने ढाया

    जवाब देंहटाएं
  7. आपकी इस ब्लॉग-प्रस्तुति को हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ कड़ियाँ (3 से 9 जनवरी, 2014) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,,सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

    जवाब देंहटाएं
  8. बया नीड़ से झाँक रही है,
    इधर-उधर को ताँक रही है,
    शीतलता ने हाड़ कँपाया।
    सितम बहुत सरदी ने ढाया।।

    जवाब देंहटाएं
  9. सर्दी का बहुत सुन्दर चित्रण

    जवाब देंहटाएं

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